बड़ी बुराई के आगे छोटी भी अच्छी लगने लगती है!

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 18, 2026 05:42 IST2026-03-18T05:42:44+5:302026-03-18T05:42:44+5:30

हैकरों ने उक्त परिचित के फोन को ऐसा ही वेडिंग कार्ड भेजकर हैक कर लिया था और उनकी कांटैक्ट लिस्ट में दर्ज सारे नंबरों पर वह वेडिंग कार्ड रूपी मालवेयर भेज दिया था.

Even small evils seem good front big evils blog Hemdhar Sharma | बड़ी बुराई के आगे छोटी भी अच्छी लगने लगती है!

सांकेतिक फोटो

Highlightsआप कोशिश तो करो. अब शर्माजी हैरान!छाछ भी फूंक-फूंक कर पीते थे.घूरते हुए कुछ पल देखा और फिर चला गया.

हेमधर शर्मा

शर्माजी एक आम आदमी हैं. पिछले दिनों उनके स्मार्टफोन में व्हाट्‌सएप्प पर वेडिंग कार्ड का एक लिंक आया. चूंकि मैसेज किसी परिचित का था, इसलिए यह जानने की जिज्ञासा में उन्होंने लिंक पर क्लिक किया कि किसकी शादी  है. लेकिन क्लिक करते ही मोबाइल हैक हो गया. दूसरे फोन से उन्होंने तत्काल अपने परिचित से पूछताछ की तो पता चला कि उन्होंने तो ऐसा कोई लिंक भेजा ही नहीं! दरअसल हैकरों ने उक्त परिचित के फोन को ऐसा ही वेडिंग कार्ड भेजकर हैक कर लिया था और उनकी कांटैक्ट लिस्ट में दर्ज सारे नंबरों पर वह वेडिंग कार्ड रूपी मालवेयर भेज दिया था.

आनन-फानन में शर्माजी ने अपने स्मार्टफोन को फैक्टरी रिसेट किया और धोखाधड़ी का शिकार होने से बचे. दूसरी घटना में एक बार किसी ने उनको फोन करके बड़े प्यार से पूछा कि कैसे हो भाई साहब! मुझे पहचाना? उन्होंने जब इंकार किया तो वह कहने लगा कि क्या भाई, मुझे नहीं पहचान रहे! आप कोशिश तो करो. अब शर्माजी हैरान!

अटकलें लगाते हुए उन्होंने एक परिचित का नाम लिया तो उस बंदे ने तपाक से कहा कि अरे हां वही तो हूं मैं! दरअसल मेरा यूपीआई काम नहीं कर रहा है, इसलिए अभी आपको कोई साढ़े अठारह हजार रुपए भेजेगा तो आप ऐसा करो कि एक यूपीआई नंबर नोट कर लो और उस पर तत्काल वह पैसा भेज दो. बात करते-करते ही शर्माजी के खाते में साढ़े अठारह हजार रु. जमा होने का मैसेज आया.

परेशान शर्माजी उसे पैसे भेज ही रहे थे कि अचानक उनके दिमाग में कौंधा कि वह परिचित तो उन्हें ‘सर’ कहकर संबोधित करता है, आज ‘भाई’ क्यों बोल रहा था! शक होते ही उन्होंने मोबाइल में सेव नंबर से उसे फोन लगाया तो पता चला कि उसने तो फोन किया ही नहीं था! फिर बैलेंस चेक किया तो अकाउंट में कोई पैसा आया ही नहीं था.

यानी मैसेज फर्जी था! करीब दो दशक पहले जब शर्माजी आखिरी बस पकड़ने की हड़बड़ी में रात दस बजे आफिस से बस स्टैंड की ओर जा रहे थे, तभी रास्ते में पीछे से एक व्यक्ति ने अपनेपन के साथ आवाज लगाई. शर्माजी रुके तो उसने पूछा, ‘पहचाना मुझे?’ शर्माजी ने जब इंकार किया तो उसने कहा, ‘क्या यार! मुझे नहीं पहचान रहे हो?

