ईरान युद्ध रोकने में किसी की दिलचस्पी नहीं?, रोज युद्ध में 1.8 अरब डॉलर खर्च?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 19, 2026 03:24 IST2026-03-19T03:24:10+5:302026-03-19T03:24:10+5:30

ईरान को अमेरिका और इस्राइल के खिलाफ खड़ा करने वाला वर्तमान उथल-पुथल भरा संघर्ष इस निर्मम रसायन का स्पष्ट उदाहरण है.

usa war No one interested in stopping Iran war increase price oil transportation, electricity and cooking gas are all expensive blog Prabhu Chawla | ईरान युद्ध रोकने में किसी की दिलचस्पी नहीं?, रोज युद्ध में 1.8 अरब डॉलर खर्च?

file photo

Highlightsसर्जिकल अभियान के रूप में शुरू हुआ था, वह अब क्षेत्रीय दावानल में बदल चुका है.युद्ध की दैनिक लागत लगभग 1.8 अरब डॉलर है.प्रत्यक्ष सैन्य खर्च 23 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है.

प्रभु चावला

तेल महंगा होने से परिवहन, बिजली और रसोई गैस सब महंगे हो जाते हैं. नरेंद्र मोदी सरकार को सब्सिडी के दबाव से जूझना पड़ रहा है, जबकि परिवारों के खर्च तेजी से बढ़ रहे हैं. पश्चिम एशिया की उथल-पुथल भरी भट्ठी में संघर्ष युद्धभूमि तक शायद ही सीमित रहते हैं. उनके कंपन वैश्विक व्यापार की नसों, तेल पाइपलाइनों, शेयर बाजार के संकेतकों और रोजमर्रा के घरेलू हिसाब-किताब तक पहुंच जाते हैं. ईरान को अमेरिका और इस्राइल के खिलाफ खड़ा करने वाला वर्तमान उथल-पुथल भरा संघर्ष इस निर्मम रसायन का स्पष्ट उदाहरण है.

इसने भू-राजनीतिक तनाव को एक ऐसे आर्थिक संकट में बदल दिया है, जिसने दुनिया के किसी भी कोने को अछूता नहीं छोड़ा. जो युद्ध शुरुआत में ईरान की परमाणु क्षमता और बैलिस्टिक मिसाइल अवसंरचना को निष्क्रिय करने के लिए एक सर्जिकल अभियान के रूप में शुरू हुआ था, वह अब क्षेत्रीय दावानल में बदल चुका है.

विडंबना यह है कि इस निरर्थक युद्ध में लालची लाभार्थी तो बहुत कम हैं, परंतु युद्ध में शामिल न होने वाले एक दर्जन से अधिक देशों के नागरिक सबसे बड़े पराजित बन गए हैं. तेहरान की जवाबी कार्रवाई उग्र, पर असीमित रही है. मानवीय क्षति के मुकाबले आर्थिक क्षति कहीं अधिक भयावह है. इस युद्ध की दैनिक लागत लगभग 1.8 अरब डॉलर है.

दो सप्ताह में ही प्रत्यक्ष सैन्य खर्च 23 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है और कोई भी युद्ध रोकने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा. किसी भी गंभीर मध्यस्थता प्रयास से दो एशियाई महाशक्तियां-चीन और भारत-स्पष्ट रूप से अनुपस्थित हैं. बीजिंग ईरान का सबसे बड़ा तेल ग्राहक है और चाबहार तथा ग्वादर के माध्यम से बेल्ट एंड रोड कॉरिडोर में एक बड़ा निवेशक भी है,

इसलिए वह तेहरान के पतन का जोखिम नहीं उठा सकता. पर वह वॉशिंगटन से टकराव का जोखिम भी नहीं ले सकता, क्योंकि इससे अमेरिका के साथ उसका 600 अरब डॉलर का वार्षिक व्यापार प्रभावित हो सकता है और खाड़ी से मिलने वाली ऊर्जा आपूर्ति खतरे में पड़ सकती है. भारत की दूरी और भी विरोधाभासी और पीड़ादायक है.

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और प्रतिबंध कड़े होने से पहले ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी था. साथ ही भारत इस्राइल के साथ मजबूत रक्षा साझेदारी भी बनाए हुए है. इसके बावजूद हमारी सरकार ने ‘तनाव कम करने’ और ‘संवाद’ की सामान्य अपीलों से आगे कुछ नहीं कहा है.

