काश! केजरीवाल बाकी नेताओं से अलग होते

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 27, 2026 07:23 IST2026-03-27T07:22:59+5:302026-03-27T07:23:03+5:30

वैकल्पिक राजनीतिज्ञ बनने के अपने वादों को देखते हुए मुख्यमंत्री को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था.

I wish Kejriwal was different from other leaders | काश! केजरीवाल बाकी नेताओं से अलग होते

काश! केजरीवाल बाकी नेताओं से अलग होते

अभिलाष खांडेकर

यह सर्वविदित है कि राजनेता गिरगिट से भी तेजी से रंग बदलते हैं. यह केवल अपना दल और विचारधारा बदलने की बात नहीं है, बल्कि सत्ता हथियाने के बाद खुद को अंदर-बाहर से पूरी तरह से बदल लेने की है. इस कड़ी में नवीनतम नाम अरविंद केजरीवाल का है, जो दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री थे और जिन्होंने निराशा से घिरे भारतीयों के बीच वैकल्पिक राजनीति की नई उम्मीद जगाई थी. परंतु ‘कैग’ की हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि वे अंदर से बदल गए थे और उन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं को अन्य चीजों से ऊपर रखा. कैग उस शराब घोटाले की बात नहीं कर रहा है जिसके लिए उन्हें कारावास की सजा  हुई थी; वह ‘शीश महल’ की बात बता रहा है.

वर्ष 2012-13 में केजरीवाल राष्ट्रीय नायक बन गए थे क्योंकि लोग कांग्रेस के भ्रष्टाचार से तंग आ चुके थे. ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के शक्तिशाली अभियान ने निराश भारतीयों को एकजुट कर दिया था. शिक्षित युवा बड़ी संख्या में पार्टी में शामिल हुए क्योंकि उन्हें अंधकारमय सुरंग के अंत में कोई रोशनी दिखने लगी थी. जाहिर है, वे अन्ना हजारे की बातों पर विश्वास करते थे. भावी मुख्यमंत्री केजरीवाल की सादगी ने उन्हें प्रभावित किया था.

उन्होंने उस नए दल को एकजुट होकर मतदान किया जिसका नाम आम आदमी की वास्तविक चिंताओं से मेल खाता था. उसने भविष्य के लिए आशा जगाई थी. आम आदमी पार्टी (आप) भारत के राजनीतिक रूप से धुंधले क्षितिज पर चमकता सितारा बनी थी.

लेकिन सत्ता का स्वाद चखने के बाद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जल्द ही एक और भारतीय राजनीतिक दल बनकर रह गई. उन्होंने अपने सभी महत्वपूर्ण साथियों को दरकिनार कर दिया, जिन्हें वे अपने लिए खतरा मानते थे. लेकिन लगभग तीन कार्यकाल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद उनकी असलियत सामने आ ही गई. दिल्ली विधानसभा चुनावों के पिछले नतीजों से साफ हो गया कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस और भाजपा के मुकाबले एक नाकाबिल विकल्प थी.

‘कैग’ की नवीनतम रिपोर्ट (2022) के अनुसार, केजरीवाल ने नई दिल्ली के फ्लैगस्टाफ रोड स्थित अपने आधिकारिक आवास के सौंदर्यीकरण और नवीनीकरण पर 33.6 करोड़ रुपए खर्च किए. यह राशि स्वीकृत राशि से 342 प्रतिशत अधिक बताई जा रही है. भ्रष्टाचार के आरोप भले ही राजनीतिक हों, लेकिन ‘शीश महल’ राजनीतिक नहीं है.
खर्च की गई राशि देखकर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ.

यह उस दौर में बहुत कम है जब बड़े राज्य और उनके नेता अपने ऊपर कहीं अधिक खर्च कर रहे हैं और सरकारी खजाने में रोजाना छेद कर रहे हैं. मुझे दुख इस बात पर होता है कि राजनेता विलासितापूर्ण सुख-सुविधाओं का आनंद लेने के लिए सरकारी खजाने पर टूट पड़ते हैं.

भाजपा के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने नाम पर दो आलीशान बंगले आवंटित करवाए और केजरीवाल से कहीं अधिक खर्च किया. इनमें से एक मजबूत और अच्छी तरह से निर्मित सरकारी बंगला जर्जर घोषित कर दिया गया; नगर निगम अधिकारियों ने राजनैतिक दबाव में आकर उसे ध्वस्त कर दिया. जल्द ही वहां एक नया बंगला बनाया जा रहा है. एक अन्य मुख्यमंत्री ने अपने सुंदर और विशाल बंगले की सीमा को बढ़ाकर आम जनता द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सड़क तक पहुंचा दिया.

करदाताओं के पैसे से बंगले के अंदर निर्माण और नवीनीकरण का काम जारी है और कोई भी मौजूदा नियम इसे रोक नहीं सकता. मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों को लगता है कि वे जीवनभर वहीं रहेंगे!

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनेता जनता के धन का बेहिसाब दुरुपयोग अपनी निजी सुख-सुविधाओं पर करते नजर आ रहे हैं और कोई बोलने वाला नहीं है. भारत में अनगिनत उदाहरण हैं जहां राजनीतिक नेता चुनाव जीतने के बाद हर तरह के लाभ तलाशने में जुट जाते हैं और उस जनता की अनदेखी करते हैं जिसने उन्हें सत्ता में पहुंचाया है.

अगर किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा देश के लगभग सभी मुख्यमंत्रियों का ठीक से ऑडिट किया जाए, तो वे स्वयं पर बेहिसाब खर्च के मामले में दोषी पाए जाएंगे, जिनमें भाजपा के मुख्यमंत्री और मंत्री भी शामिल हैं. मध्यप्रदेश के एक मंत्री के पास हूटर लगी छह सरकारी गाड़ियां हैं और उनके आवास-सजावट आदि पर लाखों रुपए खर्च हुए हैं.

फिर भी, मुझे लगता है कि केजरीवाल दूसरों से ज्यादा दोषी हैं. कांग्रेस नेता सार्वजनिक जीवन में सादगी या ईमानदारी की बात कम ही करते थे, लेकिन केजरीवाल बार-बार करते थे. तब उन्हें ऐसे आलीशान घर की क्या जरूरत थी? चुनाव से पहले तो वे आम आदमी थे. आखिर उनमें इतना बदलाव क्यों आया?

उनकी पूर्ववर्ती शीला दीक्षित ने उसी बंगले में 15 वर्षों तक सादगी भरा जीवन व्यतीत किया. केजरीवाल ज्यादा से ज्यादा उसकी मरम्मत करवाकर नया रंग-रोगन करवा सकते थे. लेकिन 33 करोड़ रुपए? माफ कीजिए, यह सादगी नहीं थी. भाजपा द्वारा ‘शीश महल’ कहे जाने वाले इस बंगले पर खुलकर जनता का पैसा खर्च किया गया. वैकल्पिक राजनीतिज्ञ बनने के अपने वादों को देखते हुए मुख्यमंत्री को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं था. उन्हें सार्वजनिक जीवन में एक मिसाल कायम करनी चाहिए थी, लेकिन वे असफल रहे.

मैंने भाजपा नेताओं का सादगी भरा जीवन देखा है. इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष, स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे, इस सूची में सबसे ऊपर हैं. उनके शिष्य कैलाश जोशी मप्र के मुख्यमंत्री के रूप में बेहद सरल रहे थे. लेकिन वह भाजपा आज की दिखावटी भाजपा से बिल्कुल अलग थी. उधर, ज्योति बसु को छोड़कर वामपंथी दलों के सभी नेता भी सादगीपूर्ण रहे हैं. त्रिपुरा के माणिक सरकार को भी जरा याद कीजिए.

केजरीवाल ने जेल से रिहा होने के बाद खुद के बारे में कहा था कि वे भ्रष्ट नहीं हैं. फिर भी इतिहास में उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाएगा जिन्होंने भारत में  एक तीसरी व ईमानदार शक्ति बनने की जरूरत के समय लोगों की उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया. यही उनका सबसे बड़ा अपराध है!

Web Title: I wish Kejriwal was different from other leaders

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