संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का अपमान निंदनीय
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 9, 2026 07:33 IST2026-03-09T07:33:07+5:302026-03-09T07:33:10+5:30
उनके अनुसार राष्ट्रपति जब राज्य में आती हैं या जाती हैं, तब उन्हें आधिकारिक सूचना मिलती है. उसके अनुसार वह सम्मान करती हैं.

संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का अपमान निंदनीय
अभी तक देश में प्रधानमंत्री और राज्यपालों के साथ राज्य सरकारों की तनातनी चलती थी, लेकिन पश्चिम बंगाल ने एक कदम और आगे बढ़ाकर राष्ट्रपति के साथ भी अनपेक्षित व्यवहार कर दिखाया है. राजनीतिक रूप से संभव है कि उनकी केंद्र की सरकार के साथ न बनती हो, किंतु उनके मन में देश के सर्वोच्च पद को लेकर आक्रोश आश्चर्यजनक है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी महकमा परिषद के फांसीदेवा क्षेत्र पहुंची थीं, जिसके लिए जगह काफी छोटी तय की गई थी. इसी के चलते माना गया कि बड़ी संख्या में संथाल समुदाय के लोग नहीं आ पाए.
हालांकि राष्ट्रपति के एक अन्य कार्यक्रम के लिए उपलब्ध कराया गया मैदान काफी बड़ा था और यहां लाखों लोग आ सकते थे. आम तौर पर राष्ट्रपति के दौरे के दौरान मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और डीजीपी की मौजूदगी अपेक्षित होती है. वहां स्वागत और विदाई केवल सिलीगुड़ी के मेयर ने की.
कथित रूप से प्रोटोकॉल में हुई लापरवाही को लेकर केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपना लिया है और राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है. राष्ट्रपति के दौरे के दौरान प्रोटोकॉल, कार्यक्रम स्थल, यात्रा मार्ग और अन्य व्यवस्थाओं से जुड़े सभी पहलू पूर्व निर्धारित होते हैं. उनका पूर्व अभ्यास तक किया जाता है, लेकिन ताजा मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि राज्य सरकार कॉन्फ्रेंस की आयोजक नहीं थी और उन्हें कार्यक्रम, आयोजकों या ‘फंडिंग’ की कोई जानकारी नहीं थी. उनके अनुसार राष्ट्रपति जब राज्य में आती हैं या जाती हैं, तब उन्हें आधिकारिक सूचना मिलती है. उसके अनुसार वह सम्मान करती हैं. किंतु राष्ट्रपति उनके राज्य में 50 बार जाएंगी तो हर बार कार्यक्रम में शामिल होना उनके लिए संभव नहीं होगा.
साल में एक बार आएंगी तो वह उनका स्वागत कर सकती हैं. चुनाव के समय में भी उनके कार्यक्रमों में शामिल होना संभव नहीं होगा. यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति के साथ यह व्यवहार लापरवाही या गलती से नहीं हुआ, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से इसकी जानकारी मुख्यमंत्री को थी, जिस पर अब वह सफाई देकर स्वयं को पाक-साफ साबित करना चाहती हैं. यह लोकतांत्रिक परंपराओं में बेहद दु:खद स्थिति है. मगर देश के कुछ राज्यों में यह नई परिपाटी आरंभ कर संघीय व्यवस्था को चोट पहुंचाई जा रही है.
राष्ट्रपति के पद का सम्मान दलीय मतभेदों से ऊपर है. यदि मुख्यमंत्री बनर्जी धरने पर बैठी थीं और राष्ट्रपति से उन्हें मिलने का अवसर मिल रहा था तो वह वहां भी अपनी शिकायत दर्ज कर सकती थीं. मगर उन्होंने अपमान करने का रास्ता चुना, जो निंदनीय है.
पहले भी इस प्रकार की कई घटनाएं उनके नाम पर लिखी जा चुकी हैं. उम्मीद की जानी चाहिए पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें टकराव का मार्ग अपनाने से बचेंगी. वह संवैधानिक पदों की गरिमा को बनाए रखेंगी और कोई ऐसा कदम नहीं उठाएंगी, जिससे देश और समाज में गलत संदेश जाए. आखिर मान-सम्मान बांटने से ही बढ़ता है.