दरअसल, प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव निकट हैं और महंगाई पहले ही संवेदनशील मुद्दा बन चुकी है. कुछ भारतीय रणनीतिक विश्लेषक निजी तौर पर यह भी मानते हैं कि यदि ईरान लंबे समय तक कमजोर रहता है, तो पाकिस्तान का पश्चिमी पड़ोसी व्यस्त रहेगा और खाड़ी क्षेत्र में चीन का प्रभाव भी कम होगा.

इसके अलावा, विदेश मंत्रालय के पास तेहरान, रियाद और वॉशिंगटन के बीच लगातार मध्यस्थता करने की संस्थागत क्षमता और संसाधन भी सीमित हैं. हालांकि, भारतीय राजनयिकों ने चुपचाप अमेरिकी और इजराइली समकक्षों को अपनी चिंताएं बताई हैं, पर 1991 के खाड़ी युद्ध या 2003 के इराक संकट जैसी कोई सार्वजनिक शांति पहल सामने नहीं आई.

ऐसे युद्ध का पहला झटका हमेशा भारत जैसे ऊर्जा बाजारों में महसूस होता है. जबकि सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों जैसे तेल उत्पादक राष्ट्र हर कीमत वृद्धि के साथ अपने खजाने भरते हुए इस अवसर का आनंद लेते हैं. पर आयात पर निर्भर देशों के लिए इसका असर तुरंत और गहरा होता है.

अपने कच्चे तेल का 80 प्रतिशत से अधिक विदेशों से आयात करने वाला भारत मामूली कीमत वृद्धि से भी हिल जाता है. प्रति बैरल केवल 10 डॉलर की वृद्धि भारत के वार्षिक आयात बिल में 15-20 अरब डॉलर जोड़ देती है. यदि कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाए, तो एक ही वित्तीय वर्ष में यह घाटा 25 अरब डॉलर से भी अधिक हो सकता है.

इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा, चालू खाते का घाटा बढ़ेगा और महंगाई बढ़ेगी, जिससे रुपए पर दबाव पड़ेगा और 2013 के बाद मुश्किल से पुनर्निर्मित विदेशी मुद्रा भंडार कमजोर पड़ सकते हैं.
वित्तीय बाजारों में भी तूफान जल्दी आ गया. शुरुआती घबराहट भरी बिकवाली में भारत के शेयर बाजार की कुल पूंजी लगभग 16 लाख करोड़ रुपए घट गई.

इसका असर वैश्विक स्तर पर भी दिखा, क्योंकि निवेशक सोना और ऊर्जा शेयरों जैसे सुरक्षित विकल्पों की ओर भागने लगे. इस तबाही के बीच युद्ध अर्थव्यवस्था की एक भयावह विडंबना सामने आती है. जहां उद्योगों का बड़ा हिस्सा नुकसान झेल रहा है, वहीं कुछ साम्राज्य इस विनाश से फल-फूल रहे हैं. रक्षा उद्योग के विशाल निगम इस त्रासदी के सबसे बड़े विजेता हैं.

उनकी सटीक हथियार प्रणालियां, स्टील्थ फाइटर और ड्रोन युद्ध में तेजी से इस्तेमाल हो रहे हैं, और जैसे-जैसे अमेरिका और इस्राइल के हमले जारी हैं, ये कंपनियां मुनाफा कमा रही हैं. तेल महंगा होने से परिवहन, बिजली और रसोई गैस सब महंगे हो जाते हैं. नरेंद्र मोदी सरकार को सब्सिडी के दबाव से जूझना पड़ रहा है, जबकि परिवारों के खर्च तेजी से बढ़ रहे हैं.

भारत के लिए यह स्थिति एक भयावह आर्थिक संकट में बदल सकती है-चालू खाते का बड़ा घाटा, गिरता हुआ रुपया और गैस, परिवहन तथा भोजन की बढ़ती कीमतों से दबे हुए परिवार. इस युद्ध के विजेता पहले ही स्पष्ट हैं- यानी अमेरिका-इजराइल की रणनीतिक धुरी, जिसने सैन्य बढ़त हासिल कर ली है, रक्षा उद्योग जिसने अरबों डॉलर का मूल्य बढ़ा लिया है,

और तेल निर्यातक राजशाहियां, जिनकी आय बढ़ गई है. यदि यह युद्ध एक और महीने तक बिना रोक-टोक चलता रहा, तो इसका भारत पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा-एक ऐसा देश, जो 2027 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख रहा है. भारत उस युद्ध का आकस्मिक और असहाय शिकार बनने की स्थिति नहीं झेल सकता, जिसमें उसने एक गोली तक नहीं चलायी, बम तो दूर की बात है.

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