बहुमत का कर्त्तव्य भी बनता है अल्पमत को संरक्षण दे?, देश के 5 राज्यों में चुनाव की घोषणा?
By विश्वनाथ सचदेव | Updated: March 19, 2026 03:23 IST2026-03-19T03:22:17+5:302026-03-19T03:23:10+5:30
देश में एकता का मतलब यह है कि विभिन्न धर्मों, जातियों, वर्गों का होने के बावजूद हमारे भीतर यह अहसास बना रहे कि हम सब इस देश के नागरिक हैं, देश के हित में ही हम सबका हित निहित है.

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देश के पांच राज्यों में चुनावों की घोषणा हो गई है. अब चुनाव-प्रचार में तेजी आएगी. इस तेजी का एक मतलब नेताओं के भाषणों में तेजी आना है. वैसे भी, हमारे नेता, चाहे वे किसी भी रंग वाले हों, बोलने में किसी से पीछे नहीं हैं, पर अब यह बड़बोलापन और उभर कर सामने आएगा. हमारे नेता कभी भी, कहीं भी, कुछ भी बोल सकते हैं. हमारा भारत बहुत बड़ा देश है. यहां अनेक धर्म हैं, अनेक विचारधाराएं हैं. देश के हर नागरिक को अधिकार है अपनी बात कहने, अपनी बात समझाने का, अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार का. हर नागरिक को यह भी अधिकार है कि वह दूसरे को गलत सिद्ध करने की कोशिश करे.
शर्त बस यह है कि वह यह काम तार्किक ढंग से, विवेकशील तरीके से करे-- यह सब करते हुए दूसरे के इस अधिकार को भी स्वीकारे कि उसे भी अपनी बात कहने का उतना ही अधिकार है. बात सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की नहीं है, बात एक ऐसी व्यवस्था को भी स्वीकारने की है जिसे हमने अपने लिए चुना है. हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में अलग-अलग विचारों को रहने-पनपने का अवसर है.
देश में एकता का मतलब यह है कि विभिन्न धर्मों, जातियों, वर्गों का होने के बावजूद हमारे भीतर यह अहसास बना रहे कि हम सब इस देश के नागरिक हैं, देश के हित में ही हम सबका हित निहित है. इसका मतलब यह भी है कि विभिन्न विचारधाराओं का मतलब यह नहीं है कि हम एक-दूसरे के दुश्मन हैं. हम एक-दूसरे के विरोधी हो सकते हैं, एक-दूसरे को गलत मान सकते हैं, बता सकते हैं.
पर हम यह कदापि नहीं चाहेंगे कि दूसरे की कीमत पर हम अपना हित साधें. हमें एकता और एकरूपता के अंतर को पहचानना होगा. एकरूपता चाहने का मतलब है दूसरे के अस्तित्व को नकारने की कोशिश करना, जबकि एकता हमें साथ मिलकर आगे बढ़ने का अवसर देती है, अर्थ समझाती है.
एकता हमें बताती है कि हमारा हित एक-दूसरे के साथ होने, साथ जीने में है, जबकि एकात्मकता का अर्थ है भिन्नता का मिट जाना. किसी अस्तित्व का इस तरह का नकार आध्यात्मिक अर्थों में भले ही आकर्षक लगता हो, पर लौकिक जीवन में यह अद्वैत समस्याओं को जन्म देने वाला ही हो सकता है. आओ, साथ जियें', और `मेरे साथ जीने के लिए तुम मिट जाओ' के अंतर को हमें समझना होगा.
कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाला हो, किसी भी विचारधारा का हो, अच्छा भी हो सकता है, बुरा भी हो सकता है. पर वह इसलिए अच्छा या बुरा नहीं है कि वह किसी धर्म या किसी विचारधारा को मानता है. विभिन्न विचारों, धर्मों का होने के बावजूद हम साथ रह सकते हैं, यह साथ रहना ही हमारी एकता है. एक-दूसरे को अपना मानना हमारी ताकत है.
आज, जबकि देश के पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा हो चुकी है, और प्रचार-कार्य ज़ोर पकड़ रहा है, इस बात की आवश्यकता कहीं अधिक है कि हमारे राजनेता संयम और समझदारी का परिचय दें. वैसे तो पिछले एक अर्से से हम देख रहे हैं कि हमारे नेता चुनावी मानसिकता से उबर ही नहीं पाते.
कुछ कहने-करने का उनका अंदाज ही चुनावी हो गया है- चुनावी अर्थात् अपने विरोधी को दुश्मन की तरह देखने का अंदाज. राजनीति का यह स्वरूप भयावह है. जनतंत्र भले ही बहुमत के शासन का एक स्वरूप हो, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि बहुलतावाद हमारी राजनीति का मुख्य चेहरा बन जाए.
फिर, बहुमत के शासन का यह अर्थ भी नहीं है कि अल्पमत के अस्तित्व को ही नकराने का अवसर मान लिया जाए. सच तो यह है भारत जैसे देश में बहुमत का यह कर्त्तव्य भी बनता है कि वह अल्पमत को संरक्षण दे. सवाल बहुमत के हित का नहीं, सबके हित का है. ‘सबका साथ, सबका विकास' सिर्फ एक नारा बन कर नहीं रहना चाहिए. यह एक विचार है जिसे ईमानदारी से फैलाने की कोशिश होनी चाहिए.