सोचें सोचने वाले, हम भी बड़े दिलवाले!, सुनने वालों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं?
By Amitabh Shrivastava | Updated: March 28, 2026 05:11 IST2026-03-28T05:11:50+5:302026-03-28T05:11:50+5:30
तालमेल के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं. इस पृष्ठभूमि के बावजूद विधान मंडल के एक सदन में मुख्यमंत्री के उद्गार शिवसेना प्रमुख ठाकरे के लिए किसी संकट से कम साबित नहीं हुए.

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राजनीति में यदि दो घोर विरोधियों का सामना हो जाए तो वे अधिक से अधिक मुस्कुरा कर अलग-अलग रास्तों पर निकल जाते हैं. मगर महाराष्ट्र विधान परिषद में राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जिस प्रकार अपने कटु आलोचक शिवसेना प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की प्रशंसा की, वह सुनने वालों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं है. यूं तो भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) और शिवसेना का अटूट रिश्ता करीब 25 साल तक रहा, लेकिन दूरी बढ़ने की कोई सीमा नहीं रही. यही कारण है कि पिछले दिनों एक साक्षात्कार में मुख्यमंत्री फडणवीस ने साफ किया था कि दोनों दलों के मेलजोल की कतई कोई संभावना नहीं है, क्योंकि फासला बहुत बढ़ चुका है. उन्होंने अपनी बात में यह भी जोड़ा था कि जिस प्रकार उद्धव ठाकरे भाजपा और उसके शीर्ष नेताओं के खिलाफ टिप्पणी करते हैं.
उससे तालमेल के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं. इस पृष्ठभूमि के बावजूद विधान मंडल के एक सदन में मुख्यमंत्री के उद्गार शिवसेना प्रमुख ठाकरे के लिए किसी संकट से कम साबित नहीं हुए. वह विदाई भाषणों में छींटाकशी की आशा के साथ आए और बदले माहौल को देख खुद बदल नहीं पाए. उन्होंने फडणवीस पर भी सवाल दागा और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को भी चुनौती ही दी.
वर्ष 1995 में भाजपा और शिवसेना के बीच रिश्ता उस समय बना, जब देवेंद्र फडणवीस नागपुर महानगर पालिका के महज एक नगरसेवक थे. दोनों दलों की सरकार बनने के समय वह दो साल नागपुर शहर के महापौर भी थे. उसके बाद उन्होंने राज्य की राजनीति का सफर आरंभ किया और लगातार नागपुर की सीट से विधानसभा के लिए चुने जाते रहे.
इस सफर में उनका शिवसेना से सीधा संबंध वर्ष 2014 में ही आया, जब दोबारा दोनों दलों ने मिलकर राज्य में सरकार बनाई. हालांकि उस बार विधानसभा चुनाव एक साथ नहीं लड़ा गया था. वहीं दूसरी ओर वर्ष 2005 में ही उद्धव ठाकरे को पार्टी की कमान दिए जाने की घोषणा हो चुकी थी. जिसके बाद उनके चचेरे भाई राज ठाकरे ने पार्टी छोड़कर वर्ष 2006 में नया दल बना लिया था.
उस दौरान परिवार की अंदरूनी कलह से पहले और बाद में भी उद्धव ठाकरे अपने पिता बालासाहब ठाकरे के साथ देखे जाते थे. वह निर्णायक बैठकों का हिस्सा होते थे. यही कुछ कारण रहा जब वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन नहीं हुआ, क्योंकि मोदी लहर में दोनों दलों की महत्वाकांक्षा पूरे उफान पर थी.
किंतु विधानसभा चुनाव परिणामों ने अंतर साफ किया. भाजपा वर्ष 2009 के चुनाव परिणाम 46 से 122 और शिवसेना 44 से 63 सीटों तक पहुंच पाई. दरअसल इसमें छिपा संदेश शिवसेना के लिए था. जिसे भांप कर शिवसेना ने गठबंधन सरकार बनाई, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा को दबा नहीं पाई.
