महाराष्ट्र में नंदूरबार, बीड़, गढ़चिरोली भी हैं?

By Amitabh Shrivastava | Updated: March 14, 2026 07:06 IST2026-03-14T07:06:50+5:302026-03-14T07:06:50+5:30

खानदेश में नंदूरबार, मराठवाड़ा में बीड़, धाराशिव, हिंगोली, विदर्भ में गढ़चिरोली, वाशिम जैसे जिले भी हैं, जो अर्थव्यवस्था में प्रगति के दावों से कोसों दूर हैं.

Maharashtra also has Nandurbar, Beed, Gadchiroli Chief Minister Devendra Fadnavis blog Amitabh Srivastava | महाराष्ट्र में नंदूरबार, बीड़, गढ़चिरोली भी हैं?

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Highlightsऑस्ट्रिया, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों से भी राज्य की अर्थव्यवस्था बड़ी हो चुकी है.राज्य परिवहन महामंडल(एसटी) की बस तक नहीं पहुंच पाती है.राज्य की उन्नति का ग्राफ मुंबई, पुणे और नागपुर के सहारे देखा नहीं जा सकता है.

हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उस संगठन के सदस्य हैं, जो ‘अखंड भारत’ की संकल्पना पर विश्वास करता है, लेकिन बीते बुधवार को उन्होंने विधानसभा में महाराष्ट्र की एक अलग देश के रूप में कल्पना कर राज्य की अर्थव्यवस्था को दुनिया के देशों की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में लगभग 30वें स्थान पर बता दिया. वर्ष 2026-27 के बजट पर चर्चा में भाग लेते हुए मुख्यमंत्री के विचार उनके पैतृक संगठन के सिद्धांतों से मेल भले ही न खाते हों, लेकिन दक्षिण के राज्यों की सोच से कहीं न कहीं मेल खाते हैं. वह बताते हैं कि ऑस्ट्रिया, बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों से भी राज्य की अर्थव्यवस्था बड़ी हो चुकी है.

किंतु वह यह भूल जाते हैं कि खानदेश में नंदूरबार, मराठवाड़ा में बीड़, धाराशिव, हिंगोली, विदर्भ में गढ़चिरोली, वाशिम जैसे जिले भी हैं, जो अर्थव्यवस्था में प्रगति के दावों से कोसों दूर हैं. जिसकी बानगी राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण में भी मिल जाती है. आज भी इन इलाकों के कई गांवों में रेल यातायात तो बहुत दूर, राज्य परिवहन महामंडल(एसटी) की बस तक नहीं पहुंच पाती है.

इसीलिए राज्य की उन्नति का ग्राफ मुंबई, पुणे और नागपुर के सहारे देखा नहीं जा सकता है. न ही पश्चिम महाराष्ट्र की समृद्धि से मराठवाड़ा, खानदेश या विदर्भ की परिस्थितियों को नजरअंदाज किया जा सकता है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अनुसार महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था लगातार मजबूत होती जा रही है. आने वाले समय में महाराष्ट्र देश का पहला ‘ट्रिलियन डॉलर’ की अर्थव्यवस्था वाला राज्य बन सकता है.

राज्य कई क्षेत्रों में देश में नंबर वन बन चुका है. निर्यात के मामले में देश में पहले स्थान पर है. स्टार्टअप के क्षेत्र में भी सबसे आगे है. फडणवीस के अनुसार राज्य की विकास दर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से भी ज्यादा है और कुल जीडीपी में महाराष्ट्र का योगदान करीब 14.3 प्रतिशत है.

इसी रफ्तार से आने वाले समय में महाराष्ट्र यूएई और सिंगापुर जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ सकता है. उनके बताने के मुताबिक राज्य की वित्तीय स्थिति भी मजबूत हो रही है. महाराष्ट्र का राजकोषीय घाटा तीन प्रतिशत के भीतर, जबकि राजस्व घाटा एक प्रतिशत से कम है.

वर्ष 2013-14 में राज्य की राजस्व आय करीब एक लाख 55 हजार करोड़ रुपए थी, जो अब बढ़कर लगभग छह लाख 16 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई है. लिहाजा यह एक उजली तस्वीर है, जो सुंदर भी दिखाई देती है. परंतु इसमें धुंधली सच्चाई नहीं दिख रही है.

