हम ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ बनकर खुद को धोखा देते रहते हैं!

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 11, 2026 21:46 IST2026-03-11T21:45:51+5:302026-03-11T21:46:48+5:30

देश में भी कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित कर दिया है तथा गोवा, महाराष्ट्र और बिहार भी ऐसा करने के बारे में सोच रहे हैं.

social media We keep deceiving ourselves becoming many who skilled in preaching blog Hemdhar Sharma | हम ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ बनकर खुद को धोखा देते रहते हैं!

सांकेतिक फोटो

Highlightsटाइम में कमी नहीं आ रही है और मैदानी खेल के बजाय वे मोबाइल से ही चिपके रहते हैं. देश में तो एक रिपोर्ट के अनुसार तीन में से सिर्फ एक बच्चा ही बिना हांफे दौड़ पाता है.स्कूल में मोबाइल लाना बंद कर दिया है और स्कूल का कामकाज वाॉकी-टाॅकी के जरिये चलाया जा रहा है.

हेमधर शर्मा

बच्चों में स्मार्टफोन की बढ़ती लत देश ही नहीं, पूरी दुनिया में चिंता का विषय है. यह न सिर्फ बच्चों की आंखें कमजोर कर रहा है, मोटापा बढ़ा रहा है और आलसी बना रहा है बल्कि इसके जरिये उपलब्ध सामग्री भी इतनी हानिकारक है कि ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, इंडोनेशिया जैसे देशों ने सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है और फ्रांस, पुर्तगाल जैसे नौ देश इस पर बैन लगाने की योजना बना रहे हैं. हमारे देश में भी कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित कर दिया है तथा गोवा, महाराष्ट्र और बिहार भी ऐसा करने के बारे में सोच रहे हैं.

इसके बावजूद मोबाइल के बच्चों पर दुष्प्रभाव की खबरें थमने का नाम नहीं ले रही हैं, जो दर्शाती हैं कि बच्चों के स्क्रीन टाइम में कमी नहीं आ रही है और मैदानी खेल के बजाय वे मोबाइल से ही चिपके रहते हैं. हालत इतनी खराब है कि दुनिया में जितने बच्चे कुपोषित हैं, उससे ज्यादा मोटापे का शिकार हैं. हमारे देश में तो एक रिपोर्ट के अनुसार तीन में से सिर्फ एक बच्चा ही बिना हांफे दौड़ पाता है.

ऐसे समय में पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में स्थित सरकारी स्कूल, जटेश्वर हाईस्कूल के शिक्षकों ने बच्चों की मोबाइल की लत छुड़ाने के लिए अनोखा तरीका अपनाया है. शिक्षकों ने खुद भी स्कूल में मोबाइल लाना बंद कर दिया है और स्कूल का कामकाज वाॉकी-टाॅकी के जरिये चलाया जा रहा है.

दो हजार से ज्यादा बच्चों वाले इस स्कूल में शिक्षक, प्रिंसिपल और दूसरे कर्मचारी स्कूल फंड से खरीदे गए चार वाॉकी-टाॅकी के जरिये स्कूल के कामकाज का प्रबंधन करते हैं. परिणामस्वरूप स्कूल में तो बच्चों के मोबाइल लाने पर बैन है ही, वहां पढ़ने वाले बच्चे अब घर में भी मोबाइल का इस्तेमाल कम कर रहे हैं.

बकौल स्कूल हेडमास्टर अमित कुमार दत्ता, स्कूल में पढ़ रहे छात्रों के अभिभावक बताते हैं कि बच्चों का स्क्रीन टाइम कम हुआ है. दरअसल अपने शिक्षकों को मोबाइल का इस्तेमाल न करते देख बच्चों में भी इसके प्रति आकर्षण कम हुआ है. कहानी है कि एक बार किसी गांव में एक प्रसिद्ध संत का आगमन हुआ. लोग उनके पास अपनी-अपनी समस्याएं लेकर पहुंचने लगे.

एक मां भी अपने दस वर्षीय पुत्र को लेकर पहुंची और कहने लगी कि महाराज, यह गुड़ बहुत खाता है, कृपया इसको समझाइए. संत ने कुछ क्षण सोचा, फिर कहा कि वह एक हफ्ते बाद बच्चे को लेकर आए. एक हफ्ते बाद जब महिला दुबारा पहुंची तो संत ने बच्चे के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा कि ज्यादा गुड़ खाना अच्छी बात नहीं है.

अगले हफ्ते वह महिला फिर आई और संत का आभार प्रकट करते हुए कहा कि उसके बेटे ने सचमुच ही गुड़ खाना छोड़ दिया है. लेकिन उसे यह जानने की जिज्ञासा थी कि संत ने बच्चे को उसी समय क्यों नहीं समझाया, एक सप्ताह बाद क्यों बुलाया था? तब संत ने बताया कि वे खुद भी गुड़ बहुत खाते थे, इसलिए जब तक खुद खाने की आदत न छोड़ दें, बच्चे से छोड़ने को कैसे कह सकते थे!

अगर वैसा करते भी तो बच्चे पर कोई असर ही न पड़ता. हम बड़ों को अक्सर ताज्जुब होता है कि बच्चे हमारी बात सुनते क्यों नहीं हैं, लेकिन बच्चे दरअसल बड़ों की बातों पर नहीं, उनके क्रियाकलाप पर ध्यान देते हैं. वे अपने आसपास की सारी चीजों का गहन निरीक्षण करते हैं, उनसे सीखते हैं और जिस चीज के लिए उन्हें मना किया जाए उसके प्रति तो खास तौर पर उनकी जिज्ञासा जाग्रत हो जाती है.

अगर हम सोचते हैं कि बच्चों के लिए सोशल मीडिया को बैन करके हम बड़े लोग उसका मजा लेते रह सकते हैं तो शायद हम बहुत बड़ी मूर्खता कर रहे हैं. दुर्भाग्य से हम बड़े अपने बचपन की खुराफातों को कुछ दशकों के भीतर ही भूल जाते हैं, वरना अगली पीढ़ी के बच्चों को इतना नादान न समझते.

उन्हें समझाने का एक ही रास्ता है कि पहले हम अपने आप को सुधारें, जैसा कि मोबाइल के मामले में जटेश्वर हाईस्कूल के शिक्षकों ने उदाहरण पेश किया है और बच्चे उसका बढ़-चढ़कर प्रतिदान दे रहे हैं- न सिर्फ स्कूल टाइम में मोबाइल का परित्याग करके बल्कि घर में भी स्क्रीन टाइम कम करके.

त्रासदी यह है कि खुद को सुधारने की ओर हमारा ध्यान ही नहीं है. उम्र में बड़े होने मात्र से ही हम अपने लिए स्वतंत्रता के अर्थ को स्वच्छंदता मान बैठते हैं, जबकि बच्चों से अपेक्षा रखते हैं कि वे उसे अनुशासन का पर्यायवाची मानें! जब तक हम अपने इस पाखंड का परित्याग नहीं करेंगे, तब तक समस्याएं हल करने के नाम पर अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मारते रहेंगे.

Web Title: social media We keep deceiving ourselves becoming many who skilled in preaching blog Hemdhar Sharma

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