बड़े खतरे का संकेत हैं अरावली की दरारें

By प्रमोद भार्गव | Updated: January 24, 2026 07:40 IST2026-01-24T07:38:57+5:302026-01-24T07:40:53+5:30

रिपोर्ट में उल्लेख है कि हरियाणा की 8.2 प्रतिशत भूमि मरुस्थलीकरण के दायरे में है, क्योंकि 2019 तक ही अरावली का लगभग 5.77 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र उत्खनन से तबाह हो चुका था.

Aravalli cracks are a sign of great danger | बड़े खतरे का संकेत हैं अरावली की दरारें

बड़े खतरे का संकेत हैं अरावली की दरारें

अरावली पहाड़ियों में उत्खनन से बढ़ रहे खतरे का संकेत पर्यावरण के संरक्षक यूं ही नहीं दे रहे थे. अब इन अनुमानों का सत्य इस पर्वतमाला में पड़ी 12 दरारों से सामने आ गया है. इस कारण अरावली पर्वत श्रृंखलाएं न केवल लगातार कमजोर हुई हैं, बल्कि ये थार रेगिस्तान से पूर्व की ओर खिसकना भी शुरू हो गई हैं. इसके चलते राजस्थान के जयपुर सहित पूर्वी हिस्सों हरियाणा, दिल्ली-राजधानी क्षेत्र और गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों के मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ गया है.

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट में 1972-75, 1982-84, 1994-96 और विशेष रूप से 2005-2007 के कालखंड में किए गए क्रमिक उपग्रह आधारित अध्ययनों में यह चिंताजनक खुलासा किया गया है.

रिपोर्ट के अनुसार अरावली पर्वतमाला पर बनी 12 बड़ी दरारों के माध्यम से रेगिस्तानी रेत पूर्व की ओर बढ़ रही है. वर्ष 2005-07 के बाद अरावली की रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली क्षमता में तीव्रता से गिरावट दर्ज की गई है, क्योंकि इसी दौर में गुड़गांव समेत दिल्ली राजधानी क्षेत्र में शहरीकरण के साथ औद्योगिक-प्रौद्योगिक विस्तार के लिए वनों की कटाई के साथ पत्थर उत्खनन में आई तेजी चरम पर पहुंच गई.

नतीजतन पर्वतमाला की 12 प्रमुख दरारें अजमेर की मगरा पहाड़ियों से निकलकर झुंझुनूं के खेतड़ी और माधोगढ़ होते हुए हरियाणा के महेंद्रगढ़ तक फैली हुई हैं. इन्हीं कमजोर हिस्सों से थार रेगिस्तान की रेत पूर्व की ओर फैल रही है. राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय ने भी अपने अध्ययन में चेताया था कि आने वाले वर्षों में रेगिस्तान से उठने वाले रेत के तूफान दिल्ली और एनसीआर तक पहुंचकर पर्यावरण को बड़ी मात्रा में बिगाड़ने का काम कर सकते हैं.

लेकिन इन सर्वेक्षणों और अध्ययनों को राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली की राज्य सरकारों समेत केंद्र सरकार भी अनदेखा करते हुए कथित विकास के विनाशकारी उपायों को बढ़ावा देती रहीं.    

अरावली पहाड़ियां दुनिया की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाएं हैं. लगभग 692 किमी के दायरे में फैली ये पहाड़ियां गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक पसरी हैं. इन पहाड़ियों का मानव समुदाय के लिए प्राकृतिक महत्व है.

इस क्षेत्र में रहने वाले जीव-जगत की सांसें इन पर्वतमालाओं से गुजरने वाली शुद्ध हवा पर निर्भर हैं. इन्हीं पहाड़ियों की ओट पश्चिमी रेगिस्तान को फैलने से रोके हुए है, अन्यथा हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश की जो उपजाऊ भूमि है, उसे रेगिस्तान में तब्दील होने में समय नहीं लगेगा. पहाड़ियों की हरियाली नष्ट होने से इस क्षेत्र में शुष्कता का विस्तार हो रहा है और गर्मी बढ़ रही है.

नतीजतन जल स्तर आशंका से कहीं ज्यादा नीचे जा रहा है. लोगों में सांस और दमा की बीमारियां बढ़ रही हैं. ये परिणाम नेता, अधिकारी और ठेकेदारों के अकूत लालच की देन हैं. रिपोर्ट में उल्लेख है कि हरियाणा की 8.2 प्रतिशत भूमि मरुस्थलीकरण के दायरे में है, क्योंकि 2019 तक ही अरावली का लगभग 5.77 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र उत्खनन से तबाह हो चुका था. साफ है कि जानकारी होने के बावजूद अरावली संकट को कथित विकास के लिए नजरअंदाज किया गया.  

Web Title: Aravalli cracks are a sign of great danger

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