ऑटिज्म : समझ और स्वीकार्यता की जरूरत

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 2, 2026 07:38 IST2026-04-02T07:38:54+5:302026-04-02T07:38:59+5:30

शिक्षक उसे बोझ समझते हैं और अभिभावक अपने बच्चों को उससे दूर रखने की कोशिश करते हैं, यह वह क्रूर सच्चाई है जिसे हम सुनना नहीं चाहते लेकिन जिसे बदले बिना कोई जागरूकता दिवस सार्थक नहीं होगा.

Autism need for understanding and acceptance | ऑटिज्म : समझ और स्वीकार्यता की जरूरत

ऑटिज्म : समझ और स्वीकार्यता की जरूरत

देवेंद्रराज सुथार

हर साल दो अप्रैल को विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2007 में इस दिवस की घोषणा की थी. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनियाभर में प्रति 100 बच्चों में से एक बच्चा ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित है. भारत की बात करें तो  इन्क्लेन ट्रस्ट के एक बड़े अध्ययन के अनुसार 10 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक 100 बच्चों में से एक बच्चा ऑटिज्म से पीड़ित हो सकता है और अनुमान है कि देश में लगभग 1.8 करोड़ लोग इस स्थिति से प्रभावित हैं.

इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि 2011 की भारत की जनगणना में केवल 1.3 प्रतिशत न्यूरोविकासात्मक स्थितियां दर्ज की गई थीं, जिसे शोधकर्ताओं ने वास्तविकता से कम आकलन बताया था - असली संख्या उससे लगभग दस गुना अधिक निकली. लड़कों में यह स्थिति लड़कियों की तुलना में तीन गुना अधिक पाई जाती है. और 2 से 9 वर्ष की आयु के प्रत्येक 65 भारतीय बच्चों में से एक बच्चा ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित है.

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर दरअसल एक न्यूरोलॉजिकल विविधता है जिसमें व्यक्ति की सामाजिक समझ, संवाद की क्षमता और व्यवहार के तरीके थोड़े अलग होते हैं, लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं कि ये बच्चे प्रतिभाहीन हैं या इनकी जिंदगी किसी काम की नहीं है, बल्कि इतिहास गवाह है कि अल्बर्ट आइंस्टीन, न्यूटन और एलन ट्यूरिंग जैसी महान विभूतियों में ऑटिज्म के लक्षण पाए गए थे और उन्होंने दुनिया को वह दिया जो आम इंसान नहीं दे सका, इसलिए ऑटिज्म को कमजोरी समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए.

समस्या यह नहीं है कि ये बच्चे अलग हैं, समस्या यह है कि हमारा समाज अलग होने को स्वीकार नहीं कर पाता, हमारे स्कूलों में इन बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा की बात तो होती है लेकिन जब कोई ऑटिस्टिक बच्चा कक्षा में बैठता है तो उसके सहपाठी उसका मजाक उड़ाते हैं, शिक्षक उसे बोझ समझते हैं और अभिभावक अपने बच्चों को उससे दूर रखने की कोशिश करते हैं, यह वह क्रूर सच्चाई है जिसे हम सुनना नहीं चाहते लेकिन जिसे बदले बिना कोई जागरूकता दिवस सार्थक नहीं होगा.

शोध यह भी बताता है कि 18 से 24 माह की आयु में ही ऑटिज्म के शुरुआती लक्षण पहचाने जा सकते हैं और समय पर निदान व संरचित हस्तक्षेप से बच्चे की संवाद क्षमता, सामाजिक व्यवहार और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार लाया जा सकता है. भारत में इसके लिए एम-चैट, टीएबीसी और आईएसएए जैसे परीक्षण उपकरण उपलब्ध हैं, लेकिन जरूरत है कि इन्हें गांव-गांव तक पहुंचाया जाए और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के डॉक्टरों को इसके बारे में प्रशिक्षित किया जाए.

Web Title: Autism need for understanding and acceptance

स्वास्थ्य से जुड़ीहिंदी खबरोंऔर देश दुनिया खबरोंके लिए यहाँ क्लिक करे.यूट्यूब चैनल यहाँ इब करें और देखें हमारा एक्सक्लूसिव वीडियो कंटेंट. सोशल से जुड़ने के लिए हमारा Facebook Pageलाइक करे