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दलबदल कानून : अध्यक्ष बनाम स्वतंत्न निकाय, पढ़ें अरविंद कुमार सिंह का ब्लॉग

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 24, 2020 05:04 IST

इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान कुछ बेहद अहम सवाल विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका और हैसियत को लेकर भी उठे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अध्यक्ष एक राजनीतिक दल का सदस्य होता है. लेकिन उसी के पास सांसदों और विधायकों को अयोग्य घोषित करने का अधिकार है. उसका निर्णय पक्षपात रहित नहीं हो सकता है.

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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बेहद अहम सुझाव दिया है कि विधायकों को अयोग्य करार देने का अधिकार एक स्वतंत्न निकाय के पास हो. संसद यह तय करे कि विधायकों को अयोग्य ठहराने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास हो या नहीं. यह सुझाव मणिपुर से संबंधित एक याचिका पर दिया गया है, जिसमें दलबदल कानून के तहत विधायक टी. श्यामकुमार सिंह को मणिपुर विधानसभा से अयोग्य ठहराने की याचना की गई थी. 2017 में कांग्रेस के टिकट पर जीते श्याम कुमार बाद में भाजपा में चले गए और मंत्नी बने. विधानसभा अध्यक्ष ने इस मामले को लेकर दायर याचिका पर लटकाने वाला रवैया अपनाया. इसी नाते सुप्रीम कोर्ट ने उनसे चार सप्ताह के भीतर फैसला देने के साथ यह भी कहा कि अगर इस समय सीमा में फैसला नहीं होता तो याचिकाकर्ता दोबारा सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं.

इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान कुछ बेहद अहम सवाल विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका और हैसियत को लेकर भी उठे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अध्यक्ष एक राजनीतिक दल का सदस्य होता है. लेकिन उसी के पास सांसदों और विधायकों को अयोग्य घोषित करने का अधिकार है. उसका निर्णय पक्षपात रहित नहीं हो सकता है. अध्यक्ष की शक्तियों और इनके गलत इस्तेमाल का मुद्दा कई बार उठ चुका है. अदालत ने कहा संसद इस पर विचार करे कि सदस्यों की अयोग्यता को तय करने का काम दल विशेष से संबंध रखने वाले अध्यक्षों के पास रहे या फिर रिटायर्ड जजों या अन्य का ट्रिब्यूनल बनाया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने जो बात कही है कमोबेश वही 2008 में चंडीगढ़ में आयोजित भारत के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी कही थी. उनकी राय थी कि यह शक्ति कानून में निपुण व्यक्तियों, किसी विशेष न्यायाधिकरण या चुनाव आयोग को प्रदान की जानी चाहिए.

यह बात उस समय उठी है जबकि संसद का सत्न आरंभ होने वाला है. दिलचस्प बात यह भी है कि हाल में भारत के विधायी निकायों के पीठासीन अधिकारियों के 79वें सम्मेलन में यह मुख्य चर्चा का विषय बना था. इसमें पीठासीन अधिकारियों ने माना कि दलबदल की समस्या के कारण लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास में कमी आ रही है. इसे देखते हुए संविधान की दसवीं अनुसूची में जरूरी बदलाव करने की जरूरत है. चूंकि अध्यक्ष अर्ध न्यायिक आधार पर काम करता है लिहाजा उसके द्वारा दिए गए आदेश न्यायिक समीक्षा के तहत होते हैं. न्यायालयों द्वारा इस पर कई बार चिंताजनक टिप्पणियां की जा चुकी हैं.

अध्यक्ष सभा के नियमों, शक्तियों और विशेषाधिकारों के संरक्षक हैं. संसदीय परंपराओं का संरक्षण और संवर्धन उनका कर्तव्य है. सच तो यह है कि दलबदल कानून यानी संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उनकी भूमिका न्यायाधीशों जैसी ही होती है. लेकिन यह भी सच है कि किसी भी फैसले को लेने के पहले उन पर अपने दल और खास तौर पर सत्ता दल का दबाव रहता है. इसी नाते देहरादून में पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में इस पर हुई व्यापक चर्चा के बाद एक समिति गठित की गई है जो व्यापक विचार के साथ संविधान संशोधन के साथ कई अहम सुझाव देगी. हाल में लखनऊ में संपन्न राष्ट्रमंडल संसदीय संघ के भारत परिक्षेत्न के सम्मेलन में भी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने यह साफ किया कि दल-बदल कानून पर पीठासीन अधिकारियों के असीमित अधिकार सीमित होंगे.

हाल के वर्षो में अदालतों में कई मामले आए जिनमें अध्यक्षों के फैसलों को राजनीतिक पक्षपात के साथ जोड़ा गया. सुप्रीम कोर्ट ने अध्यक्ष पद की गरिमा और महत्व को स्वीकारा. फिर भी सुरक्षा उपाय के रूप में न्यायिक समीक्षा की बात कही. यही नहीं 1 जून 1993 में अपने एक फैसले में लोकसभा के अध्यक्ष शिवराज पाटिल ने साफ कहा था कि ‘चूंकि अध्यक्ष भारत में किसी दल के सदस्य होते हैं, लिहाजा उनको अपने साथी सदस्यों की सदस्यता के संबंध में निर्णय देने का दायित्व नहीं सौंपा जाना चाहिए. वे कोई फैसला दें उन पर पक्षपात करने का लांछन जरूर लगेगा.’

कुछ माह पहले उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने दलबदल कानून को अधिक प्रभावी बनाने के लिए संविधान की 10वीं अनुसूची की समीक्षा की अपील की थी. विधान मंडल के अध्यक्षों द्वारा शीघ्र निर्णय लेने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा था कि दलबदल विरोधी कानून सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है. सभापति या अध्यक्ष की निष्क्रियता के कारण विधायक न केवल नई पार्टी में बने रहते हैं, बल्कि कुछ मामलों में मंत्नी भी बन जाते हैं. न्याय के इस तरह के उपहास को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए. ऐसे मामलों में देरी से न्यायिक और विधायी निकायों में जनता का विश्वास खत्म हो जाएगा.

इसमें कोई संदेह नहीं कि संसद हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली की धुरी है और पीठासीन अधिकारी संसदीय तंत्न की धुरी. अध्यक्ष के कार्यालय की अपनी गरिमा और महत्व है. उसके पास बहुत से अहम दायित्व और जिम्मेदारियां हैं. उसके अधीन विधान मंडलों की अपनी स्वतंत्नता और स्वायत्तता है. लेकिन दलबदल कानून को लेकर उसके कई फैसलों पर सवाल उठे हैं. विधायिका और न्यायपालिका में तनाव भी पैदा हुआ. यह ताजा मसला भी गंभीर है.

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