असम विधानसभाः भाजपा के सामने चुनौतियां हैं बड़ी
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 20, 2026 05:14 IST2026-03-20T05:14:52+5:302026-03-20T05:14:52+5:30
Assam Assembly: चुनावी जमीन पर उभरते संकेत बताते हैं कि इस बार भाजपा के लिए वापसी उतनी आसान नहीं है जितनी पहली नजर में दिखाई देती है.

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रविशंकर रवि
असम विधानसभा की 126 सीटों के लिए 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होना है. सरसरी नजर से देखने पर ऐसा लगता है कि भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) एक बार फिर भारी बहुमत के साथ सत्ता में लौट सकता है. राज्य में भाजपा की मजबूत संगठनात्मक संरचना, संसाधनों की प्रचुरता और केंद्र तथा राज्य सरकार की सक्रियता को देखते हुए यह धारणा स्वाभाविक भी लगती है. लेकिन चुनावी जमीन पर उभरते संकेत बताते हैं कि इस बार भाजपा के लिए वापसी उतनी आसान नहीं है जितनी पहली नजर में दिखाई देती है.
हालांकि जैसे-जैसे मतदान की तिथि करीब आ रही है, नए समीकरण बन रहे हैं और बिगड़ रहे हैं. कांग्रेस के दो बड़े नेता- सांसद प्रद्युत बोरदोलोई और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा के अंदर पुराने भाजपा नेता और कांग्रेस से आने वाले भाजपा नेता के बीच घमासान मचा है.
चुनाव की घोषणा से ठीक पहले तक केंद्र और राज्य सरकार की सक्रियता असम में स्पष्ट रूप से दिखाई दी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में कई बड़ी परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया, वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी चुनाव घोषित होने के कुछ घंटे पहले तक सरकारी कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए असम में मौजूद थे.
इसके अलावा चुनाव घोषणा से चार दिन पहले राज्य की करीब 40 लाख महिलाओं के खातों में 9-9 हजार रुपए की आर्थिक सहायता डाली गई. प्रधानमंत्री के हाथों चाय बागान के हजारों मजदूरों को जमीन के पट्टे भी वितरित किए गए. इन कदमों को सरकार की उपलब्धियों और जनकल्याणकारी योजनाओं के रूप में प्रचारित किया जा रहा है,
लेकिन इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी परिणाम पूरी तरह एकतरफा नहीं होंगे. सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के लिए ऊपरी असम में दिखाई दे रही है. राज्य की लगभग 50 विधानसभा सीटें इस क्षेत्र में आती हैं और पारंपरिक रूप से यह क्षेत्र असम की राजनीति का निर्णायक केंद्र रहा है.
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां की अधिकांश सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार स्थिति पहले जैसी नहीं दिखाई देती. भाजपा की चिंता का एक कारण यह भी है कि कांग्रेस ने चुनाव की घोषणा से पहले ही अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी, जिससे पार्टी को चुनाव प्रचार के लिए अधिक समय मिल गया.
इसके विपरीत भाजपा नामांकन की तिथि आरंभ होने के बाद 19 मार्च तक जाकर अपने सभी उम्मीदवारों की सूची जारी कर पाई. इस देरी का मुख्य कारण सहयोगी दल असम गण परिषद (अगप) के साथ सीटों के तालमेल को लेकर बने गतिरोध के साथ प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेताओं में उम्मीदवारों के चयन पर मतभेद भी था.
एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर कार्यकर्ता के स्तर पर असंतोष है तो इसका असर कई सीटों पर देखने को मिल सकता है. खासकर उन क्षेत्रों में जहां एजीपी का पारंपरिक प्रभाव रहा है. यदि इन सीटों पर भाजपा उम्मीदवार उतारे जाते हैं तो एजीपी के समर्थकों का एक वर्ग नाराज हो सकता है और इसका लाभ विपक्ष को मिल सकता है.
दूसरी ओर कांग्रेस ने रणनीतिक रूप से ऊपरी असम पर विशेष ध्यान दिया है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और सांसद गौरव गोगोई ने जोरहाट से विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है. गोगोई जोरहाट लोकसभा सीट से सांसद हैं और उनका संबंध अहोम समुदाय से है, जो ऊपरी असम की राजनीति में प्रभावशाली माना जाता है.
इस समुदाय की राजनीतिक दिशा कई सीटों के परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. ऐसे में गोगोई का विधानसभा चुनाव में उतरना कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
ऊपरी असम की राजनीति में एक और मुद्दा चर्चा में है. पिछली बार विधानसभा चुनाव के बाद सर्बानंद सोनोवाल के बजाय हिमंत बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने को लेकर कुछ वर्गों में असंतोष की चर्चा रही है.
हालांकि भाजपा ने इसे संगठनात्मक निर्णय बताया, लेकिन विपक्ष इसे राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाने की कोशिश कर रहा है. इसके अलावा गौरव गोगोई पर लगाए गए आरोपों को लेकर भी अहोम समुदाय के एक हिस्से में नाराजगी की चर्चा है, जो चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती है.