चींटी के ढेर पर पैर रखना...

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: February 26, 2026 07:36 IST2026-02-26T07:35:41+5:302026-02-26T07:36:03+5:30

कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्रांति में एकाधिकार जैसी प्रवृत्तियां पैदा हो सकती हैं, जिसका शायद कुछ ही लोगों को लाभ मिले.

India AI Impact Summit 2026 Stepping on an anthill written by Ketil Staalesen | चींटी के ढेर पर पैर रखना...

चींटी के ढेर पर पैर रखना...

केटिल स्टेलसेन

पिछले सप्ताह मैंने एक बिल्कुल अलग दुनिया का दौरा किया. मैं काम के सिलसिले में नई दिल्ली में था. हमेशा की तरह, शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाना था, तो टैक्सी से जाना स्वाभाविक था. एक वातानुकूलित टैक्सी. यह एक गरम देश है. वातानुकूलित कार एक शीशों में बंद, छोटी-सी दुनिया की तरह महसूस होती है. बाहर चाहे जैसा भी मौसम हो, अंदर ठंडा और आरामदायक. दिल्ली में काम के लिए आने वाले अधिकांश मेरे जैसे लोग यही चुनते हैं.
लेकिन सड़कों पर उस दिन सामान्य से भी अधिक भीड़ थी. सम्मेलन आयोजक ने कुछ हद तक खुद को दोषी ठहराया. पुलिस ने सड़कों पर गाड़ियों को घटाने के लिए कुछ रास्ते बंद कर दिए.

मैंने सोचा कि इससे बेहतर टहल ही लिया जाए. नई दिल्ली में सुबह की भीड़ के बीच चलना एक रोचक अनुभव है. जीवन तेज है, गंध और शोर-शराबा भरपूर हैं. खास कर उनके लिए जो ढीले-ढाले छोटे से नॉर्वेजियन शहर के जीवन के आदी हैं.

सम्मेलन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बारे में था. मैं उसके बारे में आगे लिखूंगा. जब हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात करते हैं तो हम अक्सर भविष्य की कल्पना करते हैं. लेकिन यहां खड़े होकर लगा कि भविष्य तो पहले ही आ चुका है.
देश पहले ही बदल चुका है. 22 वर्ष पहले भारत एक बिल्कुल अलग देश था.

आइए सड़कों से शुरू करें. हर दिशा में ठसाठस भीड़ है, और वाहनों का घनत्व बढ़ रहा है. लगभग हर चीज की अपनी गति है. मेरा मानना है कि अब यहां बसें बिजली से चलनी चाहिए. निजी कारें भी बैटरी पर चल सकती हैं. अच्छी वायु-गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत है.

संस्कृति बदल चुकी है. 22 वर्ष पहले मैंने भारत के अंग्रेजी अखबार में ‘पीडीए’ शब्द के बारे में पढ़ा था. मुझे लगा कि ‘पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट’ होगा, लेकिन भारत में इसका अर्थ ‘पब्लिक डिस्प्ले ऑफ अफेक्शन’ था. इसका मतलब था कि युवक-युवती हाथ में हाथ डाले चलें, गले मिलें या चूमें. ऐसी बहसें अब भारत में देखने को नहीं मिलती. अब यह यहां स्वाभाविक है. युवा उन्मुक्त हैं, उनके हाथों में स्मार्टफोन हैं.

पहले युवतियां पारंपरिक कपड़े पहनती थीं (या पूरी तरह ढकी हुई होती थीं). कानों के बड़े, झूलते, चमकीले सोने के झुमके, हर इंच कपड़ों से ढका हुआ. यह एक समय का संकेत था जब सुपारी और तंबाकू चबाना सामान्य था. जैसे ओस्लो के उपनगरों में धूम्रपान से पहले और बाद जैसा अंतर.

यह क्रांति केवल एक किस्सा नहीं है. यह यहां के लोगों के जीवन का हिस्सा है. हालांकि संस्कृति बदलना आसान नहीं है, लेकिन यहां यह हुआ है.

आईटी उद्योग दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में से एक है. सैकड़ों-हजारों लोगों को अपनी पहली स्थायी नौकरी इसी उद्योग से मिली है. एक मध्यवर्ग विकसित हुआ है, जो उपभोग कर सकता है. यह एक विशाल छलांग है. अब लोग स्मार्टफोन से भुगतान करते हैं.

परंपराओं को चुनौती दी जा रही है. महत्वाकांक्षाएं  विशाल हैं. यह स्पष्ट है कि भारत तरक्की कर रहा है. अब केवल सरल आईटी सेवाएं नहीं, बल्कि उन्नत तकनीकी सेवाएं, यहां तक कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी भारत में आ गई है. जो प्रगतिशील विचार पहले से घूम रहे थे, उन्होंने नई दिशा ली है. जिन लोगों से मैं मिला, उनमें से हजारों की नौकरियां बदल गई हैं. सड़क पर भारी दबाव है. बसें. यातायात. अव्यवस्था. कारें. मोटरसाइकिलें. साइकिलें. रिक्शे. अलग-अलग रंग. कई लोग सामान ढोते हुए. कई काम पर जाते हुए.

लेकिन इन लोगों का क्या होगा यदि तकनीक वास्तव में वह कर दे जो संभावना के रूप में बताया जा रहा है?
यदि आज लाखों भारतीय जो तीन-पहिया टैम्पू से यात्रियों को ढोते हैं, उन्हें एयर-कंडीशन वाली ड्राइवर-रहित कारों से मूल्य पर प्रतिस्पर्धा करनी पड़े? यदि मोटरसाइकिल या साइकिल द्वारा पहुंचाया जाने वाला सामान ड्रोन द्वारा पहुंचाया जाए? यदि दुकानों के कर्मचारी रोबोटों से बदल दिए जाएं, जो आदमी से बेहतर और सस्ते हों?

दुनियाभर में लोग यह सोच रहे हैं कि श्रम बाजार में क्या होने वाला है. यह ज्ञात है कि नई तकनीक परिवर्तन लाती है. लेकिन नॉर्वे में हम अभी भी संरक्षित क्षेत्रों में हैं. हमारे आय स्तर और संसाधन हमें सुरक्षा देते हैं. जबकि अन्य देशों में श्रम एक उलझा हुआ क्षेत्र है.

यदि किसी देश को अचानक बड़े पैमाने पर बेरोजगारी मिलती है, तो वह स्थिर नहीं रहेगा. विरोध होंगे. और वे हिंसक भी हो सकते हैं.

हम कहते हैं कि हमें जीवन भर सीखते रहना चाहिए. यह सही है. लेकिन हर कोई आईटी विशेषज्ञ नहीं बन सकता. इसे निराशावाद के रूप में न समझें. कोई भी हमसे हमारी नौकरियां नहीं छीन रहा है. हम कल भी काम पर जाएंगे. लेकिन इस पर सोचना आवश्यक है.

नॉर्वे में हमें परिश्रम का फल मिलता है. लेकिन दुनिया में अरबों लोग अत्यंत कठोर श्रम करते हैं, जो गायब भी हो सकता है. पिछली औद्योगिक क्रांति के दौरान भी कई लोग पीछे छूट गए. हालांकि उसी समय नई नौकरियां भी बनीं. कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्रांति में एकाधिकार जैसी प्रवृत्तियां पैदा हो सकती हैं, जिसका शायद कुछ ही लोगों को लाभ मिले.
संभल कर चलना होगा. एक गलती हुई और हमारे पैर चींटियों के ढेर पर होंगे.

Web Title: India AI Impact Summit 2026 Stepping on an anthill written by Ketil Staalesen

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