एक उम्मीद का दुनिया से अचानक चले जाना
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: January 29, 2026 09:45 IST2026-01-29T05:57:55+5:302026-01-29T09:45:51+5:30
Ajit Pawar Plane Crash: महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी अलग छाप छोड़ने वाले अजित पवार पैंतालीस साल तक अपने चाचा शरद पवार की छत्रछाया में पले और बढ़े.

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Ajit Pawar Plane Crash: ‘फेक न्यूज’ के जमाने में सुबह-सुबह कोई अविश्वसनीय किंतु सत्य समाचार आ जाए तो उस पर भरोसा करने में बहुत समय लगता है. महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन की खबर जब दिन की शुरुआत में ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनी तो उस पर विश्वास करने में बहुत समय लगा. राज्य का एक ऐसा नेता, जो शारीरिक और मानसिक दोनों रूप में ‘फिट’ हो, उसका अचानक अवसान हृदयविदारक घटना ही कही जा सकती है. महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी अलग छाप छोड़ने वाले अजित पवार पैंतालीस साल तक अपने चाचा शरद पवार की छत्रछाया में पले और बढ़े.
उन्होंने लोकसभा से लेकर विधानसभा तक हर सदन में अपनी भागीदारी दिखाई. वे कांग्रेस में थे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) में भी थे. उन्होंने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में काम किया और वही भूमिका देवेंद्र फडणवीस के साथ निभाई. लिहाजा दल कोई भी हो, वे अपने अंदाज में बने रहे.
उन्हें अजित दादा कहने वाले किसी भी सरकार में उनको ‘दादा’ ही मानते रहे. उनकी अपने गृह क्षेत्र बारामती को लेकर चिंताएं हों या उसके जिले पुणे की आवश्यकताएं हों, वे हर तरह से अपने इलाकों के लिए समर्पण भाव से काम करते रहे और अपने साथी-सहयोगियों में भी क्षेत्र को लेकर गंभीरता बनाए रखी. आलोचक उन पर अनेक प्रकार के आरोप लगाते थे,
उनके सहयोगियों को लेकर भी उंगलियां उठाई जाती थीं, मगर उससे न वे स्वयं कभी विचलित हुए और न ही अपने साथियों को परेशान होने दिया. यह उनका गुण उनकी निजी ताकत था. उन्होंने वर्ष 2019 में पार्टी के सिद्धांतों के विरुद्ध भाजपा के नेता फडणवीस के साथ सरकार बनाई, जो कुछ दिन चली. फिर दूसरी सरकार में शामिल हुए और आखिरी में तीसरी अलग विचारधारा की सरकार में शामिल हुए.
किंतु वे सरकार का नेतृत्व करने वालों की विचारधारा से जरा भी प्रभावित नहीं हुए. उन्होंने समय के साथ अपनी सोच को बदलने की आवश्यकता महसूस नहीं की. अपने विचारों को सदैव उन्हीं अंदाज में व्यक्त किया, जिनके लिए उनकी पहचान थी. वे अपने चाचा शरद पवार के दल से बगावत कर फडणवीस सरकार में शामिल हुए, लेकिन उन्होंने कभी पारिवारिक मान-सम्मान को ताक पर नहीं रखा.
यहां तक कि अनेक अवसरों पर उन्हें विरोध के लिए मजबूर किया गया, परंतु उनका मन परिवर्तित नहीं हुआ. वे अपने चाचा से अलग राजनीति कर रहे थे, लेकिन उनके समर्थक दूसरे पाले में भी थे. लोकसभा चुनाव में पराजय, विधानसभा चुनाव में जीत, नगर परिषद में अच्छा प्रदर्शन और महानगर पालिका चुनाव में हार के बावजूद वे बगावती तेवरों को लेकर खड़े नहीं हुए.
उन्होंने हमेशा समय और परिस्थिति के आकलन और संवेदनशीलता को समझा. उसी के अनुसार निर्णय लिए, जिससे भविष्य की राजनीति में भी उन्हें आशा भरी नजरों से देखा गया. एक उत्साहपूर्ण वातावरण में अचानक उनका मौत के गाल में समा जाना समूचे महाराष्ट्र के लिए गहरा सदमा है.
और अंत समय में सवाल यही है कि जिसका नाम ही अजित हो, क्या वह इतनी आसानी से मौत से हार सकता है? उनका शरीर भले ही नष्ट हो गया हो लेकिन उनके काम राज्य के लोगों की यादों में लंबे समय तक बने रहेंगे.