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मेरी जंग सबकी जीत

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: November 10, 2025 19:04 IST

मुझे पहली बार अपने कैंसर के बारे में पता चला, तो ऐसा लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया रुक गई हो. डर, अनिश्चितता और अनगिनत सवालों ने मुझे घेर लिया था. लेकिन कहते हैं न …

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मुझे पहली बार अपने कैंसर के बारे में पता चला, तो ऐसा लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया रुक गई हो. डर, अनिश्चितता और अनगिनत सवालों ने मुझे घेर लिया था. लेकिन कहते हैं न … जब ज़िंदगी सबसे कठिन मोड़ पर लाती है, तब वह सबसे अच्छे लोगों से भी मिलवाती है.मेरे लिए वे लोग  दिल्ली स्टेट कैंसर अस्पताल के मेरे डॉक्टर्स , नर्सिंग स्टाफ और पूरा अस्पताल रहा जो  मेरा  परिवार बना.

मेरे डॉक्टर सिर्फ मेडिकल साइंस के विशेषज्ञ ही नहीं, बल्कि उम्मीद के असली रचनाकार हैं. उन्होंने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं एक गंभीर बीमारी से लड़ रही हूँ. हर परामर्श में उन्होंने  पहले मेरे मन का इलाज किया, फिर मेरे शरीर का.जब मेरी आँखों में डर होता, उनकी आवाज़ में भरोसा होता. जब मैं कमजोर पड़ती, उनके शब्द मेरी ताकत बन जाते. उनके लिए यह भले ही रोज़ का काम हो, लेकिन मेरे लिए यह जीवनदान है. जिसके लिए इनका जितना आभार व्यक्त किया जाये कम है. नर्सिंग स्टाफ की बात करूँ तो, वे किसी फरिश्ते से कम नहीं. दिन-रात की भागदौड़ के बाद भी उनके चेहरे की मुस्कान कभी कम नहीं होती. दर्द में कराहते समय एक हल्का सा स्नेह भरा स्पर्श, रातों में बार-बार आकर हाल पूछना, दवा के समय प्यार से समझाना—इन छोटी-छोटी बातों ने मेरी यात्रा को सरल बनाया. उन्होंने मुझे सिर्फ मरीज नहीं, परिवार का हिस्सा समझा.

यह अस्पताल सिर्फ एक इलाज का केंद्र नहीं है, यह विश्वास, उपचार और पुनर्जन्म की भूमि है। यहाँ की दीवारों में संवेदनशीलता है, यहाँ की हवा में हौसला घुला है. यहाँ मशीनें भले आधुनिक हैं, पर उससे भी ज़्यादा आधुनिक है यहाँ का मानवता भरा दिल। हर कर्मचारी, चाहे वह रिसेप्शन पर हो, वार्ड में हो, सफाई सेवा में हो या कैंटीन में—सबकी आँखों में संवेदना और सेवा दिखाई देती है.

कैंसर ने मेरे शरीर को चुनौती दी, लेकिन इस अस्पताल और यहाँ के लोगों ने मेरी आत्मा को मजबूत कर दिया.उपचार के दौरान कई दिन ऐसे आए जब लगा कि शायद मैं टूट जाऊँ, लेकिन तभी मेरे डॉक्टर की कही एक बात याद आती थी— “इलाज हम करेंगे, लड़ाई आप लड़ेंगे, जीत हम साथ मनाएँगे।” और सच में, इस जीत में मैं अकेली नहीं हूँ… यह जीत हम सबकी है.

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो केवल दर्द नहीं, मुझे मिले अपार प्रेम, देखभाल और दुआएँ भी दिखती हैं.मुझे एहसास हुआ कि ठीक होना सिर्फ बीमारी का चले जाना नहीं, बल्कि आशा और जीवन का फिर से लौट आना है और यह मेरे जीवन में लौट पाया, इन्हीं अद्भुत लोगों की वजह से.

धन्यवाद  डाक्टर्स को, जिन्होंने मुझे सिर्फ इलाज नहीं, आत्मविश्वास दिया।उन नर्सों को, जिन्होंने मेरी रातों को सुकून और दिनों को मुस्कान दी. उस पूरे अस्पताल को, जिसने मुझे एक सुरक्षित छाया, एक नई शुरुआत और दूसरा जीवन दिया.आज मैं नया जीवन जी रही हूँ, डर नहीं, उम्मीद संभाल कर, हौसला थाम कर और एक नई शुरुआत लेकर. आशा और  विश्वास मेरे लिए अब केवल शब्द नहीं, मेरी वास्तविकता है.ये शब्द हैं ब्रेस्ट कैंसर की मरीज़ इशरत जहां के.  उनके शब्दों को सुनकर आह्लादित हुए  पैलेटिव  केयर  के सहायक प्रोफेसर डॉक्टर विक्रम प्रताप सिंह ने कहा "कैंसर के मरीजों को उपचार से ज्यादा  अस्पताल से उचित व्यवहार,  प्यार की दरकार होती है.  हमारी मुस्कराहट उनको लड़ने के लिए तैयार करती है.  उनमें विश्वास  बढ़ता है कि डॉक्टर खुश हैं मतलब डरने की बात नहीं है."

क्लिनिकल oncologist डॉक्टर  अफ़साना शाह ने बताया  कि ‘’जो ब्रेस्ट कैंसर पेशेंट है वो मेट्रोपॉलिटन सिटी में सबसे कॉमन कैंसर है और ज्यादातर पेशेंट को स्क्रीनिंग का नॉलेज ना होने की वजह से ज्यादातर पेशेंट एडवांस स्टेज में आते हैं और कुछ मरीज़ mets के साथ आते हैं जिनके बोन में मेटस पहुंच चुके होते हैं और वह काफी पेन में आते हैं। इसमें हमारी पैलेटिव टीम का बहुत अच्छा रोल है जो कि उन उसमें वह दवा देते हैं इंजेक्शन देते हैं और ट्रीटमेंट के साथ ढ़ेर सारा  प्यार  देते है,  हौसला  बढ़ाते हैं. क्लिनिकल साइड से देखें तो हम रेडिएशन एंड कीमो भी स्टार्ट करते हैं और यह सारा ट्रीटमेंट उनको ठीक करने में और उनका पेन कम करने में बहुत कारगर है.’’भाव विभोर होकर मुस्कराती इशरत के साथ आज आसपास खड़ी पूरी टीम खुश नज़र आ  रही थी.

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