टैरिफ डिविडेंड का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
By ऋषभ मिश्रा | Updated: January 19, 2026 05:50 IST2026-01-19T05:50:23+5:302026-01-19T05:50:23+5:30
अमेरिका में इस नीति के जरिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की है कि यदि आयात शुल्कों से सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलता है, तो उसका एक हिस्सा हर नागरिक को लगभग 2000 अमेरिकी डॉलर (करीब 1.7 लाख) तक नगद सहायता के रूप में दिया जा सकता है.

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विश्व व्यापार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक तनावों के बीच अमेरिका ने एक नई आर्थिक सोच को जन्म दिया है, जिसे ‘टैरिफ डिविडेंड’ कहा जा रहा है. इसका मूल विचार यह है कि जब कोई देश विदेशी वस्तुओं पर आयात शुल्क (टैरिफ) लगाकर भारी राजस्व प्राप्त करता है, तो उस राजस्व का एक हिस्सा अपने नागरिकों को सीधे डिविडेंड या बोनस के रूप में लौटाया जाए.
इससे एक ओर घरेलू उद्योग को सुरक्षा मिलती है, वहीं दूसरी ओर नागरिकों की क्रय शक्ति भी बनी रहती है. अमेरिका में इस नीति के जरिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की है कि यदि आयात शुल्कों से सरकार को अतिरिक्त राजस्व मिलता है, तो उसका एक हिस्सा हर नागरिक को लगभग 2000 अमेरिकी डॉलर (करीब 1.7 लाख) तक नगद सहायता के रूप में दिया जा सकता है.
टैरिफ डिविडेंड का सबसे बड़ा उद्देश्य है अमेरिकी अर्थव्यवस्था को दोहरे लाभ की स्थिति में लाना. पहला विदेशी वस्तुओं पर ऊंचे शुल्क लगाकर सरकार को अरबों डॉलर का अतिरिक्त राजस्व दिलाना और दूसरा इसी राजस्व से घरेलू खपत बढ़ाने के लिए नागरिकों को नगद प्रोत्साहन देना. वर्तमान में अमेरिका का वार्षिक कस्टम राजस्व लगभग 80 से 90 अरब डॉलर के बीच है.
जो ट्रम्प युग की टैरिफ बढ़ोत्तरी के बाद लगभग दोगुना हुआ है. इस नीति की कुछ सीमाएं और खतरे भी हैं. आयात महंगा होने से वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिससे महंगाई पर दबाव बनता है. उदाहरण के लिए स्टील, एल्युमीनियम पर टैरिफ बढ़ने के बाद अमेरिका में निर्माण सामग्रियों की लागत 12 फीसदी तक बढ़ गई है.
इलेक्ट्रॉनिक सामान और ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी औसतन 8-10 फीसदी मूल्य वृद्धि देखी गई है. इसका असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है और यदि महंगाई बढ़ती है तो टैरिफ डिविडेंड से मिला नगद लाभ जल्दी समाप्त हो जाता है. भारत के लिए यह स्थिति मिश्रित है. यह एक ओर अवसर है तो दूसरी और चुनौती भी है.
अवसर इसलिए क्योंकि अमेरिका अब ‘फ्रेंड शोरिंग’ यानी भरोसेमंद देशों से सामान मंगाने की नीति पर काम कर रहा है. चीन से दूर जाने की इस प्रक्रिया में भारत एक मुख्य भागीदार बन सकता है. यदि अमेरिका चीन से आयात घटाकर भारत से बढ़ाता है तो भारत के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, इंजीनियरिंग, रसायन, वस्त्र और ऑटो पार्ट्स क्षेत्रों में बड़ी वृद्धि के अवसर खुलेंगे.
दूसरी ओर टैरिफ डिविडेंड की नीति चुनौतियां भी पैदा करती है. यदि अमेरिका अपने घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए भारतीय सामानों पर भी ऊंचे टैरिफ लगाना जारी रखता है, तो हमारे निर्यातकों को झटका लग सकता है. अमेरिका भारतीय जेम्स-ज्वेलरी, फार्मास्युटिकल और टेक्सटाइल सेक्टर पर पहले ही 7 फीसदी से 12 फीसदी तक शुल्क लगाता है.
यदि यह बढ़ा तो भारत की प्रतिस्पर्धा क्षमता प्रभावित हो सकती है. भारत को इस परिदृश्य में एक संतुलित रणनीति अपनानी होगी. सबसे पहले निर्यात के नए बाजारों जैसे यूरोप, खाड़ी देशों और अफ्रीका में विविधता लानी होगी, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता कम हो. दूसरा ‘मेक इन इंडिया’ और ‘पीएलआई’ योजना जैसे कार्यक्रमों को और मजबूत बनाना होगा, ताकि भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरे.
तीसरा गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए तकनीकी सुधार और कुशल श्रम बल पर ध्यान देना होगा. कहा जा सकता है कि टैरिफ डिविडेंड अमेरिकी राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक अभिनव प्रयोग है. यह अल्पकाल में अमेरिकी नागरिकों को राहत दे सकता है और घरेलू उद्योग को सुरक्षा प्रदान कर सकता है. परंतु इसके दीर्घकालिक प्रभाव मिश्रित हैं.