यमुना पावन तटः ताज की छाया में संस्कृति का विराट उत्सव
By योगेश कुमार गोयल | Updated: February 24, 2026 05:45 IST2026-02-24T05:45:54+5:302026-02-24T05:45:54+5:30
उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर आगरा में 18 से 27 फरवरी तक आयोजित हो रहा यह दस दिवसीय सांस्कृतिक पर्व केवल एक साधारण मेले का विस्तार नहीं है बल्कि यह भारत की बहुरंगी परंपराओं, लोक-स्मृतियों, लुप्तप्राय शिल्प-कौशल और उस विराट पाक-वैभव का उत्सव है.

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यमुना के पावन तट पर स्थित धवल संगमरमर की वह अलौकिक कृति, जिसे दुनिया ताजमहल के नाम से जानती है, केवल ईंट-पत्थरों और नक्काशी का मेल नहीं है बल्कि भारतीय संवेदनाओं, स्थापत्य-कौशल और सौंदर्य-चेतना का एक शाश्वत महाकाव्य है. जब इस विश्वप्रसिद्ध स्मारक की शीतल और भव्य छाया में रंगों की चटक आभा, रागों की मधुर लहरियां और रसों की सजीव अनुभूति एक साथ साकार होती है, तब वह दृश्य ‘ताज महोत्सव’ के रूप में भारतीय संस्कृति का एक अनुपम और दैदीप्यमान उत्सव बन जाता है.
उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर आगरा में 18 से 27 फरवरी तक आयोजित हो रहा यह दस दिवसीय सांस्कृतिक पर्व केवल एक साधारण मेले का विस्तार नहीं है बल्कि यह भारत की बहुरंगी परंपराओं, लोक-स्मृतियों, लुप्तप्राय शिल्प-कौशल और उस विराट पाक-वैभव का उत्सव है, जहां राष्ट्र की विविध आत्माएं एक ही वैश्विक मंच पर एक साथ स्पंदित होती हैं.
इस वर्ष अपने 34वें गौरवशाली संस्करण में प्रवेश कर रहे इस महोत्सव की थीम ‘वंदे मातरम: परंपरा एवं राष्ट्र गौरव’ हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय चेतना का एक सशक्त उद्घोष है, जो आगंतुकों के भीतर स्वदेश प्रेम और अपनी जड़ों के प्रति सम्मान की भावना को प्रगाढ़ करता है.
सन् 1992 के वसंत में जब इस महोत्सव का बीजारोपण हुआ था, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह आयोजन आने वाले समय में भारत के सबसे प्रतिष्ठित और प्रतीक्षित सांस्कृतिक आयोजनों में शुमार हो जाएगा. इसका मूल दर्शन भारतीय हस्तशिल्प, लुप्त होती लोक कलाओं और सदियों पुराने पारंपरिक कौशलों को एक ऐसा मंच प्रदान करना रहा है,
जहां वे अपनी आधुनिक प्रासंगिकता सिद्ध कर सकें. ताजमहल की जादुई पृष्ठभूमि में सजे सैकड़ों स्टाल, चटख और पारंपरिक परिधानों में सुसज्जित लोक कलाकार, शास्त्रीय संगीत की गंभीर तान और लोकनृत्यों की लयात्मक थिरकन मिलकर एक ऐसा जादुई वातावरण रचते हैं, मानों पूरा लघु भारत एक ही परिसर में सिमट आया हो.
ताज महोत्सव की सबसे बड़ी पूंजी इसकी वह विविधता ही है, जो उत्तर के हिमालयी अंचल से लेकर दक्षिण के कन्याकुमारी तक और सुदूर पूर्वोत्तर की पहाड़ियों से लेकर पश्चिम के रेगिस्तानों तक की कला को एकसूत्र में पिरोती है. यहां कश्मीर की पश्मीना शॉल की मखमली कोमलता और वाराणसी की रेशमी साड़ियों की राजसी चमक एक साथ देखी जा सकती है.
लखनऊ की बारीक चिकनकारी की नजाकत हो या सहारनपुर की लकड़ी पर की गई सूक्ष्म नक्काशी, मुरादाबाद के पीतल शिल्प की सुनहरी दमक हो या खुर्जा की सिरेमिक कला की चटक रंगीन छटा, ये सभी तत्व मिलकर भारत की हस्तकला परंपरा का एक ऐसा जीवंत संग्रहालय रच देते हैं, जिसे देख दुनिया दांतों तले उंगली दबा लेती है.