राजनीति में मुफ्त की घोषणाएं लांघने लगी हैं अति की सीमा
By प्रमोद भार्गव | Updated: February 26, 2026 05:41 IST2026-02-26T05:41:30+5:302026-02-26T05:41:30+5:30
रोटी, कपड़ा और मकान के सभी साधन उपलब्ध हैं, मुफ्त योजनाओं का लाभ वे भी बटोरने में लगे हैं. मतदाता को पराश्रित बनाकर राज्य सरकारें खुद को खोखला करने में लगी हैं.

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चुनावों के ठीक पहले राज्य सरकार द्वारा मुफ्त उपहारों और सब्सिडी की कड़ी में शीर्ष न्यायालय ने सरकार से पूछा कि ‘यह संस्कृति कब तक जारी रहेगी? इससे देश के दीर्घकालिक आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न होती है. अतएव राज्यों को रोजगार देने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए न कि सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, मुफ्त आनाज, मुफ्त साइकिल और मुफ्त बिजली-पानी देने चाहिए.’ दरअसल इसी साल तमिलनाडु समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसलिए मतदाता को लालच देते हुए तमिलनाडु सरकार ने सभी उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली देने की घोषणा कर दी है.
इस घोषणा के विरुद्ध तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम लिमिटेड द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष न्यायालय ने उक्त टिप्पणी की है. यह स्थिति तमिलनाडु में ही नहीं बल्कि सभी राज्यों में बनी हुई है. लोक-लुभावन उपायों को राजनीतिक दलों और नेताओं ने चुनाव जीतने का मंत्र मान लिया है.
इसी मंत्र के वशीभूत स्त्री मतदाताओं को लुभाने के लिए लाड़ली बहना जैसी योजनाएं कई राज्यों में चुनाव जीतने का मंत्र बनी हैं. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि जिनके पास रोटी, कपड़ा और मकान के सभी साधन उपलब्ध हैं, मुफ्त योजनाओं का लाभ वे भी बटोरने में लगे हैं. मतदाता को पराश्रित बनाकर राज्य सरकारें खुद को खोखला करने में लगी हैं.
निर्वाचन लोक-पर्व के अवसर पर मुफ्त में तोहफे बांटे जाने की घोषणाएं सभी राजनीतिक दल बढ़ चढ़कर करते हैं. हालांकि निर्वाचन के बाद कुछ वादों को छोड़कर ज्यादातर वादे फरेब साबित होते हैं. बावजूद मतदाता को इस प्रलोभन में लुभाकर राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपना स्वार्थ साधने में सफल हो जाते हैं.
परंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने यह चुनावी रेवड़ियां बांटे जाने पर गंभीर चिंता जताई है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब चुनाव नीतियों और कार्यक्रम की बजाय प्रलोभनों का फंडा उछालकर लड़े जाने लगे हैं. राजनेताओं की यह भूमिका स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ों में मट्ठा डालने का काम कर रही है.
इस परिप्रेक्ष्य में दुविधा यह है कि राजनीतिक दलों पर आयोग का अनुशासनात्मक नियंत्रण निर्वाचन की अधिसूचना जारी होने के बाद होता है, जबकि ज्यादातर घोषणा-पत्र इस अधिसूचना के पहले जारी हो जाते हैं और कई वादे तो नेता चुनावी आमसभाओं में आचार संहिता का मखौल उड़ाते हुए भी कर डालते हैं.
तिस पर भी विडंबना है कि आदर्श निर्वाचन संहिता के तहत न तो कोई दंडात्मक कानून है और न ही इसकी संहिताओं में वैध-अवैध की अवधारणाएं परिभाषित हैं. आयोग यदि संहिता को लागू कर पाता है तो इसलिए कि राजनीतिक दल उसका सहयोग करते हैं और जनमत की भावना आयोग के पक्ष में होती है. तय है दल यदि आयोग के साथ असहयोग करने लग जाएं तो आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा रह जाएगा.
वैसे भी आयोग की जवाबदेही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की है, न कि दलों के चुनावी मुद्दे तय करने की. बावजूद आयोग मामले संज्ञान में लेता है और उम्मीदवार को चेतावनी भी देता रहता है. लेकिन उम्मीदवार जानते हैं कि उनकी उम्मीदवारी को तत्काल खारिज करने का कोई अधिकार आयोग के पास नहीं है, इसलिए वे बेपरवाह रहते हैं.