लोकतंत्र में विपक्ष का भी कम नहीं है महत्व
By विश्वनाथ सचदेव | Updated: February 11, 2026 05:54 IST2026-02-11T05:54:45+5:302026-02-11T05:54:45+5:30
प्रधानमंत्री को सदन में न आने देने की सलाह के बारे में बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने जो कहा वह निश्चित रूप से चिंता की बात है.

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संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान हंगामा तो पहले भी होता रहा है, पर इस बार जो कुछ हुआ वह अभूतपूर्व ही था. पहली बात तो यह हुई कि सत्ता-पक्ष ने नेता विपक्ष को उनकी बात नहीं कहने दी और दूसरी यह कि किसी ‘अनहोनी’ की आशंका से लोकसभा के अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री से यह आग्रह किया कि वे कार्यक्रम के अनुसार सदन में बहस का उत्तर देने न आएं. यह दोनों ही बातें हैरान करने वाली हैं. प्रधानमंत्री को सदन में न आने देने की सलाह के बारे में बताते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने जो कहा वह निश्चित रूप से चिंता की बात है.
उन्होंने ‘पुख्ता जानकारी’ का हवाला देते हुए कहा था कि उस दिन सदन में प्रधानमंत्री के साथ कुछ भी हो सकता था. इस ‘कुछ भी’ का ब्यौरा उन्होंने नहीं दिया है, पर यह कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि उनका इशारा प्रधानमंत्री की सुरक्षा की ओर था. यदि ऐसा कुछ है तो देश को यह जानने का अधिकार है कि हमारे प्रधानमंत्री को किससे और कैसा खतरा था.
यही नहीं, यह बताना भी अध्यक्ष का कर्तव्य है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए खतरा बनने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जा रही है. संसद के भीतर प्रधानमंत्री पर इस तरह खतरे का होना जहां हमारी समूची सुरक्षा व्यवस्था को अंगूठा दिखा रहा है, वहीं सवाल संसद की कार्रवाई में बाधा उत्पन्न करने वालों के मंतव्य पर भी उठता है.
सवाल जनतांत्रिक मूल्यों में हमारी आस्था और विश्वास का है. अक्सर इस तरह की स्थिति विपक्ष के विरोध से उत्पन्न होती है, पर सदस्यों के अभिव्यक्ति के अधिकार को चुनौती इस बार सत्तारूढ़ पक्ष ने भी दी है, नेता विपक्ष को सदन में अपनी बात रखने से रोकने की कोशिश हुई. इस समूचे प्रकरण का एक हिस्सा जनतांत्रिक व्यवस्था और मूल्यों का है.
जो शासन-व्यवस्था हमने अपने लिए चुनी है, उसमें संवाद का सर्वाधिक महत्व है. हर नागरिक का अधिकार है कि वह उचित मर्यादाओं का पालन करते हुए अपनी बात कह सकता है. संसद में, और विधानसभाओं में तो सदस्यों को यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि सदन में उनकी कही बात को किसी भी तरह से अपराध नहीं माना जाएगा.
यह व्यवस्था इसलिए भी जरूरी थी कि निर्वाचित सदस्य अपनी बात निर्भयतापूर्वक कह सकें. ऐसे में यदि नेता विपक्ष को कोई बात कहने से रोका जाता है तो इसे जनतांत्रिक मूल्यों-परंपराओं का नकार ही कहा जाएगा. मतदाता सिर्फ सरकार ही नहीं चुनता, विपक्ष का भी चुनाव करता है.
यदि वह एक पक्ष को सरकार चलाने का काम सौंपता है तो दूसरे पक्ष से अपेक्षा करता है कि वह सत्तारूढ़ पक्ष के काम-काज पर समुचित निगाह रखेगा. महज इसलिए कि किसी की बात से हम असहमत हैं इसलिए उसे बात कहने का मौका नहीं देना हर दृष्टि से अनुचित और अलोकतांत्रिक है.