उसने वर्ष 2019 में विधानसभा चुनाव के बाद फिर अपना पासा फेंका, लेकिन वह नहीं समझ पाई कि यदि उद्धव ठाकरे लगभग दो दशक से सक्रिय राजनीति में हैं तो फडणवीस भी अब राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. इसी नासमझी में लगातार गलतियां हुईं, जिनके परिणाम सामने हैं. बावजूद इसके फडणवीस के आचार-व्यवहार में परिवर्तन नहीं आया है.
उद्धव ठाकरे किसी भी स्तर पर पहुंचकर फडणवीस की आलोचना कर चुके हैं. फडणवीस अपनी असली पहचान को बनाए रखने में सफल हैं. जिसका प्रदर्शन उन्होंने बीते बुधवार को विधान परिषद में भी किया. विधान परिषद सदस्यों के विदाई समारोह में फडणवीस ने कहा कि वह स्वर्गीय हिंदू हृदय सम्राट बालासाहब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे जी को विदाई दे रहे हैं.
उन्होंने अपने संबंधों को लेकर स्वीकार किया कि वर्ष 2014 के बाद उनकी निकटता बढ़ी और वर्ष 2019 में अलग हुए. उनकी राजनीतिक भूमिकाएं अलग हो गईं. उन्होंने कार्यशैली की प्रशंसा कर कहा कि राजनीति में उद्धव ठाकरे ने निर्णय लेते वक्त कभी परिणामों की चिंता नहीं की. यह गुण उन्हें बालासाहब से विरासत में मिला.
फडणवीस ने मराठी साहित्यकार पी.एल. देशपांडे से तुलना कर ठाकरे को ‘शब्दों का धनी’ और ‘हाजिर जवाब’ कहा. मूल स्वभाव रिश्ते निभाने वाला बताया. उन्होंने कहा कि राजनीति में मतभेद होते हैं. कभी साथ, कभी अलग रहना पड़ता है, लेकिन इससे परे सह-यात्री होने का एक गहरा रिश्ता होता है. उन्होंने कहा कि उद्धव ठाकरे के व्यक्तित्व में राजनीति थोड़ी कम है.
इसीलिए कई बार उनके निर्णयों से अलग परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं. वह एक फोटोग्राफर हैं. उन्होंने महाराष्ट्र की विभिन्न छटाओं को अपने कैमरे में कैद किया है. जिस वाक्य के लिए शिवसेना ने बार-बार मजाक उड़ाया, उसे दोहराकर फडणवीस ने कहा कि उनका ‘पुन्हा येईन’(वापस आऊंगा) प्रसिद्ध है, लेकिन उन्होंने ठाकरे से अपेक्षा व्यक्त कर कहा कि ‘पुन्हा भेटू’(फिर मिलेंगे).
उन्होंने ठाकरे से कहा कि वह चाहें तो अगले छह सालों के लिए सदन में वापस आ सकते हैं. उन्हें कम सुना गया है. उन्हें और सुनना अच्छा लगेगा. पूरे संबोधन के पहले उपमुख्यमंत्री शिंदे भी बोले और बाद में उद्धव ठाकरे ने अपने विचार रखे. किंतु संबंध से लेकर विरोध और भूत से वर्तमान तक किसी ने अपनी बात विस्तार से नहीं रखी. यह जानते हुए कि शायद प्रशंसा का उत्तर भी सकारात्मक नहीं मिलेगा.
फिर भी फडणवीस ने विचारों को व्यक्त करने में कोई कंजूसी नहीं दिखाई. राजनीति में बड़े दिल के उदाहरण कम ही मिलते हैं. जहां कटु आलोचक की तथ्यों के साथ तारीफ की जाए और सिलसिलेवार ढंग से अच्छाइयां गिनाई जाएं. यद्यपि उद्धव ठाकरे ने अपने अंदाज में मुख्यमंत्री का कहा सच बताया और वर्णन उत्तम माना. बाद में सवाल भी खड़े किए और अपनी मांग भी रखी. उन्हें अंदाज नहीं था कि विरोध में रहकर भी रिश्ता जिंदा रखा जा सकता है. उसे शब्दों से सही, किंतु महकाया जा सकता है.
शायर निदा फाजली ने कहा है कि
दुश्मनी लाख सही, खत्म न कीजे रिश्ता,
दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए.