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जवाहर सरकार का ब्लॉगः सीमा का मसला नहीं, बल्कि दो प्राचीन सभ्यताओं का टकराव

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: July 11, 2020 11:36 IST

श्रीलंका के बौद्ध साहित्य में दर्ज घटनाओं के अनुसार, सम्राट अशोक अपने शुरुआती वर्षों में कथित रूप से आक्रामक थे, लेकिन कलिंग युद्ध (260 ईसापूर्व) के भयावह खून-खराबे के बाद वह पूरी तरह से शांतिवादी बन गए. वहीं दूसरी ओर, किन (जिसे ‘चिन भी कहा जाता है) खूनी युद्धों की एक लंबी शृंखला के बाद चीनी लोगों के पहले एकछत्र शासक के रूप में उभरा.

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जवाहर सरकार आज के परेशानियों भरे दौर में, जब दुनिया के दो सबसे बड़े देशों के सैनिक सीमा पर आमने-सामने हैं, आइए इस बैरभाव के मूल कारणों का पता लगाने की कोशिश करें. भारत ने चीन को बौद्ध धर्म का उपहार दिया है और इसका दोनों ही देशों को अभिमान है. इसी तरह प्राचीन काल में भारत आने वाले चीन के भिक्षुओं का दोनों देश सम्मान करते हैं. तो फिर इस तरह का बैर भाव कहां से आया? सबसे पहले हमें यह समझने की जरूरत है कि भारत और चीन दुनिया के केवल दो राष्ट्र ही नहीं हैं बल्कि वास्तव में वे दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी सभ्यताओं में से हैं. इसका मतलब है कि वे उन सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनकी जड़ें उनके इतिहास में गहराई तक जमी हुई हैं. वर्तमान संघर्ष भी उनकी सभ्यताओं के दृष्टिकोण की भिन्नता का द्योतक है.

ऐतिहासिक घटनाओं और तथ्यों के आधार पर हम उस अवधि को जान सकते हैं, जब दोनों देशों के रास्ते अलग-अलग दिशाओं की ओर  मुड़े थे. यह विचित्र है कि इतिहास की किताबें ईसा पूर्व 260 से 230 के बीच के उन उल्लेखनीय दशकों की ओर कोई इशारा नहीं करती हैं जब दो महाद्वीपों के बीच मील का पत्थर साबित होने वाली घटनाएं हुई थीं. हम पाते हैं कि भारत के महान सम्राट अशोक (269 से 232 ईसापूर्व) और चीन के पहले सम्राट किन शी हुआंग (246 से 210 ईसापूर्व) के शासनकाल में कुछ दशक हमने साझा किए. दोनों साम्राज्य एक-दूसरे से बहुत दूर स्थित थे और हमें ध्यान देने की जरूरत है कि किस तरह राष्ट्र की संकल्पना, शासक और जनता के बीच संबंध, शासन व्यवस्था-हर चीज को लेकर उनका दृष्टिकोण एकदम अलग-अलग था.

श्रीलंका के बौद्ध साहित्य में दर्ज घटनाओं के अनुसार, सम्राट अशोक अपने शुरुआती वर्षों में कथित रूप से आक्रामक थे, लेकिन कलिंग युद्ध (260 ईसापूर्व) के भयावह खून-खराबे के बाद वह पूरी तरह से शांतिवादी बन गए. वहीं दूसरी ओर, किन (जिसे ‘चिन भी कहा जाता है) खूनी युद्धों की एक लंबी शृंखला के बाद चीनी लोगों के पहले एकछत्र शासक के रूप में उभरा. उसी के नाम पर देश का नाम ‘चीन’ पड़ा. उसकी तलवार खून से सनी रहती थी. उसने स्थानीय भिन्नताओं को दूर करके संपूर्ण समाज के लिए एक ही लिपि प्रचलित  की. इसी कालखंड में दोनों देशों की अलग-अलग दिशाएं स्पष्ट हो जाती हैं. 

चीन के सम्राट ने तलवार के जोर से एकरूप समाज की स्थापना की, जबकि भारत के शासक ने विविधता को प्रोत्साहन दिया. सम्राट अशोक ने अपने साम्राज्य के दूर-दराज के क्षेत्रों में 30 से अधिक शिलालेख स्थापित करवाए जिनमें प्राकृत, ग्रीक और अरामाइक जैसी अलग-अलग भाषाओं का उपयोग किया. उनके शिलालेखों में ब्राह्मी के विभिन्न रूपों से लेकर खरोष्ठी और अन्य लिपियों का भी उपयोग किया गया है. इस प्रकार सम्राट अशोक ने स्थानीय जनता की संस्कृति और भावनाओं का सम्मान किया.

चीन में प्राचीन काल से ही भाषा और संस्कृति के बारे में स्थानीय विविधताओं के लिए कोई स्थान नहीं था. उसका हमेशा से यह आग्रह रहा है कि उसके पूरे क्षेत्र में एक ही भाषा और लिपि होनी चाहिए. चीन को आश्चर्य होता है कि भारत 22 प्रमुख भाषाओं, दर्जनों अन्य भाषाओं और 600 से अधिक बोलियों के साथ एक राष्ट्र के रूप में कैसे कायम है. चीन में लगभग 23 शताब्दियों पहले न सिर्फ पूरे देश के लिए एक ही सिक्का चलता था बल्कि गाड़ियों की धुरी की लंबाई भी एक समान होती थी. इससे विचलन को गंभीर रूप से दंडित किया जाता था और असंतुष्टों को मार दिया जाता था. यह भावना अभी भी वहां बरकरार है. इसके विपरीत सम्राट अशोक ने दया, दान, सच्चाई, पवित्रता, सौम्यता और सदाचार को बल देने वाले धर्म का प्रचार प्रसार किया. उसके सातवें क्रमांक के  प्रमुख शिलालेख में यह विचार स्पष्ट रूप से दर्ज हैं. 

कहने का मतलब यह कि भारत में मांसाहारियों के मन में भी सजीवों के प्रति जो दयाभाव दिखाई देता है, उसका चीनियों में लेशमात्र भी नहीं है. भारत द्वारा जहां किसी भी देश पर हमला करने का कोई रिकॉर्ड नहीं है, वहीं चीन की आक्रामकता का लंबा इतिहास है.  हमने भले ही अपने सभी वांछनीय आदर्शों का पालन नहीं किया है लेकिन हम इसके लिए अपराधबोध महसूस करते हैं और जानते हैं कि हमें क्या करना चाहिए था. सभी बातों में हम कुछ विधि निषेधों का पालन करते हैं और हमारा आहार इसका केवल एक उदाहरण है. लेकिन चीन की संस्कृति संयम को कमजोरी मानती है. हालांकि तथ्य यह है कि हमें अपने पड़ोसी देश के साथ ही रहना होगा, इसलिए उसके स्वभाव और संस्कृति को समझते हुए उसके अनुसार अपनी रणनीतियों को समायोजित करना होगा. 

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