विरोध नीतियों का हो, व्यक्तियों का नहीं
By विश्वनाथ सचदेव | Updated: February 18, 2026 05:39 IST2026-02-18T05:39:31+5:302026-02-18T05:39:31+5:30
नेता प्रतिपक्ष के आचरण की आलोचना करने वाला यह प्रस्ताव यदि पारित हो जाता है तो राहुल गांधी को न केवल संसद की सदस्यता से वंचित होना पड़ेगा, अपितु जीवन भर भारत की संसद के सदस्य नहीं बन पाएंगे!

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नेता प्रतिपक्ष के रूप में कांग्रेस के राहुल गांधी की भूमिका, विशेषकर उनके भाषणों को लेकर जहां एक ओर उनकी तीखी आलोचना होती है, वहीं दूसरी ओर उनके प्रशंसकों की भी कमी नहीं है. उनके चाहने वाले यह मानते हैं कि बीते हुए कल के राहुल गांधी और आज के नेता प्रतिपक्ष में बहुत अंतर आया है. यह भी सही है कि सत्ता-पक्ष, यानी भाजपा के सांसद उनकी भूमिका को लेकर अक्सर परेशान होते दिखते हैं. इस परेशानी का एक उदाहरण वह प्रस्ताव है जो भाजपा के एक ‘प्रखर’ कहलाने वाले नेता ने लोकसभा में रखा है.
नेता प्रतिपक्ष के आचरण की आलोचना करने वाला यह प्रस्ताव यदि पारित हो जाता है तो राहुल गांधी को न केवल संसद की सदस्यता से वंचित होना पड़ेगा, अपितु जीवन भर भारत की संसद के सदस्य नहीं बन पाएंगे! हालांकि इस संदर्भ में अभी संशय बना हुआ है, पर यह सही है कि भाजपा के सांसद ने अपने प्रस्ताव में यह मांग रख कर सत्तारूढ़ पक्ष के इरादों को अवश्य उजागर कर दिया है.
यह सही है कि संसद या विधानसभाओं के सदस्य अपनी सोच, अपनी विचारधारा और अपनी मान्यताओं के आधार पर भी निर्वाचित होते हैं लेकिन विरोधी विचारधारा का मतलब एक-दूसरे का दुश्मन होना नहीं होता. हमारे विचार एक-दूसरे से भिन्न हो सकते हैं, हम पृथक नीतियों को मानने वाले हो सकते हैं. एक-दूसरे की नीति की आलोचना करना भी गलत नहीं है,
पर गलत यह तब हो सकता है जब आलोचना जरूरत से ज्यादा और अनावश्यक रूप से तीखी हो जाए. ऐसी कोई भी आलोचना एक-दूसरे के रिश्ते में कड़वाहट पैदा कर दे तो उसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता. इसलिए, जब ऐसी कोई कोशिश होती दिखाई दे जिसमें पारस्परिक कटुता झलकती हो, तो ऐसी कोशिश करने वाले की नीयत पर शक होना स्वाभाविक है.
राहुल गांधी के खिलाफ ‘सबस्टेंटिव मोशन’ ऐसी ही कोशिश का एक उदाहरण लग रहा है. नेता विपक्ष के सवालों का जवाब नेता विपक्ष को ही मैदान से हटाना नहीं हो सकता. यह सरकार का दायित्व बनता है कि वह अपनी नीतियों का औचित्य प्रमाणित करे. सरकार संसद के प्रति, और इसीलिए देश के प्रत्येक मतदाता के प्रति जवाबदेह होती है.
जो सरकार जितनी जवाबदेही से अपना कर्तव्य निभाती है, वह उतनी ही जनतांत्रिक मानी जाती है. और जहां तक निर्वाचित प्रतिनिधियों का सवाल है, उन्हें भी देश के मतदाता के प्रति अपना दायित्व निभाना होता है. हर प्रतिनिधि से परिपक्वता की अपेक्षा मतदाता करता है.
सदन में, और सदन के बाहर भी, निर्वाचित प्रतिनिधि का दायित्व है कि वह अपनी सजगता और ईमानदारी प्रमाणित करे. हमारे हर नेता को इस कसौटी पर खरा उतरने की कोशिश करते दिखना होगा- तभी जनतंत्र सुरक्षित रहेगा.