‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ और वाजिद अली शाह का कलकत्ता
By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 17, 2026 07:20 IST2026-03-17T07:20:19+5:302026-03-17T07:20:29+5:30
अवधी में 1061 पन्नों में 44562 दोहे वाली ‘सवातुल कलूब’ के अलावा उत्तर-आत्मकथा ‘हुस्न-ए-अख्तर में 1276 दोहों में लखनऊ से कलकत्ता तक की दर्दनाक नौयात्रा का वर्णन है.

‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए’ और वाजिद अली शाह का कलकत्ता
सुनील सोनी
वरिष्ठ समाचार संपादक लोकमत समाचार
भारतीय कथा साहित्य के पुरखे प्रेमचंद ने 1924 में उर्दू में ‘शतरंज की बाजी’ या हिंदी में ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के बहाने अवध के नवाब की विलासिता पर जो व्यंग्य किया, उस पर महान फिल्मकार सत्यजित राय ने 1977 में फिल्म बनाई और राष्ट्रीय स्वर्णकमल भी जीता. राय की वाजिद अली शाह में दिलचस्पी होना कोई संयोग नहीं है. वे कलकत्ता (अब कोलकाता) में बिचली घाट पर बसे दूसरे लखनऊ ‘मटियाबुर्ज’ पर जरूर फिदा रहे होंगे, जिसने उनके भीतर के फिल्मकार से पहले चित्रकार को आंदोलित किया होगा.
अवध के आखिरी नवाब मिर्जा वाजिद अली शाह ने 9 वर्षों तक 1847 से 1856 तक राज किया, जिसे ‘ठगों’ का सफाया करनेवाले विलियम स्लीमन की रिपोर्ट पर ईस्ट इंडिया कंपनी के लॉर्ड डलहौजी ने हड़प लिया. महारानी से अवध लौटाने की गुहार लगाने लंदन जाने के सफर के तहत वे गंगा में चलनेवाले विशाल स्टीमर से 13 मार्च 1856 को कलकत्ता रवाना हुए, पर दो माह बाद 13 मई को कलकत्ता पहुंच कर बीमार हो गए.
निर्वासन पर उन्होंने ठुमरी रची, ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए...’ भारतीय शास्त्रीय व सुगम संगीत में यह ठुमरी सभी महान गायकों ने गाई है. हिंदी फिल्मजगत के लिए 1938 में कुंदनलाल सहगल ने इसे फणी मजूमदार की फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ के लिए रायचंद बोराल के संगीत निर्देशन में गाया. जगजीत-चित्रा ने 1973 की ‘आविष्कार’ में कनु रॉय के संगीत में, जबकि 2017 की ‘पूर्णा’ में अरिजीत सिंह ने इसे आवाज दी.
लखनऊ से विदा होते समय वाजिद अली शाह ने शे’र कहा था : ‘‘दरो-दीवार पे हसरत से नजर करते हैं / खुश रहो अहले वतन, हम तो सफर करते हैं...’’ उनके निर्वासन के विरोध में पूरा अवध कंपनी हुकूमत के खिलाफ उतर आया. वे कानपुर के रास्ते चले, तो हजारों जन साथ गाते चले ‘अंग्रेज बहादुर आइन, मुल्क लै लीन्हो...’. बाद में यह लोकगीत बन गया और 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में खूब गाया गया. विलियम क्रुक ने ‘सांग्स एबाउट द किंग ऑफ अवध’ लिखा है, ‘‘जान-ए-आलम के रवाना होने के बाद लखनऊ की हालत यूं हो गई कि शहर की आत्मा निकल गई हो. कोई सड़क, बाजार और घर ऐसा न था, जो विरह में दु:खी न हो.’’
कलकत्ता के पहाड़ी गंगा तट ‘मटियाबुर्ज’ को कंपनी ने ‘गार्डन रीच’ बना दिया था, जहां रईस अंग्रेज महलों जैसे भव्य महलों में रहा करते थे, उन्हीं में से तीन महल वाजिद अली शाह को दिए, जिसे ‘सुलतानखाना’ कहा गया. लखनऊ की याद उन्हें इतना सताती थी कि उन्होंने मटियाबुर्ज को 12 लाख रुपए प्रतिवर्ष पेंशन को झोंक ‘दूसरा लखनऊ’ बना दिया, जहां ‘कैसरबाग बारादरी’ जैसा संगीत दरबार भी था और 7000 लोग रहते थे. अवध पर नौ साल के राज में शाह ने लखनऊ को कला केंद्र बना दिया और ‘राधा-कन्हैया का किस्सा’ नाटक लिखा और हिंदुस्तान के पहले नाटककार भी कहलाए.
प्राचीन मंदिरों के ‘कथक’ को वे दरबार तक ले आए और साहित्य, सौंदर्य, नौ रसों से भर दिया. शालीन, सुंदर चाल, सहज संतुलन के साथ शरारती ‘नखरा’ भी रखा. कथक में ‘रासलीला’ से नाट्यसंगीत रचा, जिसे ‘रहस’ कहा गया. तानसेन के वंशजों से संगीत सीखनेवाले नवाब ने ‘ठुमरी’ को भी ‘खयाल’ से छुड़ाकर नया रूप दिया. ‘अख्तरपिया’ नाम से लिखा, जो ‘दीवान-ए-अख्तर’ व ‘हुस्न-ए-अख्तर’ बने. जोगी, जूही, शाहपसंद समेत कई राग रचे, पर होली व ध्रुपद जैसे जटिल रागों के बजाय तिलक, पीलू, सेंदुरा, खमाज, भैरवी, झंझौती जैसे सरल राग गवाए, जो जनता की जबान पर आ गए. ‘दरिया-ए-तश्क’, ‘अफसाने-ए-इस्बाक’, ‘बहार-ए-उल्फत’, ‘इंदर सभा’ जैसी नृत्यनाटिकाएं भी उन्होंने अपनी ही कविता से रचीं.
उनके 400 पन्नों के संगीत-नृत्य ग्रंथ ‘बानी’ में मटियाबुर्ज के जीवन, मुशायरों, इमारतों, निजी चिड़ियाघर का वर्णन है. उनकी लिखी 60 से अधिक किताबें खो गई हैं, पर 26 वर्ष की आयु में लिखी प्रेम-प्रसंगों के संस्मरण ‘परीखाना’ अब भी है. इसी संगीत-नृत्य केंद्र में पहले कैनिंग कॉलेज, फिर भातखंडे संगीत महाविद्यालय बना. अवधी में 1061 पन्नों में 44562 दोहे वाली ‘सवातुल कलूब’ के अलावा उत्तर-आत्मकथा ‘हुस्न-ए-अख्तर में 1276 दोहों में लखनऊ से कलकत्ता तक की दर्दनाक नौयात्रा का वर्णन है. लखनऊ छोड़ने के पहले 1854 में ‘मिर्जा गालिब’ को भी वे 500 रुपए सालाना पेंशन मुकर्रर कर गए थे. 1874 में ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने उनकी शान में रिपोर्ताज छापा, जिसके 13 साल बाद 1887 में वे गुजरे और मटियाबुर्ज में उनका मकबरा आज भी है.