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आलोक मेहता का ब्लॉग: लोकतंत्र की मजबूती के लिए समाज का जागरूक होना जरूरी

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: January 26, 2020 05:51 IST

लोकतंत्न की मजबूती के लिए उन्माद नहीं, सही मुद्दों और समाज को जागरूक एवं शिक्षित करने की जरूरत होती है. संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, ‘‘बिना चरित्न और बिना विनम्रता के शिक्षित राजनीतिक व्यक्ति जानवर से ज्यादा खतरनाक है. यह समाज के लिए अभिशाप होगा.’’

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भारतीय संदर्भ में गणतंत्न का उल्लेख रामराज्य के रूप में होता है. आदर्श गणतंत्न, जहां सबको आगे बढ़ने और अभिव्यक्ति का अधिकार हो. ऐसा गणतंत्न जिसमें पंच परमेश्वर माने जाते हों. गणतंत्न, जिसमें निर्धनतम व्यक्ति को भी न्याय मिलने का विश्वास हो. गणतंत्न जिसमें जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि शासन व्यवस्था चलाकर सामाजिक- आर्थिक हितों की रक्षा करें. पिछले 72 वर्षो के दौरान भारतीय गणतंत्न फला-फूला है. बड़े-बड़े राजनीतिक तूफान झेलने के बावजूद इसकी जड़ें कमजोर नहीं हुई हैं.

लोकतंत्न में राजनीतिक शक्ति की धुरी होती हैं राजनीतिक पार्टियां. हाल के वर्षो में निहित स्वार्थो ने कुछ पार्टियों की मीठी खीर में खटास ला दी है. खासकर सत्ता में आने पर राजनीतिक दलों के कई नेता कार्यकर्ता कुछ अहंकार और कुछ पदों और लाभ के जोड़-तोड़ में लग जाते हैं. इसी वजह से धीरे-धीरे राज्यों में कांग्रेस या भाजपा की शक्ति कमजोर हुई है. गणतंत्न में मीठे फल सब खाना चाहते हैं, लेकिन फल-फूल देने वाले पेड़ों की चिंता कम लोगों को रहती है.

लोकतंत्न पर गौरव करने वाले कुछ पार्टियों के नेता अपने संगठन के स्वरूप को ही अलोकतांत्रिक बनाते जा रहे हैं. संविधान, नियम-कानून, चुनाव आयोग के मानदंडों के रहते हुए राजनीतिक दलों को ही खोखला किया जा रहा है. हाल के वर्षो में तो यह देखने को मिल रहा है कि कुछ नेता अपनी ही पार्टी के समकक्ष नेताओं को नीचा दिखाने, हरवाने, उनके बारे में अफवाहें फैलाने का काम करने लगते हैं. अपने परिजनों या प्रिय जनों को सत्ता में महत्वपूर्ण कुर्सी नहीं मिलने पर बगावत कर देते हैं. विचारधारा का नाम लिया जाता है लेकिन बिल्कुल विपरीत विचार वाले दल के साथ समझौता कर लेते हैं. कार्यकर्ता और जनता की भावना से कोई मतलब नहीं रहता.

यों यह बात नई नहीं है. बहुत से लोग आजकल वर्तमान स्थिति में निराश होकर चिंता व्यक्त करते हैं. उनके लिए मैं एक पत्न की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं. पत्न में लिखा था- ‘‘मैं शिद्दत से महसूस कर रहा हूं कि कांग्रेस मंत्रिमंडल बहुत अक्षम तरीके से काम कर रहे हैं. हमने जनता के मन में जो जगह बनाई थी, वह आधार खिसक रहा है. राजनेताओं का चरित्न अवसरवादी हो रहा है. उनके दिमाग में पार्टी के झगड़ों का फितूर है. वे इस व्यक्ति या उस गुट को कुचलने की सोच में लगे रहते हैं.’’ यह पत्न आज के कांग्रेसी का नहीं है. यह पत्न महात्मा गांधी ने 28  अप्रैल 1938  को लिखा और नेहरू को भेजा था, जब राज्यों में अंतरिम देशी सरकारें बनी थीं.

क्या आज के राजनीतिक दलों में भी यही चीज देखने को नहीं मिल रही है? लोकतंत्न में असहमतियों को सुनने - समझने और गलतियों  को सुधारते  हुए पार्टी, सरकार और समाज के हितों की रक्षा हो सकती है. राजनीतिक व्यवस्था संभालने वालों को आत्म निरीक्षण कर अपने दलगत ढांचे में लोकतांत्रिक बदलाव का संकल्प गणतंत्न दिवस के पर्व पर करना चाहिए.

लोकतंत्न की मजबूती के लिए उन्माद नहीं, सही मुद्दों और समाज को जागरूक एवं शिक्षित करने की जरूरत होती है. संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, ‘‘बिना चरित्न और बिना विनम्रता के शिक्षित राजनीतिक व्यक्ति जानवर से ज्यादा खतरनाक है. यह समाज के लिए अभिशाप होगा.’’ दु:ख तब होता है जब गलत व्यक्ति चुने जाने पर कुछ नेता जनता को दोषी ठहराने लगते हैं. वास्तव में उन्हें अपने काम, पार्टी को सही दिशा के साथ जनता के बीच सक्रि य रखना होगा. तभी उन्हें लोकतंत्न के पर्व को मनाने का लाभ मिलेगा.

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