अच्छा बताओ आप कहां रहते हो?’ शर्माजी ने जब अपने मुहल्ले का नाम लिया तो उसने तपाक से कहा, ‘वहीं चौक पर ही तो फलां नाम से मेरी पान की दुकान है! आप ऐसा करो, अभी सौ रुपए मुझे दे दो, क्योंकि मेरा भाई यहां बाजू के अस्पताल में भर्ती है, कल सुबह दुकान पर आ जाना, मैं वापस कर दूंगा.’ शर्माजी चूंकि पहले दो बार दूध से जल चुके थे, इसलिए अब छाछ भी फूंक-फूंक कर पीते थे.

पैसे का नाम सुनते ही वे तत्काल वहां से खिसक लिए. सुबह चौक पर जाकर देखा तो उनका शक सही निकला, उस नाम की कोई दुकान नहीं थी. कुछ महीने बाद फिर वही ठग रात के उसी समय उनसे टकरा गया और जब पूछा कि ‘पहचाना?’ तो शर्माजी ने कहा कि ‘हां, बहुत अच्छे से पहचान गया.’ अनपेक्षित जवाब सुन उसने घूरते हुए कुछ पल देखा और फिर चला गया.

दूध से जलने की कहानी ऐसी है कि बचपन में एक बार उनके घर में एक अनाथ लड़का अनाथाश्रम के लिए चंदा मांगने आया. सुदूर बनारस के पते की पर्ची काटने के बाद वह पानी पीने के बहाने भीतर आया और घर तथा घरवालों का मुआयना करने के बाद फुसफुसाते हुए बताया कि एक बार एक स्थान पर चूल्हे की मिट्टी के लिए खुदाई करने के दौरान उसे सोने का नौलखा हार मिला है.

अब समझ में नहीं आ रहा कि उसका क्या करे! घर का दरवाजा बंद करवाकर उसने वह हार दिखाया भी, जो किलो भर से कम का नहीं लग रहा था. उसमें से एक मनका तोड़कर देते हुए उसने कहा कि पहले आप चेक करवा लो, लेकिन प्लीज, किसी को बताना मत. सुनार को दिखाने पर चूंकि वह असली निकला,

इसलिए वह अगले दिन हार देकर और बदले में घर में जोड़-बटोरकर रखे गए दस हजार रु. लेकर चला गया. जाते-जाते घर के सभी सदस्यों को पचास-पचास रु. देकर उनका आशीर्वाद भी लिया. लेकिन उस शाम माता-पिता के सुनार की दुकान से लौटते ही शर्माजी के घर में मातम छा गया था, क्योंकि पूरा का पूरा नौलखा हार पीतल का निकला था.

इसी तरह एक बार शर्माजी के पिताजी आफिस से मिला लांग बूट घर में रख जब पुन: ड्‌यूटी जाने के लिए निकले तो पीछे से एक व्यक्ति घर पर आकर कहने लगा कि सर नीचे खड़े हैं, लांग बूट का साइज छोटा होने से वापस मंगा रहे हैं. दूसरा लेंगे. रात में ड्यूटी से लौटने पर लांग बूट नदारत देख पिताजी ने पूछताछ की, तब पता चला कि शर्माजी ठगे गए हैं.

बचपन से ही ठगों से पड़े पाले के बाद शर्माजी अब थोड़े चतुर-चालाक बन गए हैं, लेकिन पहले केवल अपने बुद्धि-बल से ठगने वाले अब एआई में पारंगत होकर साइबर ठग बन गए हैं. पहले वे सिर्फ शर्माजी को ठगने की कोशिश करते थे, अब उनका मोबाइल हैक कर उनके परिचितों को भी निशाना बनाते हैं.

बचपन में शर्माजी बड़े-बुजुर्गों के मुंह से सुनते थे कि आज के भ्रष्टाचारियों के मुकाबले पहले के अंग्रेज शासक ही अच्छे थे, कानून बनाकर जितना भी लूटते हों. कम से कम भ्रष्टाचार तो नहीं करते थे! अब शर्माजी को भी लग रहा है कि शायद पुराने ठग ही अच्छे थे, जो शर्माजी को भले ठग लें लेकिन उनके नाम पर दूसरों को तो नहीं ठगते थे! 

Web Title: Even small evils seem good front big evils blog Hemdhar Sharma

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