हम जिन्हें मानते हैं असभ्य या सभ्य, हकीकत कहीं उलट तो नहीं!

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 25, 2026 05:25 IST2026-03-25T05:25:01+5:302026-03-25T05:25:01+5:30

अफ्रीकी हाथी गठिया के दर्द को कम करने के लिए एक विशेष पेड़ की छाल चबाते हैं. चींटी और दीमक की कई प्रजातियां संक्रमण फैलने पर संक्रमित साथी को झुंड से अलग कर देती हैं.

Research revealed ants know how perform operations and treatments Those whom consider uncivilized or civilized reality opposite blog Hemdhar Sharma | हम जिन्हें मानते हैं असभ्य या सभ्य, हकीकत कहीं उलट तो नहीं!

सांकेतिक फोटो

Highlightsअध्ययन से पता चला कि चींटियों का यह व्यवहार जन्मजात होता है, जो जटिल मेडिकल सिस्टम जैसा है.कुत्ते-बिल्लियों को हम कभी-कभी घास खाते देखते हैं और बहुत से लोगों को पता होगा कि वे अपने पाचन तंत्र को दुरुस्त करने के लिए ऐसा करते हैं. कई जानवर बीमार पड़ने पर खाना छोड़ देते हैं और तब तक आराम करते हैं जब तक वे स्वस्थ न हो जाएं.

हेमधर शर्मा

हाल ही में एक रिसर्च सामने आई कि चींटियां आपरेशन और इलाज करना जानती हैं. चोट से संक्रमण न फैले, इसलिए अफ्रीका की कैम्पोनोटस और मैकुलेटम चींटियां अपनी घायल साथियों का पैर काटकर उनकी जान बचाती हैं. जर्मनी की बुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी के एरिक फ्रैंक ने अपने शोध में पाया कि मेगापोनेरा एनालिस चींटियां घायल साथियों के घाव पर एक विशेष प्रकार का तरल पदार्थ लगाती हैं, जिससे उनके जीवित रहने की संभावना 30 से बढ़कर 80 प्रतिशत हो जाती है. अध्ययन से पता चला कि चींटियों का यह व्यवहार जन्मजात होता है, जो जटिल मेडिकल सिस्टम जैसा है.

कुत्ते-बिल्लियों को हम कभी-कभी घास खाते देखते हैं और बहुत से लोगों को पता होगा कि वे अपने पाचन तंत्र को दुरुस्त करने के लिए ऐसा करते हैं. अफ्रीकी हाथी गठिया के दर्द को कम करने के लिए एक विशेष पेड़ की छाल चबाते हैं. चींटी और दीमक की कई प्रजातियां संक्रमण फैलने पर संक्रमित साथी को झुंड से अलग कर देती हैं.

कई जानवर बीमार पड़ने पर खाना छोड़ देते हैं और तब तक आराम करते हैं जब तक वे स्वस्थ न हो जाएं. हम मनुष्य लेकिन क्यों नहीं जान पाते कि हमारे शरीर के भीतर क्या चल रहा है? मवेशी जब घास खाते हैं तो पहले सूंघकर पता लगा लेते हैं कि कौन सी घास अवांछित है अर्थात उसे नहीं खाना है. शेर का जब पेट भरा होता है तब वह शिकार नहीं करता और वन्यप्राणी निर्भय होकर उसके सामने विचरण करते हैं.

हम मनुष्य भी क्या जानते हैं कि हमें क्या खाना चाहिए, क्या नहीं, और कितना खाना चाहिए? अगर जानते तो शायद अकेले भारत में ही बीमारियों के इलाज पर हर साल नौ लाख करोड़ रु. से अधिक खर्च नहीं होते और दुनिया में एक अरब से अधिक लोग (विश्व स्वास्थ्य संगठन और लैंसेट के 2024 के आंकड़ों के अनुसार) मोटापे का शिकार नहीं होते!

अपने सभ्य होने पर गर्व करते हुए, जिस जंगलराज को हम हेय दृष्टि से देखते हैं, अपने सारे जंगलीपन के बावजूद सारे वन्यप्राणी उसी वन में साथ-साथ रहते हैं. फिर हम मनुष्य ही क्यों जाति-धर्म-नस्ल आदि के आधार पर समाज से अपने विजातीयों का सफाया करने पर आमादा हो जाते हैं? जिन पेड़-पौधों को हम जड़ मानते हैं,

उनमें जीवन होने की बात तो वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बोस ने लगभग एक शताब्दी पहले ही साबित कर दी थी, पिछले दशकों में हुई रिसर्च से पता चला कि पेड़-पौधे एक-दूसरे से बातचीत भी करते हैं. जमीन के नीचे फैली अपनी जड़ों के जरिये वे एक-दूसरे का हालचाल जानते हैं और किसी पेड़ के पास अगर किसी पोषक तत्व की कमी है तथा दूसरे के पास वह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है तो जड़ों के जरिये ही वे उसका आदान-प्रदान करते हैं! पता तो यह भी चला है कि अगर कोई छोटा पौधा सूर्य की रोशनी नहीं मिल पाने की गुहार लगाता है तो आसपास के बड़े पेड़ अपनी टहनियों को दूसरी ओर मोड़ लेते हैं.

उसको आवश्यक पोषक तत्व भी देते हैं! अपनी जड़ों के जरिये पेड़-पौधे जंगल में एक सिरे से दूसरे सिरे तक बात करने की क्षमता रखते हैं. बेशक कुछ पेड़ ऐसे भी होते हैं जो आसपास के दूसरे पेड़ों का इतना पोषक तत्व चुरा लेते हैं कि वे बेचारे सूख ही जाते हैं, लेकिन ऐसे पेड़ बहुत कम संख्या में होते हैं. ठीक वैसे ही जैसे अपवादस्वरूप कुछ जानवरों के मुंह में आदमी का खून लग जाने से वे आदमखोर बन जाते हैं.

कहीं ऐसा तो नहीं कि दुनिया के सारे चर-अचर प्राणी एक-दूसरे के साथ बातचीत करने की क्षमता रखते हों, एक-दूसरे के सुख-दु:ख में शामिल होते हों और हम तथाकथित सभ्य मनुष्य ही इतने कृत्रिम बन गए हों कि उस वैश्विक समाज से बहिष्कृत हो गए हों! पुराने जमाने में लोग शायद इसीलिए प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करके रहते थे.

नदी, पहाड़, जंगल- जिससे भी हम कुछ लेते थे, देवता मानकर उनकी पूजा करते थे और क्या पता तब उनकी भाषा समझने की क्षमता भी हमारे भीतर रही हो! पेड़-पौधों, मनुष्येतर जीव-जंतुओं से वार्तालाप की जिन पुरानी कहानियों को आज हम कवि-कल्पना मान कर खारिज कर देते हैं, क्या पता वैसा कभी सचमुच में होता रहा हो!

और जिस तरह से आज हम मनुष्य अपने बीच के बुरे मनुष्यों को पाप का दंड भुगतने के लिए चौरासी लाख मनुष्येतर योनियों में भटकने का भय दिखाते हैं, क्या पता अच्छे पेड़ भी अपने बीच के बुरे पेड़ों को और अच्छे जानवर अपने बीच के बुरी प्रकृति के जानवरों को नहीं सुधरने पर मनुष्य योनि में जन्म लेने का डर दिखाते हों!

फिर सभ्य किसे माना जाए और किसे जंगली? आखिर कुछ दशक पहले तक तो हम मनुष्य भी देने वाले को दाता या देवता और लेने वाले को भिखारी मानते रहे हैं! सब जानते हैं कि मनुष्येतर सारे प्राणी दुनिया को कुछ न कुछ देते ही हैं; और लेता कौन है, यह भी तो किसी से छिपा नहीं है! तो क्या जिसे हम असभ्य मानते हैं, वही सभ्य हैं?

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