सही मायनों में आज एक सच्चा ‘दादा’ हमसे बिछुड़ गया
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 29, 2026 09:53 IST2026-01-29T05:56:00+5:302026-01-29T09:53:22+5:30
गर्व से स्वयं को ‘विधानभवन में सर्वाधिक बार बजट प्रस्तुत करने वाला’ बताते थे, लेकिन उनके व्यवहार और बोलचाल में कभी अहंकार नहीं था.

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अनुभव और आयु दोनों में दादा मुझसे बड़े थे, लेकिन सरकार में साथ काम करते हुए हम मित्रों की भांति सहज और आत्मीय वातावरण में काम करते थे. केवल सहयोगी ही नहीं, बल्कि मेरे निकट मित्र रहे दादा के आकस्मिक निधन से मुझे अपने बड़े भाई को खो देने जैसी पीड़ा महसूस हो रही है. अजित दादा की वास्तविक पहचान थी-समयबद्धता, अनुशासन और प्रशासनिक दक्षता. चालीस वर्षों की राजनीतिक यात्रा में वे पहले जैसे थे, अंत तक वैसे ही बने रहे. साफगोई के कारण वे कभी-कभी कठोर लगते थे, लेकिन जब सामने वाला यह समझ जाता कि उनका साफ बोलना दरअसल उसके हित में है, तो उसके मन में भी दादा के प्रति सम्मान जाग उठता था. मैं मजाक में कहा करता था, ‘देवेंद्रजी दिन भर काम करते हैं, दादा सुबह से काम शुरू कर देते हैं और मेरा काम दोपहर के बाद शुरू होता है.
मानो हम तीनों ने समय का बंटवारा कर लिया हो.’ लेकिन वास्तव में दादा का दिन कई बार सुबह पांच या छह बजे ही शुरू हो जाता था. कोविड काल में तो वे स्वयं प्रतिदिन मंत्रालय के नियंत्रण कक्ष में उपस्थित रहते थे. अजित दादा सही अर्थों में अजातशत्रु थे. महाराष्ट्र की राजनीति में सत्तापक्ष हो या विपक्ष- सभी के वे मित्र थे. राजनीति में टीका-टिप्पणियां चलती रहती हैं,
लेकिन उनके प्रति किसी ने मन में वैर नहीं रखा. दूरदर्शी, स्पष्टवक्ता और अत्यंत अध्ययनशील नेता के रूप में वे हमेशा मेरी स्मृतियों में बने रहेंगे. दादा आठ बार उपमुख्यमंत्री रहे और उससे पहले मंत्री भी रहे. वे गर्व से स्वयं को ‘विधानभवन में सर्वाधिक बार बजट प्रस्तुत करने वाला’ बताते थे, लेकिन उनके व्यवहार और बोलचाल में कभी अहंकार नहीं था.
उनके काम की गति और निर्णय क्षमता हम सभी ने अनुभव की है. वित्त मंत्री के रूप में उन्हें लगभग सभी विभागों की जानकारी रहती थी, फिर भी उन्होंने कभी शिष्टाचार की मर्यादा नहीं तोड़ी. नीतिगत निर्णयों की घोषणा करते समय भी उन्होंने किसी की उपेक्षा नहीं की. वे अपनी बात पूरी स्पष्टता के साथ और साधिकार रखते थे.
वित्त मंत्री के तौर पर उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि राज्य की अर्थव्यवस्था संतुलित रहे और विकास कार्यों में कोई बाधा न आए. वे व्यावहारिक पहलुओं की गहराई से जांच करते थे. नई योजना या विचार सामने आने पर वे उसके सभी पक्षों की ठोस जांच करते. उनके त्वरित और ठोस निर्णय लेने की शैली के कारण विधायक और मंत्रिमंडल के युवा मंत्री भी उनकी कार्यशैली और दिनचर्या को लेकर जिज्ञासु रहते थे.
वरिष्ठता के दायित्व को निभाते हुए वे आवश्यकता पड़ने पर सख्ती से समझाने में भी संकोच नहीं करते थे. पूरा राज्य उन्हें ‘दादा’ पुकारता था. वे सच अर्थों में ‘दादा’ ही थे. अब अजित दादा हमारे बीच नहीं हैं. अब वे हमें कभी दिखाई नहीं देंगे यह बात मन स्वीकार ही नहीं कर पा रहा. मैं शिवसेना की ओर से उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं.