टीम इंडिया की यह विजय बेमिसाल है
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 9, 2026 21:05 IST2026-03-09T21:04:10+5:302026-03-09T21:05:02+5:30
दुनिया में खेलों का सरताज फुटबॉल है लेकिन इटली (1934-1938) और ब्राजील (1958-1962) ही ऐसी टीमें हैं जो फीफा विश्व कप के एक सदी के इतिहास में लगातार दो बार विजेता बन सकीं.

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विश्व कप लगातार दूसरी बार जीतना किसी भी खेल में एक असामान्य उपलब्धि मानी जाती है. भारतीय क्रिकेट टीम ने रविवार की रात अहमदाबाद में न्यूजीलैंड को परास्त कर टी-20 विश्व कप जीत कर यह उपलब्धि अपने नाम कर ली. 2024 में रोहित शर्मा के नेतृत्व में भारत ने यह खिताब जीता था, जिसकी रक्षा करने में सूर्य कुमार यादव की टीम सफल रही.
दुनिया में खेलों का सरताज फुटबॉल है लेकिन इटली (1934-1938) और ब्राजील (1958-1962) ही ऐसी टीमें हैं जो फीफा विश्व कप के एक सदी के इतिहास में लगातार दो बार विजेता बन सकीं. यह तथ्य दर्शाता है कि खिताब बचाने के लिए जज्बा और प्रदर्शन कितना महत्वपूर्ण हो जाता है. क्योंकि एक विश्व कप से दूसरे विश्व कप के दरम्यान कई चीजें बदल जाती हैं.
टीम के अनुभवी खिलाड़ी रिटायर हो जाते हैं, या फिर बढ़ती उम्र से उनके प्रदर्शन में गिरावट आ जाती है, नई प्रतिभाओं के पास अनुभव की कमी होती है और अन्य टीमें भी इस दौरान उभरती जाती हैं. लिहाजा खिताब बचाना निश्चित रूप से कठिन होता है. क्रिकेट के एकदिवसीय प्रारूप में ऑस्ट्रेलिया ने हालांकि लगातार तीन बार खिताब जीता है.
खैर, भारत मेजबान होने के अलावा टी-20 विश्व कप खिताब का प्रबल दावेदार भी था और उसकी इस दावेदारी को पुख्ता कर दिया विकेटकीपर और सलामी बल्लेबाज संजू सैमसन के फॉर्म ने. केरल के इस प्रतिभाशाली खिलाड़ी के प्रदर्शन में निरंतरता का अभाव उन्हें बेंच पर ही बैठे रहने के लिए बाध्य करता रहा.
विश्व कप के प्लेयर ऑफ द सीरीज चुने गए इस खिलाड़ी को नियमित सलामी बल्लेबाज अभिषेक शर्मा की कुछ व्यक्तिगत समस्याओं तथा खराब फॉर्म के कारण मौका मिला और उसने इसे स्वप्निल प्रदर्शन में परिवर्तित कर दिया. विश्व चैंपियन बनने जैसी सफलता का श्रेय टीम के हर खिलाड़ी को है.
कप्तान सूर्यकुमार यादव अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं खेले लेकिन उनकी रणनीतिक कुशलता का कोई सानी नहीं है. ईशान किशन, तिलक वर्मा, शिवम दुबे, हार्दिक पंड्या, अर्शदीप सिंह ने प्रशंसकों को निराश नहीं होने दिया. गेंदबाजी में तो जसप्रीत बुमराह अतुलनीय हैं. दाएं हाथ के इस तेज गेंदबाज ने विविधतापूर्ण गेंदें कीं.
टूर्नामेंट में आठ पारियों में 14 विकेट लेकर बुमराह सर्वाधिक विकेट लेनेवाले गेंदबाजों की सूची में अव्वल रहे. 2024 में भारत को खिताब दिलाने में भी उनकी भूमिका अहम थी और उस विश्व कप में कुल 15 विकेट लेकर वे प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट चुने गए थे. बुमराह इस समय भारत के गेंदबाजी आक्रमण की धुरी हैं.
बहरहाल, इस शानदार जीत के बावजूद क्षेत्ररक्षण एक पक्ष है जिसमें भारत की कमजोरी सामने आई. अलबत्ता अक्षर पटेल ने सेमीफाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ दो लाजवाब कैच लिए, फाइनल में भी ईशान किशन ने कुछ अच्छे कैच लपके लेकिन पूरे टूर्नामेंट में भारतीय क्षेत्ररक्षकों ने कुल 16 कैच छोड़े. यह आंकड़ा शर्मनाक तो है ही, विचारणीय भी है.
क्षेत्ररक्षण में सुधार जरूरी है. भारत की इस अनुपम कामयाबी का श्रेय आईपीएल को है जिसने इस प्रारूप के माकूल दर्जनों शानदार प्रतिभाओं का सृजन किया है, जिनके साथ भारत टी-20 प्रारूप में राष्ट्रीय स्तर की तीन टीमें एक साथ उतार सकता है. लेकिन इस बीच भारत में क्रिकेट प्रबंधकों को खेल के सबसे बड़े पारंपारिक प्रारुप टेस्ट को नहीं भूलना चाहिए.
टेस्ट प्रारूप में भारत के प्रदर्शन में पिछले कुछ वर्षों में गजब का क्षरण देखा गया है. लगातार दो साल भारत को उसी की सरजमीं पर क्लीन स्वीप की लानत उठानी पड़ी है और इसका कारण है टी-20 की अति, जो टेस्ट के लिहाज से खिलाड़ियों के लिए तकनीकी रूप से खतरा है. उम्मीद है कि टी-20 की चकाचौंध में टेस्ट में भी भारतीय टीम को पुष्ट बनाने पर काम होगा.