बेगानी शादी में दीवाने होते अब्दुल्ला...!

By Amitabh Shrivastava | Updated: February 7, 2026 06:00 IST2026-02-07T06:00:53+5:302026-02-07T06:00:53+5:30

आश्चर्यजनक ही है कि जिस नेता ने तीन बार अपने दम पर भाजपा के साथ सरकार बनाई,  विधानसभा चुनाव में 41 सीटें जीतीं, उसने अपने दल का मजबूत संगठनात्मक ढांचा तक तैयार नहीं किया होगा.

baramati sharad pawar ajit pawar begani shaadi mein abdullah deewana blog Amitabh Srivastava | बेगानी शादी में दीवाने होते अब्दुल्ला...!

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Highlightsराज्यसभा सांसद संजय राऊत ने अपनी अपेक्षाओं को गिना दिया है. राकांपा का पवार गुट विलय की बंसी बजाने में जुटा है.भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) को निशाना बनाने के नियमित प्रयास में लगी है.

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा) के नेता अजित पवार के असामयिक निधन के बाद मात्र दस दिन में उनके दल पर राजनीतिक चर्चाओं को इतनी अधिक हवा दी जा रही है, जैसे वह अस्तित्व के संकट से ही जूझ रहा हो. उसे किसी सहायता की आवश्यकता हो. इसी भ्रम में शिवसेना ठाकरे गुट और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना(मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने बिना मांगे ही नए अध्यक्ष के नाम पर सलाह दे डाली है. इसी प्रकार राज्यसभा सांसद संजय राऊत ने अपनी अपेक्षाओं को गिना दिया है. राकांपा का पवार गुट विलय की बंसी बजाने में जुटा है.

कांग्रेस समूचे मामले में भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) को निशाना बनाने के नियमित प्रयास में लगी है. आश्चर्यजनक ही है कि जिस नेता ने तीन बार अपने दम पर भाजपा के साथ सरकार बनाई,  विधानसभा चुनाव में 41 सीटें जीतीं, उसने अपने दल का मजबूत संगठनात्मक ढांचा तक तैयार नहीं किया होगा.

यदि उसने अपनी पार्टी के गठन के साथ राष्ट्रीय स्तर पर कार्याध्यक्ष की प्रफुल्ल पटेल और प्रदेश अध्यक्ष की सुनील तटकरे को जिम्मेदारी सौंपी होगी तो उसके पीछे कहीं न कहीं विश्वास अवश्य होगा. इसी प्रकार सुनेत्रा पवार को राज्य का उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की स्थिति में निश्चित ही आपसी सहमति से निर्णय लिया गया होगा.

या फिर एक-दो लोगों की मनमर्जी से सब कुछ हो गया होगा, जिसका पता एक-दो शुभचिंतकों को ही लगा होगा! हाल के दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति हो या देश के किसी भी कोने की चर्चा, राज्य में दो दल अपने विचार व्यक्त करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. मणिपुर की हिंसा हो अथवा तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को समर्थन देना हो, दोनों ही दलों में उतावलापन दिखता है.

बीते कुछ समय में पहले विधानसभा चुनाव और उसके बाद नगर परिषद तथा महानगर पालिका चुनाव के परिणामों ने राज्य की राजनीति को अनेक सबक दिए हैं. एक तरफ ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने स्थानीय निकायों में लगभग सवा सौ सीटें जीत ली हैं और दूसरी तरफ गिनती की महानगर पालिकाओं में शिवसेना ठाकरे गुट की हिस्सेदारी रह गई है.

भाजपा ने जहां वर्ष 2017 में 1125 सीटें जीती थीं, वह अब 1425, अविभाजित शिवसेना वर्ष 2017 में 399 स्थान से वर्ष 2026 में शिवसेना ठाकरे गुट 154 और शिवसेना शिंदे गुट 399 पर पहुंच गए. इसी प्रकार वर्ष 2017 में 27 स्थानों पर विजय पाने वाली मनसे 13 सीटों पर सिमट गई. वर्तमान जिला परिषद चुनाव बेफिक्री के साथ चल रहे हैं.

