हवाई सुरक्षा को लेकर उठते सवाल

By विजय दर्डा | Updated: February 3, 2026 05:59 IST2026-02-03T05:58:45+5:302026-02-03T05:59:16+5:30

Ajit Pawar Plane Crash: दादा यादों के इंद्रधनुष का हिस्सा बन गए. जाने वाले कब लौट कर आते हैं? बस यादें रह जाती हैं. अपने राजनीतिक गुरु और चाचा शरदचंद पवार के नक्शे-कदम पर उन्होंने राजनीति का पाठ पढ़ा.

Ajit Pawar Plane Crash Questions raised about air safety Ajit Dada we will never forget you Goodbye blog Dr Vijay Darda | हवाई सुरक्षा को लेकर उठते सवाल

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Highlightsफिर साथ बैठेंगे, भोजन करेंगे और खूब गप्पें लड़ाएंमजाक में कहा कि दादा लड़ेंगे-लड़ाएंगे नहीं, खुशियां मनाएंगे. कहानी बनते-बनते अधूरी रह गई.

Ajit Pawar Plane Crash: महाराष्ट्र के प्रखर नेता अजित दादा को हमने खो दिया. बस उनकी यादें शेष रह गई हैं. नागपुर में पिछले विधानसभा सत्र के दौरान महाराष्ट्र के मंत्रियों और विधायकों के लिए मैंने सम्मान भोज आयोजित किया था. दादा आए थे. बड़ी खुशमिजाजी से मिले, आमतौर पर गंभीर रहने वाले अजित दादा की आंखों में उस दिन गजब की चमक थी. व्यक्तित्व में उल्लास झलक रहा था. उन्होंने कहा कि जिस बिल्डिंग में आप रहते हैं वहीं रहने मेरे सुपुत्र पार्थ भी आ रहे हैं. मैं घर देखने आने वाला हूं. फिर साथ बैठेंगे, भोजन करेंगे और खूब गप्पें लड़ाएंगे.

मैंने मजाक में कहा कि दादा लड़ेंगे-लड़ाएंगे नहीं, खुशियां मनाएंगे. नियति के दस्तूर का क्या कहें, कहानी बनते-बनते अधूरी रह गई. दादा यादों के इंद्रधनुष का हिस्सा बन गए. जाने वाले कब लौट कर आते हैं? बस यादें रह जाती हैं. अपने राजनीतिक गुरु और चाचा शरदचंद पवार के नक्शे-कदम पर उन्होंने राजनीति का पाठ पढ़ा.

फर्क बस इतना था कि शरदचंद पवार मुस्कुरा कर राजनीति करते हैं और अजित दादा बेबाक थे. हां तो हां, ना तो ना! पवार साहब की तरह ही सूर्योदय के साथ अजित दादा की दिनचर्या शुरू हो जाती थी. पहली बैठक का समय होता था सुबह 7 बजे! ऐसी बहुत सी बातें हैं जोे उन्हें पसंद करने का कारण थीं. मुंबई में शनिवार या रविवार को कितना भी महत्वपूर्ण कार्यक्रम हो,

वे शामिल नहीं होते थे क्योंकि इनमें से एक पुणे और दूसरा दिन बारामती के लिए आरक्षित रहता था. दादा के साथ की और भी बहुत सी यादें हैं लेकिन इस वक्त मैं इस सोच से उबर नहीं पा रहा हूं कि हवाई यात्राएं इतनी असुरक्षित क्यों हो रही हैं. भारत में हवाई यात्रा की सुरक्षा को हम सब बहुत बेहतर कहते हैं. इसके समर्थन में हमारे पास बहुत से कागजी आंकड़े भी हैं.

वैश्विक विमानन सुरक्षा रैंकिंग में हम 112 से उठ कर 55 वें स्थान तक पहुंच चुके हैं. मगर मेरे मन में सवाल उठ रहा है कि चूक कहां हो रही है? जब हम सड़क पर यात्रा करते हैं तो भीषण दुर्घटना में भी बचने की संभावनाएं बनी रहती हैं लेकिन हवा में तो एक छोटी सी चूक भी सभी यात्रियों के लिए मौत का कारण बन जाती है. भारत में वीआईपी मूवमेंट के लिए नियम-कानून का अंबार है,

फिर भी चूक कैसे हो जाती है. आखिर ऐसी दुर्घटनाओं में हमने कितने लोगों को खोया है. लंबी सूची है. होमी भाभा, बिपिन रावत, संजय गांधी, माधवराव सिंधिया, विजय रुपाणी, ओ.पी. जिंदल, जी. एम. सी. बालयोगी,  वाई. एस. आर. रेड्डी, दोरजी खांडू और साइप्रियन संगमा जैसे अनेक प्रमुख व्यक्तियों के नाम शामिल हैं.

वैसे प्रसंगवश बता दें कि 1965 की जंग में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंत राय मेहता के विमान को पाकिस्तान ने सैन्य विमान समझ कर मार गिराया था. खैर, वह तो मामला ही अलग था.  ये तो मैं उनकी बात कर रहा हूं जो चले गए. विमान दुर्घटना से बाल-बाल बचने वालों में वसंतराव नाईक से लेकर देवेेंद्र फडणवीस तक की लंबी सूची है.

जब राहुल गांधी आंध्रप्रदेश के चुनावी दौरे पर थे तब मैंने महसूस किया कि लैंड करते वक्त धूल का ऐसा गुबार उठा कि हेलिकॉप्टर दिख ही नहीं रहा था. वह दृश्य देखकर मैं घबरा गया था. एक और घटना बताता हूं. मैं और मेरे अनुज राजेंद्र दर्डा हेलिकॉप्टर से मुंबई से ठाणे जा रहे थे. कुल जमा दस-पंद्रह मिनट की यात्रा थी लेकिन इतना कोहरा था, इतना प्रदूषण था कि कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था.

उस मार्ग पर कई पहाड़ हैं और ऊंची इमारतें हैं. हमने भगवान का नाम लेते वह यात्रा की. आए दिन हमें यह खबर मिलती रहती है कि कहीं विमान से पक्षी टकरा गया तो कहीं रनवे पर कुत्ता आ गया. कई पायलट्स ने तो यहां तक शिकायत की है कि लेजर बीम के कारण भी उन्हें कई बार परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

अब अजित दादा के चार्टर्ड विमान की दुर्घटना को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं वो चौंकाने वाली हैं. बताया जा रहा है कि विमान में भी खामियां थीं. इसके अलावा बारामती एयरपोर्ट पर न तो ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम है और न ही इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम है. स्थानीय फ्लाइट ट्रेनिंग स्कूल के इंस्ट्रक्टर रेडियो कम्युनिकेशन संभालते हैं.

पायलट को रनवे तलाशने के लिए सूरज के सामने देखना पड़ रहा था. सूरज की चमक ने भी चकमा दिया होगा. और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात जो उभर कर सामने आ रही है, वह है पायलट कैप्टन सुमित कपूर का मदिरा प्रेम. दो बार ऐसे मौके आए थे जब फ्लाइट से पूर्व उन्हें नशे में पाया गया और डीजीसीए ने उन्हें तीन साल के लिए निलंबित भी किया था.

सवाल है कि ऐसे कैप्टन के हाथों में प्लेन क्यों दिया गया? कमर्शियल पायलट की नींद सात घंटे हुई है या नहीं या फिर वह नशे में तो नहीं है, इसकी जांच व्यापक तौर पर होती है लेकिन चार्टर्ड एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर के मामले में क्या इन नियमों का सख्ती से पालन किया जाता है?

मैं सोच रहा हूं कि अत्यंत छोटे विमानतलों पर भी यदि सुरक्षा की व्यवस्था माकूल नहीं है तो फिर उन विमानतलों को संचालित ही क्यों किया जा रहा है? भले ही किसी विमानतल पर महीने-दो महीने में एक विमान ही उतरे लेकिन सुरक्षा की व्यवस्था तो वैसी ही होनी चाहिए जैसे बड़े विमानतलों पर होती है.

वैसे तो देश के सारे राज्यों को अपने विमानतलों पर समुचित सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए लेकिन विकसित राज्य महाराष्ट्र को इस मामले में नजीर पेश करनी चाहिए. अजित दादा तो चले गए! उन्हें कोई वापस नहीं ला सकता लेकिन यह तो सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी हवाई दुर्घटना फिर कभी न हो! फिर किसी की जान न जाए!

अजित दादा... हम आपको कभी भुला न पाएंगे. अलविदा!

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