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रक्षा क्षेत्र में आयात कम कर आत्मनिर्भर बन रहा भारत, रूस सर्वाधिक प्रभावित, सारंग थत्ते का ब्लॉग

By सारंग थत्ते | Updated: March 18, 2021 13:12 IST

भारत में 2011-15 और 2016-20 के बीच हथियारों के आयात में 33 फीसदी की कमी आई है और इसका सर्वाधिक प्रभाव रूस पर पड़ा है.

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ठळक मुद्देस्टॉकहोम के रक्षा थिंक टैंक सिपरी की जारी रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है.2018-19 और 2020-21 के बीच करीब 1.99 लाख करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई.भारत में 2011-15 और 2016-20 के बीच हथियारों के आयात में 33 फीसदी की कमी आई.

विश्व रक्षा बाजार में देशों के खर्च की जानकारी रखने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) द्वारा सोमवार को जारी रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि भारत में 2011-15 के मुकाबले 2016-20 के बीच हथियारों के आयात में 33 फीसदी की कमी आई है.

इसका सर्वाधिक प्रभाव रूस पर पड़ा है, भारत के रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करने के प्रयास के तहत हथियारों के आयात में कमी नजर आ रही है. अमेरिका से भी भारत में हथियारों के आयात में कमी आई है. पिछले कुछ वर्षो में भारत ने स्वदेशी एवं घरेलू रक्षा उद्योग को पूर्णता देने के लिए कई उपाय अमल में लाए हैं ताकि सैन्य साजो-सामान के आयात पर निर्भरता कम हो सके.

सिप्री की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2013-17 की अवधि में वैश्विक स्तर पर हथियारों और रक्षा उपकरणों के आयात में भारत की हिस्सेदारी 12 फीसदी रही है. भारत की रक्षा संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के मामले में लंबे समय से हम रूस और इजराइल पर निर्भर रहे हैं.

पिछले कुछ वर्षों से हिंद महासागर और एशिया में चीन के बढ़ते कदमों को देखते हुए अमेरिका और भारत के बीच के रक्षा संबंधों में काफी प्रगति हुई है. पिछले कुछ सालों में 2013-17 की तुलना में अमेरिका द्वारा भारत को हथियारों के निर्यात में 550 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है. इस वजह से अमेरिका भारत का दूसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है.

पिछले एक दशक में भारत और अमेरिका के बीच हुए 15 अरब डॉलर के रक्षा संबंधी समझौतों के आंकड़ों में इसे देखा और समझा जा सकता है. बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के उपरांत कोई नई डील अब तक हरी झंडी नहीं ले सकी है. अब देखना होगा कि अमेरिका का नया प्रशासन आगे भारत को कितनी अहमियत देता है. अभी हाल में क्वाड देशों के सम्मेलन में अमेरिका का होना कुछ ठोस संकेत दे रहा है.

सिप्री के अनुसार 2016-20 के दौरान भारत के पास वैश्विक हथियारों के निर्यात में 0.2 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी, जिससे भारत दुनिया के प्रमुख हथियारों का 24 वां सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है.  सिप्री की रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस और चीन दोनों के हथियार निर्यात में कमी आई है. चीन द्वारा हथियारों के निर्यात में 2016-20 के दौरान 7.8 फीसदी की कमी आई है.

चीनी हथियारों के बड़े खरीदारों में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अल्जीरिया थे. सिप्री ने कहा कि अमेरिका हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक है और 2011-15 और 2016-20 के दौरान उसका हथियारों का निर्यात 32 फीसदी से बढ़कर 37 फीसदी हो गया. रिपोर्ट के मुताबिक, हालांकि, रूस अभी भी भारत को सबसे ज्यादा हथियार और गोला-बारूद देने वाला देश है, लेकिन इस अवधि (2011-15 और 2016-20) के बीच रूस की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से घटकर 53 प्रतिशत हो गई है. सिप्री की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व रक्षा बाजार में हथियारों के निर्यात में अमेरिका प्रथम स्थान पर है.

दूसरा नंबर है रूस का और फिर फ्रांस, जर्मनी और चीन का नंबर आता है. हथियारों के आयात में सऊदी अरब सबसे आगे है. इसके बाद भारत का नंबर आता है. जबकि मिस्र, ऑस्ट्रेलिया और चीन हमारे बाद हैं इस सूची में. रिपोर्ट के मुताबिक भारत अब रूस की बजाय अमेरिका, फ्रांस और इजराइल जैसे देशों से हथियार आयात कर रहा है.

रिपोर्ट की राय है कि चीन और पाकिस्तान से चल रही गर्माहट के चलते अगले पांच सालों में भारत के आयात में वृद्धि होने की संभावना है. भारत अब युद्धक फाइटर जेट एलसीए तेजस, डीआरडीओ द्वारा निर्मित टैंक, मिसाइल और गोलाबारूद को आयात से ज्यादा तवज्जो दे रहा है.

भारत स्वयं पनडुब्बियों का निर्माण हो या फिर नौसेना के युद्धपोत, देश में ही तैयार कर रहा है. राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में रक्षा राज्यमंत्नी श्रीपद नाइक ने कहा कि घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 2018-19 और 2020-21 के बीच करीब 1.99 लाख करोड़ रुपए की मंजूरी दी गई थी.

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