बावजूद इसके राकांपा के गुटों की गतिविधियों पर शिवसेना ठाकरे गुट और मनसे की पैनी नजर है. ध्यान देने योग्य यह भी है कि वर्ष 2019 में जब शिवसेना के साथ महाविकास आघाड़ी की सरकार बनी थी, तब भी अजित पवार के शिवसेना के साथ सहज संबंध नहीं थे. वे केवल अपने चाचा शरद पवार की बनाई सरकार में गठबंधन धर्म का पालन कर रहे थे.

जब शिवसेना में फूट पड़ी और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में सरकार बनी, तब वे नई पार्टी बनाकर उसमें शामिल हो लिए. उन्होंने कांग्रेस और शिवसेना ठाकरे गुट की परवाह नहीं की. स्पष्ट है कि उनकी सोच अलग थी और जिसे उन्होंने महागठबंधन सरकार में बनाए रखा. फिर भी उनकी चिंता करने वाले कम नहीं हुए.

यदि राजनीतिक स्वार्थ की दृष्टि से देखा जाए तो महागठबंधन सरकार में फूट डालने से किसी नई सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता है. भाजपा को बहुमत पाने के लिए अधिक संख्या बल की आवश्यकता नहीं है. शिवसेना के शिंदे गुट से फिलहाल किसी तरह के अनबन की स्थितियां नहीं हैं. इसलिए ‘फूट डालो और राज करो’ के आसार नहीं हैं.

उधर, राकांपा के दोनों गुटों में सक्षम नेता उपलब्ध हैं. वे विलय से लेकर सरकार से जुड़ी हर चिंता का समाधान ढूंढ़ सकते हैं और ढूंढ़ रहे हैं. इस स्थिति में उनके बीच हस्तक्षेप की संभावना या जरूरत जान नहीं पड़ती है. यद्यपि यदि राकांपा के दोनों गुट एक होते हैं और मिलकर राज्य तथा केंद्र सरकार में शामिल होते हैं तो शिवसेना ठाकरे गुट और मनसे के समक्ष अधिक कठिन परिस्थितियां निर्मित हो सकती हैं.

पिछले साल विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस महाविकास आघाड़ी की भागीदार के रूप में शिवसेना के साथ थी, लेकिन वह मनपा चुनाव में अलग हो गई. अनेक मनपा में राकांपा शरद पवार गुट ने किनारा किया. भाइयों के मिलन के बहाने मनसे को साथ लाया गया, जिसका लाभ परिवार से अधिक पार्टी को नहीं हुआ. सिकुड़ती शिवसेना मुंबई में भी सिमट कर रह गई.

शिवसेना शिंदे गुट से नेताओं की वापसी की कोई संभावना नहीं है. फिर भी चिंता अपने घर से अधिक दूसरे के घर की है, वह भी जिसके पास राज्य में मंत्री, सांसद, विधायक और नगरसेवक सभी अच्छी संख्या में हैं. उसके पास कार्यकर्ताओं की फौज छोटी नहीं है. उसके नेताओं का राजनीतिक इतिहास भी पुराना है.

दरअसल, कुछ चुनावों के परिणामों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में अनेक दल और नेताओं के समक्ष अप्रासंगिक होने का संकट मंडरा रहा है. जिसकी वजह राज्य की जनता या मतदाता नहीं, बल्कि दल और उनकी नीतिगत खामियां हैं. जिन्हें समय अनुरूप नहीं ढाला गया है. संगठनों में टूट-फूट नई बात नहीं है, लेकिन उनका पुनर्गठन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता रहा है.

कांग्रेस ने अतीत में अनेक बगावत से निपटते हुए संगठन पुनर्जीवित किया. पराजय के बाद दोबारा मुकाबले का जज्बा बनाए रखा. वर्तमान में संघर्ष की मनोवृत्ति ही समाप्त हो चली है. अब स्वयं के संगठन के पतन के दौर में दूसरे दल की चिंता अनावश्यक परेशानी बन पड़ी है.

दो दिन बाद जिला परिषद चुनाव के परिणाम सामने आएंगे, जिनके बाद संसद से पंचायत समिति तक राजनीतिक स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी. जिनमें बेगानी शादी में अक्सर दीवाने रहने वाले अब्दुल्ला को संदेश मिल जाएंगे.

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