उच्च शिक्षा और अनुसंधान की चुनौतियां

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: April 6, 2026 05:27 IST2026-04-06T05:27:43+5:302026-04-06T05:27:43+5:30

तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय तब थे जब अन्यत्र इसकी कल्पना भी नहीं थी. आज हम शिक्षा और शोध में पिछड़ गए हैं.

Challenges higher education and research blog Giriswar Mishra | उच्च शिक्षा और अनुसंधान की चुनौतियां

file photo

Highlightsन बजट में प्रावधान है और न शिक्षा की संचालन व्यवस्था ही संतोषजनक है. भारतीय शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन ही कठिन है. शिक्षा के लिए जरूरी संसाधनों का अधिकांश शिक्षा केंद्रों में घोर अभाव है.

आज विकसित और प्रगतिशील देशों में शोध पर बड़ा बल दिया जाता है. वहां शिक्षा और शोध पर काफी खर्च होता है और शोध गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरता है. ज्ञान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में उन देशों की वैश्विक पहचान है. पड़ोसी देश चीन की शोध में प्रगति आशातीत रूप से उल्लेखनीय है जहां आज अनेक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय हैं. भारतीय संदर्भ में शोध की स्थिति आज दयनीय हो रही है, हालांकि यहां तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय तब थे जब अन्यत्र इसकी कल्पना भी नहीं थी. आज हम शिक्षा और शोध में पिछड़ गए हैं.

न बजट में प्रावधान है और न शिक्षा की संचालन व्यवस्था ही संतोषजनक है. शिक्षा में हमने इतने तरह के स्तरीकरण कर रखे हैं कि भारतीय शिक्षा की गुणवत्ता का आकलन ही कठिन है. आज कई तरह के निजी, केंद्रीय सरकार द्वारा संचालित, राज्य शासन द्वारा संचालित, अर्ध सरकारी, डीम्ड आदि एक हजार से अधिक विश्वविद्यालय, उच्च शिक्षा के अनेक संस्थान और हजारों महाविद्यालयों का विशाल संजाल तो खड़ा है परंतु अध्यापकों और शिक्षा के लिए जरूरी संसाधनों का अधिकांश शिक्षा केंद्रों में घोर अभाव है.

सरकारी संस्थाओं की स्थिति यदि व्यवस्थागत पेचीदगी का शिकार होकर असंतोषजनक है तो निरंकुश निजी शिक्षा संस्थान व्यापार के तर्ज पर भारी शुल्क उगाही कर मुनाफा कमा रहे हैं. हमारे विश्वविद्यालयों में शोध का आरंभ औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजों द्वारा किया गया. यूरोप और अमेरिका के सिद्धांतों, विचारों और विधियों का प्रभुत्व ऐसा रहा कि भारतीय विश्वविद्यालयों में समाज विज्ञान के विभिन्न विषयों में विदेशी ज्ञान का वर्चस्व हो गया. आज भी अधिकांश विषयों की पाठ्यपुस्तकें और ज्ञान की सामग्री उसी तरह की है.

भारतीय समाज उतना ही प्रासंगिक होता है जितना आंकड़ों को पाने के लिए जरूरी है. ऐसा ज्ञान न पश्चिमी देशों के काम का होता है न अपने देश के. ऐसे में दुहराव तथा पिष्टपेषण का बोलबाला है. इस बात के कई संकेत हैं कि भारतीय शोध कार्यों की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की तुलना में कमतर है.

जनसंख्या बढ़ने के साथ शिक्षा संस्थानों की संख्या तो जरूर बढ़ी है परंतु उनकी गुणवत्ता में गिरावट चिंता का कारण है. संस्थानों की कार्य-संस्कृति पर राजनीति हावी है. शिक्षा केंद्र में अकादमिक कार्य, वैचारिक प्रयास और सृजनशीलता की जगह उत्सवप्रियता का अतिरेक है जिससे अध्ययन-अध्यापन हाशिये पर चला जा रहा है.

शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और विचार-विमर्श के वातावरण से विवेकवान समालोचक की दृष्टि लुप्त हो रही है. वार्ता, वाद-विवाद और शास्त्रार्थ की जगह अनुकीर्तन से ज्ञान में वृद्धि की आशा व्यर्थ है.  शोधार्थियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है पर उसी के साथ शोध से जुड़े नैतिक प्रश्न उलझते जा रहे हैं.

साहित्य चोरी (प्लेगरिज्म) की घटनाएं बढ़ रही हैं, शोध निदेशकों द्वारा शोषण की घटनाएं भी हो रही हैं. व्यवस्था की कमजोरी के चलते शोध कार्य में पारदर्शिता घट रही है. कोल्हू के बैल की तरह बंधी-बंधाई लीक पर चलना ही शोध की पद्धति बनती जा रही है. जिज्ञासा और कल्पनाशीलता पिछड़ रही है.

इसका कारण संसाधनों और सुविधाओं का अकाल तो है, उसका समुचित वितरण न होना भी क्षोभ का कारण बन रहा है. अनुशासित जिज्ञासा से शोध का आरंभ होता है और ज्ञान के संधान के साथ यह यात्रा आगे बढ़ती है. कहा गया है- विद्या से विनय और विनय से पात्रता, फिर पात्रता से समृद्धि और तब सुख मिलता  है. आज इस सूत्र को फिर से दुहराने और अपनाने की जरूरत है.

Web Title: Challenges higher education and research blog Giriswar Mishra

भारत से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे