मासूम जिंदगियों से खिलवाड़ करते ऑनलाइन गेम्स

By अभिषेक कुमार सिंह | Updated: February 7, 2026 05:59 IST2026-02-07T05:59:15+5:302026-02-07T05:59:15+5:30

उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद में तीन बहनों की आत्महत्या के घटनाक्रम से इस मामले को जोड़ें तो यही लगता है कि तकनीक ने घर बैठे खेल और मनोरंजन की जो सहूलियत हमें मुहैया कराई है, वह अंततः जानलेवा ही है.

Online games playing innocent lives blog Abhishek Kumar Singh | मासूम जिंदगियों से खिलवाड़ करते ऑनलाइन गेम्स

file photo

Highlightsगाजियाबाद की घटना को केवल ‘आत्महत्या’ के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी. कितनी देर तक मौजूद रहें और क्या सिर्फ पढ़ाई करें.अदालत का मत था कि ऑनलाइन गेम्स के कारण बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो रही हैं.

यूं खेलों को अरसे से शारीरिक और मानसिक विकास में मददगार माना जाता रहा है, लेकिन जब से वीडियो गेम्स और कम्प्यूटर-मोबाइल पर खेले जाने गेम्स आए- उनके बारे में दावा किया गया कि वे कई मामलों में सेहत पर बुरा असर डालते हैं. कई बार मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स के कारण लोगों, खास तौर से किशोर उम्र के बच्चों की जिंदगी भी खतरे में पड़ गई. हाल ही में, उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद में तीन बहनों की आत्महत्या के घटनाक्रम से इस मामले को जोड़ें तो यही लगता है कि तकनीक ने घर बैठे खेल और मनोरंजन की जो सहूलियत हमें मुहैया कराई है, वह अंततः जानलेवा ही है.

गाजियाबाद की घटना को केवल ‘आत्महत्या’ के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी. यह घटना उस अदृश्य तनाव-तंत्र का परिणाम है जिसमें आज के बच्चे जी रहे हैं- एक ऐसा तंत्र जिसमें डिजिटल तकनीक, आर्थिक असुरक्षा, पारिवारिक टूटन और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा एक साथ मिलकर एक विस्फोटक स्थिति बना रहे हैं.

हालांकि कहा जाता है कि आज के आधुनिक दौर में अगर बच्चे तकनीक से दूर रहेंगे तो वे जिंदगी में पिछड़ जाएंगे लेकिन इसके उलट तस्वीर यह है कि तकनीक का मनमाना इस्तेमाल करेंगे तो उनकी सोच सिकुड़ जाएगी. कुएं और खाई वाली इस विरोधाभासी स्थिति से दुनिया भर के बच्चे बीते एक-दो दशकों से लगातार दो-चार हैं.

खासतौर से कोरोना महामारी के दौर के बाद शहरों से लेकर गांवों तक में, हर जगह बच्चे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से घिर गए हैं. कक्षाएं ऑनलाइन हुईं तो अभिभावक चाहकर भी बच्चों को मोबाइल और इंटरनेट से दूर नहीं कर पाए. उधर, बच्चों के सामने चुनौती यह रही है कि आखिर वे डिजिटल स्क्रीनों के सामने कितनी देर तक मौजूद रहें और क्या सिर्फ पढ़ाई करें.

पढ़ाई की बोझिलता दूर करने के लिए वे उस खौफनाफ डिजिटल दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं, जहां ऑनलाइन गेम्स हैं, कोरियन कंटेंट है, पोर्नोग्राफी है. यह कितनी खतरनाक स्थिति है, इसी का ज्वलंत उदाहरण गाजियाबाद की घटना है. पांच साल पहले वर्ष 2021 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा था कि वह बच्चों को ऑनलाइन गेम्स की लत से बचाने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग करने वाले प्रतिवेदन पर फैसला करे. अदालत का मत था कि ऑनलाइन गेम्स के कारण बच्चों में मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो रही हैं.

कोर्ट की राय से सहमति रखते हुए केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने भी टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि सोची-समझी साजिश के तहत बुरी ताकतें ऑनलाइन गेम्स के जरिए बच्चों का ब्रेनवॉश कर रही हैं. तब यह मामला गैर-सरकारी संगठन डिस्ट्रेस मैनेजमेंट कलेक्टिव (डीएमसी) की ओर से दायर याचिका से प्रकाश में आया था.

इसमें कई अभिभावकों की यह शिकायत साझा की गई थी कि कोरोना काल की विवशताओं के कारण बच्चों में ऑनलाइन गेम्स की लत बढ़ गई है. इससे बच्चों को विभिन्न प्रकार की मनोवैज्ञानिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.  याचिका में ऑफलाइन और ऑनलाइन गेम, दोनों की ही सामग्री की निगरानी और मूल्यांकन करने के लिए एक नियामक प्राधिकरण का गठन करने का भी अनुरोध किया गया था.

इसके साथ ही स्कूलों की ओर से बच्चों के लिए परामर्श सत्रों के आयोजन और इस बारे में एक राष्ट्रीय नीति भी बनाने की मांग की गई थी. दुनिया में जब से अकेले खेले जाने वाले वीडियो और मोबाइल गेम्स आए हैं, बच्चों और किशोरों की दुनिया ही अलग हो गई है.  दिक्कत यह भी है कि छोटे बच्चों को डांट-पुचकार कर ऐसे गेम्स से दूर ले जाया जा सकता है, लेकिन किशोरों को इस तरह बहलाना आसान नहीं होता.

ऐसा करने पर उन्हें लगता है कि कुछ ऐसा रहस्य है, जिसे जानना जरूरी है. अक्सर ऐसी स्थितियों में मां-बाप को जब तक अपने बच्चों के ऑनलाइन गेम्स के शिकंजे में फंसने की जानकारी मिलती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है. ऐसे गेम्स की खतरनाक कामयाबी के पीछे असल में हमारे समाज की असफलता और टूट जिम्मेदार है, जिसमें नाते-रिश्तेदारों, बड़े-बुजुर्गों और सच्चे पड़ोसियों-मित्रों की जगह इंटरनेट और खौफनाक इरादों वाले खतरनाक ऑनलाइन गेम्स ने ले ली है.

समझना होगा कि इंटरनेट की बेहद बड़ी दुनिया पर भले ही अंकुश न लगाया जा सके, लेकिन हमारा समाज यदि अपने भीतर परिवारों, मित्रों, पड़ोसियों के बीच जुड़ाव की छोटी कोशिशें शुरू करेगा तो इंटरनेट के ऐसे खतरनाक जाल को काटना थोड़ा आसान हो जाएगा.

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