शिक्षा संस्थाओं में भी अंधविश्वास का घेरा!
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: April 6, 2026 05:26 IST2026-04-06T05:26:29+5:302026-04-06T05:26:29+5:30
महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, झारखंड और असम जैसे कई राज्यों ने अपने स्तर पर अंधविश्वास के खिलाफ कड़े कानून बनाए हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य अमानवीय प्रथाओं, नरबलि और ठगी रोकना है.

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ग्रामीण भागों और छोटे कस्बों के गली-कूचों में अंधविश्वास के मामले सामने आना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं होती है, लेकिन यदि वे शिक्षा के केंद्रों में दिखाई देने लगें तो वह चिंताजनक स्थिति कही जा सकती है. हाल के दिनों में महाराष्ट्र के नासिक में एक ढोंगी बाबा के कारनामे सामने आने के बाद पुलिस प्रशासन कार्रवाई में जुटा है.
परंतु उत्तराखंड के एक स्कूल में भूत का मंदिर स्थापित किया जाना आधुनिक समाज में परेशान करने वाली घटना है. बताया गया कि स्कूल परिसर में 15 वर्ष पहले एक महिला की फिसलकर मौत हो गई थी, जिसके बाद अंधविश्वास फैलाया गया कि महिला की आत्मा वहां घूम रही है और वह डराती है. उसी के चलते कई बार छात्राएं भी बेहोश हो जाती हैं.
इस बीच स्वास्थ्य विभाग की टीम ने छात्राओं को समझाया भी और नतीजा नहीं निकलता देख भूत के मंदिर की स्थापना का निर्णय ले लिया गया. दरअसल देश में अंधविश्वास, काला जादू और डायन प्रथा को रोकने के लिए कोई विशेष केंद्रीय कानून नहीं है, इसीलिए मनमर्जी के तरह-तरह के कामों को समाज में स्थान मिल जाता है.
महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, झारखंड और असम जैसे कई राज्यों ने अपने स्तर पर अंधविश्वास के खिलाफ कड़े कानून बनाए हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य अमानवीय प्रथाओं, नरबलि और ठगी रोकना है. फिर भी इन राज्यों में लगातार ढोंगी बाबाओं और कुप्रथाओं से जुड़े कारनामे सामने आते रहते हैं.
वास्तविकता में अंधविश्वास और काला जादू धर्म, समाज और संस्कृति के नाम पर चलाए जाते हैं. दुर्भाग्यवश अशिक्षा से अंधविश्वास के प्रसार को अधिक बल मिलता है. किसी भी मामले में एक अनपढ़ व्यक्ति को झोंकना आसान होता है, क्योंकि वह अज्ञानता के चलते कोई तार्किक आकलन नहीं करता है. भारत में अभी-भी साक्षरता कुछ सरकारी आंकड़ों के अनुसार 77.70 प्रतिशत तक पहुंच पाई है,
जो विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है. इसी के चलते पाखंडियों के लिए लोगों को मूर्ख बनाने का रास्ता खुला रहता है. राज्यों में उनको राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर तक का संरक्षण प्राप्त होता है. यह देश में अंधविश्वास के खिलाफ कानून बनाने वाले छह राज्यों में भी दिखता है. नासिक से लेकर उत्तराखंड के मामलों को देखते हुए आवश्यक समस्या की जड़ पर प्रहार करना है.
यदि कोई व्यक्ति निजी कारणों से मानसिक रूप से कमजोर होता है तो उसे किसी झाड़-फूंक या फिर टोना-टोटके की जरूरत की बजाय चिकित्सा की सलाह दी जानी चाहिए. आत्मविश्वास में कमी को दूर करने के वैज्ञानिक प्रयासों को अधिक महत्व मिलना चाहिए.
यदि वे नहीं किए जा रहे और वैकल्पिक स्तर पर किसी कुरीति का सहारा लिया जा रहा है तो उसे पुरजोर ढंग से उजागर कर समाज में जागरूकता लानी चाहिए. समाज में वैज्ञानिक शिक्षा, तार्किक समझ और विपरीत परिस्थितियों में सतर्कता को विकसित कर ही अंधविश्वास की दुनिया को सच्चाई का आईना दिखाया जा सकता है और भूत-प्रेतों को मनोरंजन के लिए केवल कहानियों तक सीमित रखा जा सकता है.