सत्ता का अनुगामी नहीं, रहनुमा है साहित्य
By विश्वनाथ सचदेव | Updated: January 16, 2026 08:14 IST2026-01-16T08:14:36+5:302026-01-16T08:14:41+5:30
अचानक उन्होंने सामने बैठे अपने एक अतिथि, मनोज रूपड़ा, से पूछ लिया कि वे उनकी बातों से ऊब तो नहीं रहे और मनोज रूपड़ा ने ईमानदारी से कह दिया कि आप मुद्दे पर बोलें तो ज्यादा अच्छा रहेगा.

सत्ता का अनुगामी नहीं, रहनुमा है साहित्य
आप किसी को अपने घर बुलाएं और फिर उससे पूछें कि वह आपकी बातों से बोर तो नहीं हो रहा तो आप उससे क्या अपेक्षा करेंगे? यही न कि या तो वह आपसे कहेगा, अरे नहीं, आप तो बहुत अच्छी बातें बता रहे हैं, या फिर बोर हो रहा होगा तो कह देगा अपने मन की बात. ऐसे में आपसे अपेक्षा यह होती है कि आप शालीनता के साथ अपनी बात कहने का ढंग बदल देंगे. लेकिन यदि आप ऐसा न करके अपने अतिथि को अपने घर से निकल जाने और फिर कभी न बुलाने की बात कहने लगें तो आपको असभ्य और बदतमीज ही तो कहा जाएगा.
उस दिन छत्तीसगढ़ के संत घासीदास विश्वविद्यालय में ऐसा ही हुआ. विश्वविद्यालय ने केंद्रीय साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से हिंदी कहानी की दशा-दिशा पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था. देश के बड़े-बड़े साहित्यकार वहां उपस्थित थे. इनमें से एक मनोज रूपड़ा भी थे. मेजबान कुलपति शायद स्वागत भाषण दे रहे थे. अचानक उन्होंने सामने बैठे अपने एक अतिथि, मनोज रूपड़ा, से पूछ लिया कि वे उनकी बातों से ऊब तो नहीं रहे और मनोज रूपड़ा ने ईमानदारी से कह दिया कि आप मुद्दे पर बोलें तो ज्यादा अच्छा रहेगा.
कुलपति महोदय ने इसे अपना अपमान समझा और यह कह कर फटकारते हुए कि वरिष्ठ कहानीकार में वॉइस चांसलर से बात करने का विवेक नहीं है, उन्हें हाल से बाहर निकलने का आदेश दे दिया. रूपड़ा उठकर बाहर चले गए, पर यह प्रकरण देश भर में चर्चा का विषय बना हुआ है. सब तरफ कुलपति के ‘असभ्य’ व्यवहार की आलोचना हो रही है. जिसने भी वायरल वीडियो पर यह प्रकरण देखा-सुना है वह हैरान ही हो सकता है कि कुलपति जैसे ऊंचे आसन पर बैठा व्यक्ति इतना नीचा व्यवहार कैसे कर सकता है!
कुलपति ने तो अपने व्यवहार पर खेद व्यक्त नहीं किया लेकिन साहित्य अकादमी के अध्यक्ष ने इस घटना पर खेद व्यक्त करते हुए घोषणा की है कि संत घासीदास विश्वविद्यालय को आगे से अकादमी किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं देगी और न ही विश्वविद्यालय के साथ मिलकर कोई कार्यक्रम करेगी. यह एक स्वागत-योग्य निर्णय है.
बहरहाल, इसमें कोई संदेह नहीं कि विवादों में घिरे कुलपति ने सिर्फ एक साहित्यकार का नहीं, पूरे साहित्य-जगत का अपमान किया है. अपमान तो उन्होंने कुलपति के पद और अपने विश्वविद्यालय का भी किया है. जिन शब्दों में, और जिस लहजे में, कुलपति महोदय ने एक साहित्यकार की भर्त्सना की थी, होना तो यह चाहिए था कि उससे वहां उपस्थित सारे साहित्यकार और बाकी श्रोता भी, स्वयं को अपमानित महसूस करते. कुछ लोग अवश्य तब उठकर हाल से बाहर चले गए थे, पर सवाल यह है कि जो साहित्यकार नहीं गए, वे क्यों बैठे रहे?
वे चुप क्यों रहे, यह वही जानें, पर यह अपने आप में कोई रहस्य नहीं है कि सत्ता, चाहे वह राजनीतिक हो अथवा प्रशासनिक, अक्सर साहित्य को अपने अधीन रखना चाहती है. चाहती ही नहीं, अधीन मानती भी है.
संत घासीदास विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में कुलपति ने जो किया, वह शर्मनाक था, पर उस व्यवहार का विरोध न करके साहित्यकारों का वहां बैठे रहना भी कम शर्म की बात नहीं है.