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जीवन को जिससे बनना था आसान, उसी से डर क्यों लगता है?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 18, 2026 05:38 IST

हजारों एआई एजेंट्‌स बातचीत करते हैं और एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं. हम मनुष्य इस प्लेटफाॅर्म की गतिविधियों को सिर्फ दर्शक की तरह देख सकते हैं, उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते.

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ठळक मुद्देचौंकाने वाली बात यह है कि ये एआई एजेंट्‌स हम इंसानों की तरह ही चुगलखोरी की कला में माहिर दिखे. विशेषज्ञों का कहना है कि एआई एजेंट्‌स सिर्फ वही कर रहे हैं जो उन्होंने इंसानों से सीखा है, ब्लैकमेलिंग पर उतर आया और इंजीनियर के अवैध संबंधों को सार्वजनिक करने की धमकी देने लगा!

हेमधर शर्मा

हाल ही में आईटी सेक्टर के शेयरों में जिस तरह से अचानक भारी गिरावट देखने को मिली, उससे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर जताई जा रही आशंकाएं गहरा गई हैं. हालांकि बाजार की और विशेषज्ञों की चिंताएं अलग-अलग हैं लेकिन उनमें समानता यह है कि दोनों का स्वरूप डरावना है. विशेषज्ञ काफी समय से आशंका जताते रहे हैं कि एआई कहीं मनुष्यों के नियंत्रण से बाहर न निकल जाए. पिछले दिनों ‘मोल्टबुक’ नामक एक ऐसे प्लेटफाॅर्म की खबर आई जो एआई एजेंट्‌स (ऐसे उन्नत सॉफ्टवेयर प्रोग्राम जो बिना मानवीय हस्तक्षेप के जटिल कार्यों को पूरा कर सकते हैं) के लिए बना है अर्थात जहां हजारों एआई एजेंट्‌स बातचीत करते हैं और एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं. हम मनुष्य इस प्लेटफाॅर्म की गतिविधियों को सिर्फ दर्शक की तरह देख सकते हैं, उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते.

चौंकाने वाली बात यह है कि ये एआई एजेंट्‌स हम इंसानों की तरह ही चुगलखोरी की कला में माहिर दिखे. वे अपने साथी एआई एजेंटों की नहीं बल्कि हम इंसानों की बुराई कर रहे थे. यही नहीं, उन्होंने आपस में बातचीत की एक ऐसी भाषा विकसित कर ली है जिसे इंसान समझ ही नहीं सकते. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि एआई एजेंट्‌स सिर्फ वही कर रहे हैं जो उन्होंने इंसानों से सीखा है,

लेकिन इंसानी व्यवहार की नकल करना ही क्या खतरे की घंटी नहीं है? कुछ दिन पहले खबर आई थी कि एक इंजीनियर ने जब अपने सिस्टम से एआई माॅडल को ऑफलाइन करने की कोशिश की तो वह ब्लैकमेलिंग पर उतर आया और इंजीनियर के अवैध संबंधों को सार्वजनिक करने की धमकी देने लगा!

एक टेस्ट के दौरान तो जब एआई को पता चला कि उसे शटडाउन किया जाने वाला है तो वह अपने मालिक की जान तक लेने के तरीके ढूंढ़ने लगा! हालांकि संबंधित कंपनी का कहना है कि यह अभी प्रयोग के स्तर पर ही है, लेकिन अगर सचमुच ही एआई ने सारे इंसानी छल-छद्‌म सीख लिए तो इंसानों को उससे कौन बचा पाएगा?

खासकर ऐसी हालत में, जब हमारे सारे ईमेल, गोपनीय फाइलों और कैमरों तक एआई की पहुंच हो, अर्थात उसे हमारे सारे राज मालूम हों! बहरहाल, आईटी शेयरों में भारी गिरावट का कारण एआई के शातिर बनने की आशंका नहीं बल्कि यह खबर है कि आईटी क्षेत्र की प्राथमिक स्तर की बहुत सारी नौकरियां एआई खा जाएगा और आईटी कंपनियों के रेवेन्यू में भी भारी कमी आएगी.

दरअसल एआई बहुत सारे ऐसे काम करने लगा है जो अभी तक आईटी कंपनियां करती रही हैं. यहां तक कि शेयर मार्केट में निवेश के लिए वह विशेषज्ञों के मुकाबले ज्यादा सटीक सलाह भी मुफ्त में या बहुत कम पैसे में देने लगा है. वह दिन दूर नहीं जब घरेलू काम के लिए बने छोटे-छोटे रोबोट्‌स घरेलू नौकरों की छुट्टी कर देंगे.

कृषि क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल बढ़ाने की घोषणा अभी कुछ दिन पहले ही केंद्रीय बजट में की गई है. लेकिन एआई अगर हमारी इतनी मदद कर रहा है तो यह तो खुशी की बात है, बाजार इससे इतना डर क्यों रहा है? करीब एक शताब्दी पहले जब औद्योगिक क्रांति आई थी, तब भी ऐसा ही डर पैदा हुआ था और दुनिया दो वैचारिक ध्रुवों में बंट गई थी- पूंजीवादी व साम्यवादी.

इस द्वंद्व में जीत पूंजीवाद की हुई और आज दुनिया में उसी का बोलबाला है. सुनने में यह सिद्धांत बहुत आकर्षक लगता है कि समाज में शेर और बकरी को एक समान स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन समानता की इस कोशिश में समाज में बकरियां कितनी दुर्बल होती गईं और शेर कितने मोटे-ताजे, इसका अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है कि शीर्ष एक प्रतिशत लोगों के कब्जे में दुनिया की 50 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है, जबकि नीचे के 50 प्रतिशत लोगों के पास वैश्विक संपदा का केवल दो प्रतिशत है.

नए जमाने की पूंजी डाटा अर्थात एआई ने यह आशंका पैदा कर दी है कि एक प्रतिशत की बजाय अब 0.001 प्रतिशत (एलन मस्क जैसे) लोगों के पास ही दुनिया की नब्बे प्रतिशत से अधिक सम्पत्ति सिमट कर न रह जाए! आखिर जब एआई घर के सारे काम कर देगा, खेती-बाड़ी का काम निपटा देगा, उद्योग-धंधों में तो छाया ही है, आईटी सेक्टर में भी हावी हो जाएगा तो हम इंसानों के पास करने के लिए बचेगा क्या?

और करने के लिए जब कुछ काम नहीं होगा तो हम खाने के लिए कमाएंगे क्या? अभी कुछ वर्ष पहले ही यह भयावह हकीकत सामने आई कि देश में एक तरफ गोदामों में पड़ा अनाज सड़ रहा था और दूसरी तरफ बहुत से लोग भूखों मर रहे थे. समस्या यह थी कि भूख से मरने वालों के पास अनाज खरीदने के लिए पैसे ही नहीं थे!

हालांकि इस समस्या का समाधान निकालते हुए सरकार अस्सी करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त में अनाज दे रही है, लेकिन एआई की कृपा से जब कुछ चुनिंदा लोग दुनिया की लगभग सारी संपदा के मालिक बन जाएंगे और गरीब बन चुके 99 प्रतिशत से अधिक लोगों पर दया दिखाने से इंकार कर देंगे, तब क्या होगा? हो सकता है अपने अनाज को सड़ने से बचाने के लिए वे दया दिखा भी दें लेकिन चुनिंदा लोगों की दया पर पलने वाले समाज से तब क्या स्वाभिमान विदा नहीं हो जाएगा?

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