जीवन के साथ ही मृत्यु भी हो गरिमापूर्ण?, कई देशों में इच्छामृत्यु को लेकर अलग-अलग कानून?
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 13, 2026 05:33 IST2026-03-13T05:33:26+5:302026-03-13T05:33:26+5:30
अरुणा शानबाग के लिए दायर की गई इच्छामृत्यु की याचिका को अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वे ‘ब्रेन डेड’ नहीं थीं.

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पिछले 13 वर्ष से अधिक समय से कोमा में जा चुके 32 वर्षीय हरीश राणा को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी, जिससे यह देश में अपनी तरह का पहला मामला बन गया है. हालांकि वर्ष 2011 में अरुणा शानबाग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इच्छामृत्यु की याचिका खारिज कर दी थी लेकिन अपने उस ऐतिहासिक फैसले में ही सर्वोच्च अदालत ने भारत में ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ को कानूनी मान्यता दे दी थी. अरुणा शानबाग के लिए दायर की गई इच्छामृत्यु की याचिका को अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वे ‘ब्रेन डेड’ नहीं थीं.
उनकी देखभाल करने वाला अस्पताल का स्टाफ उन्हें जीवित रखना चाहता था. लेकिन हरीश राणा के मामले में प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड ने मरीज की स्थिति की जांच करने के बाद कहा था कि उसके ठीक होने की संभावना नगण्य है और एक दशक से अधिक समय से कोमा में रह रहे बेटे के इलाज के लिए अपना घर-बार बेच चुके पिता ने गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार का हवाला देते हुए अपने बेटे के लिए यह इजाजत मांगी थी. दुनिया के विभिन्न देशों में निष्क्रिय और सक्रिय इच्छामृत्यु को लेकर अलग-अलग नियम-कानून हैं.
दक्षिण कोरिया, जापान, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, पुर्तगाल स्वीडन, नार्वे, हंगरी, नीदरलैंड, बेल्जियम, कनाडा, स्पेन, लक्जमबर्ग, न्यूजीलैंड, कोलंबिया, ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुत सारे देशों में इच्छामृत्यु की अनुमति है. इनमें से कुछ देशों में केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत है तो कुछ में सक्रिय इच्छामृत्यु की भी.
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है नाजुक स्थिति वाले किसी मरीज को जीवित रखने वाली चिकित्सा सहायता को रोकने या जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति देना, जबकि सक्रिय इच्छामृत्यु में मृत्यु के लिए दवा या इंजेक्शन भी देते हैं. भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दिए जाने के पीछे सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं बुजुर्गों, दिव्यांगों और आर्थिक रूप से दूसरों पर निर्भर लोगों के मामले में इसका दुरुपयोग न होने लगे. एक ऐसे देश में जहां सामाजिक और आर्थिक असमानताएं बहुत ज्यादा हैं तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक भी सबकी समान पहुंच नहीं है,
गरिमा के साथ मरने के अधिकार के रूप में इच्छामृत्यु की निर्बाध अनुमति देने पर इसके दुरुपयोग की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता. लेकिन हरीश राणा जैसे मामलों में, जहां जीवन बेहद दयनीय स्थिति में पहुंच जाए और मरीज के ठीक होने की संभावना भी नगण्य हो, इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं देना भी गहरी पीड़ा देने के समान हो सकता है. इसलिए दोनों के बीच संतुलन रखना ही सबसे सही रास्ता है और सुप्रीम कोर्ट ने यही किया है.