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भरत झुनझुनवाला का ब्लॉगः कैसा हो जन हितकारी बजट?

By भरत झुनझुनवाला | Updated: January 31, 2022 10:51 IST

बजट में सरकारी इकाइयों के निजीकरण की प्रक्रि या तेज करने के आसार हैं। जैसे एयर इंडिया का हाल में निजीकरण किया गया और कुछ बैंकों के भी निजीकरण की चर्चा हो रही है।

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बजट में बुनियादी संरचना जैसे हाईवे, बंदरगाह इत्यादि में सरकारी निवेश बढ़ने की पूरी संभावना है। यह सही भी है। लेकिन बुनियादी संरचना दो प्रकार की होती है-एक बड़ी और दूसरी छोटी। बड़ी बुनियादी संरचना से बड़े उद्योगों को लाभ अधिक होता है जैसे हाईवे बनने से सूरत से कोलकाता माल पहुंचाना आसान हो जाता है। लेकिन इसी बड़ी संरचना से कोलकाता के छोटे उद्यमियों का धंधा पिटता है। जैसे यदि सूरत का सस्ता कपड़ा कोलकाता आसानी से पहुंचे तो कोलकाता के बुनकरों का धंधा पिटता है। इसलिए जरूरी है कि बड़ी संरचना के साथ-साथ छोटे आम आदमी के लिए लाभप्रद संरचना जैसे छोटे कस्बों में मुफ्त वाई-फाई, गांव में सड़क, गांव में सीवेज का निस्तारण, बिजली की व्यवस्था इत्यादि में पर्याप्त निवेश किया जाए। ऐसा निवेश करने से गांव के लोगों को अपना माल सस्ता बनाने में सहूलियत होगी और वे बड़े उद्यमियों के सामने खड़े होकर अपना माल बेच कर जीवनयापन कर सकेंगे। इसलिए मात्र बुनियादी संरचना में निवेश बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। उसकी दिशा आम आदमी के लिए उपयोगी बुनियादी संरचना की तरफ मोड़ना जरूरी है।

बजट में सरकारी इकाइयों के निजीकरण की प्रक्रि या तेज करने के आसार हैं। जैसे एयर इंडिया का हाल में निजीकरण किया गया और कुछ बैंकों के भी निजीकरण की चर्चा हो रही है। अभी तक की व्यवस्था थी कि घाटे में चल रही सार्वजनिक इकाइयों मात्र का निजीकरण किया जाता है। यह विचारधारा ठीक नहीं है क्योंकि इसका अर्थ यह हुआ कि जब तक कोई सरकारी इकाई लाभ कमाती है तब तक उसे सरकारी घेरे में रखा जाएगा और जब वह घाटे में चली जाए तभी उसका निजीकरण किया जाए। यह उसी प्रकार हुआ कि जब तक फल सड़ न जाए, तब तक उसकी बिक्री न करें। इसके स्थान पर सरकार को घाटे में चल रही इकाइयों के साथ-साथ लाभ में चल रही इकाइयों के निजीकरण पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे कि वे घाटे में जाएं अथवा फल सड़े उससे पहले ही उसकी बिक्री हो जाए जिससे कि सरकार को पर्याप्त धन मिल सके। 

सार्वजनिक इकाइयों के निजीकरण के साथ-साथ यह भी जरूरी है कि उन पर सरकारी नियंत्रण को सही किया जाए अन्यथा हम सरकारी नौकरशाही के आतंक के पाले से निकलकर निजी उद्यमियों के आतंक के पाले में गिरेंगे जैसे कुएं से निकलकर खाई में गिरें। न तो सरकारी कर्मी देश प्रेमी है और न ही निजी उद्यमी। दोनों ही अपने स्वार्थ मात्र को देखते हैं। इसलिए जरूरी है कि इन दोनों के बीच परस्पर घर्षण पैदा कर, दोनों पर ही नियंत्रण स्थापित किया जाए जैसे एक कांटे से दूसरे कांटे को निकला जाता है। दोनों को ही जनता के प्रति जवाबदेह बनाना होगा। 

बजट में एक अन्य बिंदु सरकारी खपत में नियंत्रण का है। वर्तमान में तमाम राज्यों के बजट का 70 से 80 प्रतिशत राजस्व उनके कर्मियों के वेतन में व्यय हो जाता है। केंद्र सरकार की लगभग 50 से 60 प्रतिशत रकम सरकारी कर्मियों के वेतन तथा पेंशन में खप जाती है। इस खर्च के कारण सरकार के पास जरूरी निवेश जैसे मुफ्त वाई-फाई अथवा ग्रामीण सड़क अथवा रिसर्च में निवेश करने के लिए पर्याप्त रकम नहीं बचती है। बताते चलें कि विश्व के प्रमुख देशों में सरकारी कर्मियों के वेतन और देश की औसत आय में लगभग बराबर 1:1 का अनुपात रहता है। लेकिन विश्व बैंक के आकलन के अनुसार अपने देश में सरकारी कर्मियों के वेतन देश की औसत आय से 7 गुना हैं यानी कि अन्य देशों की तुलना में हमारे सरकारी कर्मियों के वेतन 7 गुना अधिक हैं। इसके ऊपर से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, बेंगलुरु के एक अध्ययन में आया है कि जितनी रकम सरकारी कर्मियों द्वारा वेतन से अर्जित की जाती है, उससे दूनी से भी अधिक रकम उनके द्वारा भ्रष्टाचार से अर्जित की जाती है। इसलिए अपने देश में सरकारी कर्मियों की आय, आम आदमी की आय से लगभग 15 से 20 गुना है। सरकारी तंत्र एक विशाल वैक्यूम क्लीनर जैसा है जो देश के एक-एक पैसे को खींचकर सरकारी खपत में लगा रहा है। देश गरीब हो रहा है और सरकारी कर्मी अमीर। यही कारण है कि हम विश्व में पिछड़ते जा रहे हैं। चीन अपने ही फाइटर जेट बना रहा है और हम फ्रांस से राफेल जेट आयात करने को मजबूर हैं। अत: वित्त मंत्री को चाहिए कि इस बजट में सरकारी कर्मियों के वेतन को फ्रीज करने की घोषणा करें। जब तक सरकारी कर्मियों के वेतन और देश की औसत आय के बीच परस्पर बराबरी नहीं स्थापित होती तब तक सरकारी कर्मियों के वेतन में कोई वृद्धि नहीं की जाए।

टॅग्स :बजट 2022बजटNirmal Sitharaman
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