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Bilkis Bano case verdict: बिलकीस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हैं कई आयाम, दोषियों की सजा माफी रद्द करने का फैसला

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: January 10, 2024 12:08 IST

Bilkis Bano case verdict: सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के अपराधियों की अच्छे आचरण की दलील के आधार पर रिहाई को ही नैतिक दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता. 

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ठळक मुद्दे अपराधियों की रिहाई का यह मामला तो अदालत के साथ धोखाधड़ी का भी हतप्रभ कर देने वाला मामला है. अगर उसे रिहा करना ही था तो इसके लिए महराष्ट्र सरकार से मंजूरी लेनी चाहिए थी.गुजरात सरकार ने इस तथ्य को ही सुप्रीम कोर्ट से छिपा लिया!

Bilkis Bano case verdict: बिलकीस बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सोमवार को गुजरात सरकार के फैसले को पलटते हुए दोषियों की सजा माफी रद्द करने का फैसला अपने भीतर कई बड़े आयामों को समेटे हुए है. पहली बात तो यह कि सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के अपराधियों की अच्छे आचरण की दलील के आधार पर रिहाई को ही नैतिक दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता.

इसके अलावा अपराधियों की रिहाई का यह मामला तो अदालत के साथ धोखाधड़ी का भी हतप्रभ कर देने वाला मामला है. चूंकि दोषियों को सजा महाराष्ट्र की कोर्ट ने सुनाई थी, इसलिए गुजरात सरकार को उन्हें रिहा करने का अधिकार था ही नहीं और अगर उसे रिहा करना ही था तो इसके लिए महराष्ट्र सरकार से मंजूरी लेनी चाहिए थी.

लेकिन गुजरात सरकार ने इस तथ्य को ही सुप्रीम कोर्ट से छिपा लिया! जनप्रतिनिधि कितने भी ताकतवर हों, उन्हें समझना चाहिए कि वे न्याय के तराजू से ऊपर नहीं हैं और काूनन की नजर में हर नागरिक एक बराबर है. वोट की राजनीति के चक्कर में पहले भी कई बार सरकारें न्यायपालिका के फैसलों को दरकिनार करने की कोशिश कर चुकी हैं.

शाहबानो का मामला इसकी एक ज्वलंत मिसाल है जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को वोटबैंक की राजनीति के चलते तत्कालीन केंद्र सरकार ने पलट दिया था. निश्चित रूप से लोकतंत्र में बहुमत का निर्णायक महत्व होता है, क्योंकि बहुमत पाने वाला दल ही सरकार बनाता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों की ही अनदेखी की जाए.

बिलकीस बानो मामले में जस्टिस नागरत्ना की यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है कि ‘एक महिला को समाज कितना भी कम आंके या वह किसी भी धर्म की हो, पर कानून की नजर में वह सम्मान की हकदार है.’ दरअसल अदालत द्वारा 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के 14 साल बाद जब गुजरात सरकार ने सभी दोषियों को रिहा किया तो कुछ लोगों ने जिस तरह से उनका स्वागत सत्कार किया वह बेहद हैरान कर देने वाला था.

सामूहिक बलात्कार के दोषियों का कैद के दौरान आचरण कितना भी अच्छा रहा हो, वे स्वागत-सम्मान पाने के हकदार कभी नहीं हो सकते. इसलिए बिलकीस बानो का मामला हमें कई दृष्टियों से सोचने पर मजबूर करता है कि हम किस तरह के समाज के निर्माण की ओर आगे बढ़ रहे हैं. 

टॅग्स :सुप्रीम कोर्टगुजरात
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