एरिक फ्रोम की द आर्ट ऑफ लविंग और भगत सिंह का प्रेम
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 16, 2026 05:41 IST2026-02-16T05:41:59+5:302026-02-16T05:41:59+5:30
भगत ने इतालवी क्रांतिकारी मैजिनी के पहले विद्रोह में विफल होने का हवाला देते हुए लिखा, ‘‘मैजिनी आत्महत्या कर लेता, अगर उसकी प्रेमिका उसे प्रेमपत्र नहीं लिखती.’’

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सुनील सोनी
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह ने जब सेंट्रल एसेंबली में बम फेंका, तो ऐन पहले वे सुखदेव को वह खत लिख रहे थे. विडंबना ही है कि उस खत को अंग्रेजों ने दोनों के साजिश से जुड़े होने का सबूत माना. जानीदोस्त सुखदेव के ‘जुल्फों में फंस जाने’ के ताने से भगत इतने खफा थे कि बोलचाल बंद थी, पर सफाई जरूरी थी. ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लिखनेवाले भगत ने सुखदेव को लिखा, ‘‘प्रेम आवेग के अलावा और कुछ नहीं, लेकिन कोई पाशविक वृत्ति भी नहीं. यह बहुत मधुर मानवीय भावना है. प्रेम कभी भी पाशविक नहीं हो सकता. प्रेम मनुष्य के चरित्र को ऊंचा उठाता है.
सच्चा प्रेम कभी विफल नहीं होता. यह जीवन में चला आता है... नई राह खोजकर. कोई नहीं बता सकता कि कब.” भगत ने इतालवी क्रांतिकारी मैजिनी के पहले विद्रोह में विफल होने का हवाला देते हुए लिखा, ‘‘मैजिनी आत्महत्या कर लेता, अगर उसकी प्रेमिका उसे प्रेमपत्र नहीं लिखती.’’ 23 मार्च 1931 को सुखदेव-भगत साथ फांसी चढ़े, उसके कई दिनों बाद वह खत ‘प्रेम हमें ऊंचा उठाता है...’ शीर्षक से छपा.
संभवत: ‘मतवाला’ में ‘नास्तिक’ के साथ. भावना के उद्वेग में बहना नहीं, संयम के साथ ग्रहण करना और बनाए रखना. इससे वह मिथक भी टूटा कि तर्कवादियों को भावना-संवेदना से क्या काम? 1924 में प्रेम की वैश्विक धारणा को लेकर उनके आलेख की यह पुष्टि थी. यह महज संयोग ही है कि फ्रोम सन् 1900 में 23 मार्च को जन्मे और भगत सिंह के फांसी चढ़ने की चौथाई सदी बाद 1956 में ‘द आर्ट ऑफ लविंग’ लिखी और प्रेम की वे सारी अतीतवादी धारणाएं तोड़ीं, जो भावनात्मक संवेग को किसी परिणति में तब्दील देखना चाहती हैं यानी शारीरिक आकर्षण, विवाह, संतानोत्पत्ति और उत्तराधिकार.
फ्रोम की पहली दोनों किताबें, 1941 में ‘एस्केप फ्रॉम फ्रीडम’ और 1947 में ‘मैन फॉर हिमसेल्फ’ विशुद्ध राजनीतिक ग्रंथ माने जाते हैं, क्योंकि वे मानवीय चरित्र के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत हैं. लेकिन, ‘द आर्ट ऑफ लविंग’ ने इसे इनसानी भावना का द्योतक बना दिया, जिसमें मानवतावाद के सिद्धांत का पुनर्लेखन माना जा सकता है.
रूथ नंदा एंशेन ने 1941 में इनसानी फितरत, जीवन प्रकृति, ज्ञान व जीवन के संबंध का मूल्यांकन व विश्लेषण ‘साइंस ऑफ कल्चर’ नामक श्रृंखला को शुरू किया, तो फ्रोम की ‘द आर्ट ऑफ लविंग’ सबसे प्रमुख थी. इस किताब को द्वितीय विश्वयुद्ध की वजह से यूरोप और अमेरिका में बदल रहे परिवार के मतलब के आलोक में देखा जा सकता है, जिसमें फ्रोम ने साफ किया कि प्रेम केवल इनसानी लालसा नहीं है,
वह संगीत तथा चित्रकला की तरह कला है. उसे चेतना के जागृत रूप के साथ सीखा जाना चाहिए; सैद्धांतिकी अभ्यास यानी अनुशासन, एकाग्रता, धैर्य के साथ. हम कब प्रेम करते हैं, क्या सचमुच प्रेम करते हैं या वह सिर्फ अहंकार है! बच्चे को कैसे प्रेम करना सिखाया जाए, ताकि वह बड़ा हो, तो समझ के साथ कि प्रेम महज हार्मोनल उद्वेग नहीं है.
फ्रोम कहते हैं कि सच्चा प्रेम सिर्फ शारीरिक मिलन नहीं है, वह पूरा स्वभाव व प्रवृत्ति है. इसमें दूसरों की चिंता करना, जिम्मेदारी उठाना, सम्मान करना और ज्ञान पाना भी है. फ्रोम भी भगत सिंह जैसे इसे विश्वप्रेम में आबद्ध देखते हैं, जहां बुनियादी तत्व बंधुत्व है. ममता दूसरे और स्वार्थ तीसरे दौर में ले जाता है, जहां शारीरिक प्रेम का एक पायदान है.
मीरा या कबीर की तरह निर्गुणप्रेम यहां ईश्वरीय नहीं, जानने का उत्कर्ष है. फ्रांसीसी न्यूवेव सिनेमा के स्तंभ और गोदा और त्रूफो के गुरु एरिक रोहमर की ‘सिक्स कॉन्टेस मोरॉक्स’ प्रेम की वे कहानियां हैं, जो इस धारणा को पुष्ट करती हैं. फ्रोम ने प्रेम को ‘बायोफीलिया’ कहा, तो विलक्षण कीटविज्ञानी ई.ओ. विल्सन ने 1984 की किताब ‘बायोफीलिया’ में समझाया कि इनसान कैसे प्रकृति व अन्य जीवरूपों से रिश्ते बनाने में कुशल होते हैं. यानी आम लोग घरेलू या जंगली जानवरों की देखभाल क्यों करते हैं और कभी-कभार उन्हें बचाने के लिए जान जोखिम में क्यों डाल देते हैं या वे घरों में अथवा आसपास फूल-पौधे क्यों रखते हैं.
बिल्कुल वैसे ही, जैसे कि अरस्तू ने कहा था कि ‘जीवन से प्रेम’ ही सर्वोच्च मानवीय गुण है. लाओत्से ‘जूडो’ के बारे में सिखाते हुए प्रकारांतर में प्रेम का सिद्धांत ही कहते हैं... यानी जब कोई घूंसा मारे, तो प्रतिकार के बजाय एकाकार हो जाओ... तब घूंसे के उस प्रहार को किसी एक अंग के बजाय पूरा शरीर सहेगा, जिससे घूंसे की शक्ति क्षीण होकर खो जाएगी. बर्दाश्त को सीखना भी प्रेम है.