इन आंकड़ों की जादूगरी में राज्य के महानगरों का ही अधिक योगदान है, जबकि शेष सभी क्षेत्र अपनी मूलभूत समस्याओं से ही निपटने में लगे हुए हैं. महाराष्ट्र के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार राज्य की प्रति व्यक्ति औसत आय 3,17,801 रुपए है, जो देश के स्तर 2,05,324 रुपए से अधिक है.

राज्य के स्तर से मुंबई, पुणे, नागपुर, रायगढ़, ठाणे, कोल्हापुर ऊपर हैं, जबकि सांगली से लेकर जलगांव तक देश के औसत स्तर से ऊपर और महाराष्ट्र के आंकड़े से नीचे हैं. गोंदिया, बीड़, जालना, नांदेड़, परभणी, यवतमाल, हिंगोली, वाशिम, बुलढाणा, गढ़चिरोली, नंदूरबार देश की औसत आय के स्तर से नीचे हैं.

राज्य के आखिरी के तीन जिलों में दो विदर्भ और एक खानदेश का नंदूरबार है. पिछड़े जिलों के सकल जिला घरेलू उत्पाद(जीडीडीपी) की स्थिति वर्ष 2021-22 में हिंगोली का 17,306 करोड़ रुपए से वर्ष 2024-25 में 24,535 करोड़ रुपए हो गया, जबकि बीड़ में चार साल में 41,912 करोड़ रुपए से 62,971 करोड़ रुपए हो गया.

नंदूरबार का जीडीडीपी 20,917 करोड़ रुपए से 29,679 करोड़ रुपए हुआ, जबकि गढ़चिरोली का 13,923 करोड़ रुपए से 20,410 करोड़ रुपए हो गया. ये आंकड़े सुधार दर्शाते हैं, लेकिन राज्य के अन्य भागों की तुलना में जिले निचली पायदान पर नजर आते हैं. ऐसा नहीं है कि इन इलाकों की कुछ स्वाभाविक और औद्योगिक क्षेत्र के विकास में ही उपेक्षा हुई है.

आधारभूत आवश्यकताओं की नजर से भी शिक्षा, स्वास्थ्य और आवागमन के साधनों में भी यही इलाके पिछड़े दिखाई देते हैं. अक्सर बोर्ड की परीक्षाओं के परिणामों में भी इन क्षेत्रों के विद्यार्थियों की स्थिति खराब ही रहती है. अब सवाल यही है कि आधा से अधिक भाग राज्य की औसत आय के समीप नहीं होने पर प्रगति-उन्नति के आंकड़ों को किस आधार पर स्वीकार किया जाए?

राजनीति में क्योटो, शंघाई, सिंगापुर जैसे शहरों-देश के नाम लेकर भाषणों को रोचक बनाया जा सकता है, लेकिन वास्तविक रूप में सुधार लाने के लिए समस्याओं पर गहराई से ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होती है. मुंबई और पुणे जैसे महानगर पहले से ही महाराष्ट्र की शान रहे हैं. उनमें लोगों के जीवन को आसान बनाना सरकार के समक्ष चुनौती है.

वहां वाणिज्य, व्यापार और उद्योग की जड़ें काफी गहरी हैं. किंतु राज्य के अन्य भागों की स्थितियां बहुत अलग हैं. आजादी के सात दशक बाद पहुंची बीड़ जिले की रेल व्यवस्था आज भी सुदृढ़ नहीं है. विदर्भ के अनेक नक्सल प्रभावित जिले विकास की गति नहीं पकड़ पा रहे हैं. इसलिए महाराष्ट्र की खुशहाली की चर्चा में बदहाल जिलों के बारे में अधिक गंभीर चर्चा की जानी चाहिए.

आवागमन के साधनों के साथ सड़क, रेल यातायात के विषय सामने लाए जाने चाहिए. शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार पर गंभीरता लाई जानी चाहिए. पिछड़े क्षेत्रों से बढ़ते पलायन और महानगरों पर दबाव चिंताजनक है. यदि जुमलेबाजी के हिसाब से महाराष्ट्र की छवि को उत्कृष्ट बनाना है तो कोई भी पैमाना लगा कर पीठ थपथपाई जा सकती है.

परंतु परिवर्तन को वास्तविकता बनाने के लिए सच का धरातल पर सामना करना जरूरी होगा, जो न छिपा है और न ही छिपाया जा सकता है. आवश्यकता या शर्त सिर्फ इतनी है कि सच्चाई को देखकर आंखों को बंद न किया जाए.

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