डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी की घटनाएं क्यों नहीं थम रहीं?
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 6, 2026 06:37 IST2026-03-06T06:37:08+5:302026-03-06T06:37:08+5:30
चोरी, बलात्कार, हत्या, वित्तीय घोटाले, भूमि हड़पना और सड़क दुर्घटनाएं ही मानो काफी नहीं थीं कि डिजिटल अपराध कानून प्रवर्तन एजेंसियों और आम नागरिकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं.

सांकेतिक फोटो
अभिलाष खांडेकर
जैसे-जैसे नई प्रौद्योगिकियां मानव जीवन के सभी संभावित क्षेत्रों को तेजी से घेर रही हैं, यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि यह मानवता के लिए एक सच्चा वरदान है या शिक्षित और कम शिक्षित लोगों के लिए एक छिपा हुआ अभिशाप है. वर्चुअल गिरफ्तारी जैसे डिजिटल अपराधों के भयावह मामले विकासशील भारतीय समाज में अपराधों की बढ़ती सूची में एक और अध्याय जोड़ रहे हैं. चोरी, बलात्कार, हत्या, वित्तीय घोटाले, भूमि हड़पना और सड़क दुर्घटनाएं ही मानो काफी नहीं थीं कि डिजिटल अपराध कानून प्रवर्तन एजेंसियों और आम नागरिकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं.
मध्यप्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी इंदौर से एक ताजा डिजिटल अरेस्ट ठगी की घटना सामने आई है. पुणे के आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) के अधिकारी होने का दावा करने वाले धोखेबाजों ने एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी को डिजिटल रूप से गिरफ्तार करने का झांसा दिया और उनकी लगभग पूरे जीवनभर की बचत, यानी डेढ़ करोड़ रुपए लूट लिए.
यह कोई अकेला मामला नहीं है, न ही अपनी तरह का पहला और न ही आखिरी. जनवरी में दिल्ली में एक 77 वर्षीय अप्रवासी महिला के साथ 14 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की खबर आई थी. धोखेबाजों ने खुद को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण का अधिकारी बताया था.
इससे पहले गुरुग्राम में एक अन्य महिला को कई दिनों तक डिजिटल रूप से गिरफ्तार होने के भ्रम में रखा गया और धोखेबाजों ने उससे लगभग छह करोड़ रुपए लूट लिए. इस तरह के अपराधों का शिकार हुए लोगों के लिए खोई हुई रकम की वसूली और मानसिक आघात से उबरना दोनों ही बहुत बड़ी चुनौतियां हैं.
बड़े उद्योगपति ओसवाल से सात करोड़ रु. की ठगी का मामला इतना चर्चित है कि दोहराने की जरूरत नहीं है. भारत में डिजिटल गिरफ्तारी के घोटाले अपेक्षाकृत नए हैं. ये दिखाते हैं कि कैसे एक निर्दोष आम भारतीय पुलिस, न्यायपालिका, आरबीआई, अन्य बैंकों, सीबीआई, पुलिस की नारकोटिक्स शाखा, एटीएस या आयकर विभाग आदि जैसी संस्थाओं के नाम से डरा हुआ है.
ये वही नियामक विभाग हैं जिनके पास अपराधियों को दंडित करने की शक्तियां हैं, और इन्हीं शक्तियों के नाम का दुरुपयोग आम नागरिकों को धमकाने के लिए किया जा रहा है, जबकि उन्होंने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया है. दुर्भाग्य से, इन मामलों में डर का माहौल काम करता है. आदर्श रूप से, सरकारी संस्थाएं जनता की मित्र होती हैं;
अपराधियों से पुलिस सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन यहां इन्हीं संस्थाओं के नाम का इस्तेमाल घोटालेबाजों द्वारा करते देखा जा रहा है. यही त्रासदी है! हालांकि सजा के डर से बेखौफ गुंडे निर्दोष परिवारों को परेशान करने के लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन डिजिटल गिरफ्तारी जैसे अनियंत्रित घोटालों की बढ़ती संख्या भी उपर्युक्त संस्थानों की छवि को खराब करती है.
एक निर्दोष व्यक्ति को सीबीआई या आरबीआई से डरने की क्या जरूरत है? जिन लोगों ने कोई अपराध नहीं किया है, उन्हें तो इन सरकारी संस्थानों पर भरोसा करना चाहिए. लोगों को यह वहम कैसे हो गया कि ये सरकारी संस्थाएं जबरन वसूली करने वालों की तरह व्यवहार करेंगी? क्या हमारी पुलिस या आयकर अधिकारियों ने वर्षों से यही छवि बनाई है?
मुझे लगता है कि हर व्यवस्था में मौजूद कुछ भ्रष्ट लोगों के कारण इन संस्थाओं में विश्वास का संकट पैदा हो गया है जिसका दुरुपयोग हो रहा है. डिजिटल धोखाधड़ी की बढ़ती घटनाओं के कारण, जो गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियों के कारण ठगे गए लोगों के मन पर गहरा आघात पहुंचाती हैं, सरकार ने डिजिटल धोखाधड़ी से निपटने के प्रयासों को तेज कर दिया है.
राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल का दावा है कि वह जालसाजों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करता है, वहीं केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन नवस्थापित भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र विभिन्न एजेंसियों को साइबर अपराध रोकथाम संसाधन उपलब्ध करा रहा है. क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं?
हम टीवी व रेडियो पर जनजागरूकता अभियान भी बढ़ते हुए देख रहे हैं, जिसमें सरकार साइबर अपराधों से लोगों को बचाने के तरीके बताने वाले संदेशों को प्रसारित करने के लिए मशहूर हस्तियों का उपयोग कर रही है, लेकिन साइबर अपराधों में कमी के कोई संकेत नहीं हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए, लोग नए भारत के नए अपराधियों से सुरक्षा कवच के रूप में सरकार से उम्मीद लगाए बैठे हैं. क्या सरकार उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेगी?