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चीन और भारत के बीच रिश्तों में जमी बर्फ पिघलती है तो अमेरिका की छाती पर सांप जरूर लोटेगा!

By विकास मिश्रा | Updated: August 12, 2025 05:15 IST

Shanghai Cooperation Organisation Summit: अमेरिका की नजर इस बात पर होगी कि नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और पुतिन मिलकर कौन सी व्यूह रचना करने वाले हैं.

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ठळक मुद्देमाना जा रहा है कि 31 अगस्त और 1 सितंबर को चीन के तियानजिन शहर में होने जा रहा है.मोदी और पुतिन वहां पहुंचते हैं तो ये दोनों ही शी जिनपिंग के साथ मंच पर होंगे. ऐसे दृश्य पहले भी दिखे हैं.कामचलाऊ समझ तो विकसित हो ही जाए. यह कुछ ऐसा ही मामला है जैसे दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त!

Shanghai Cooperation Organisation Summit: वैसे तो शंघाई सहयोग संगठन का शिखर सम्मेलन हर साल होता है और अमेरिका किसी न किसी बात को लेकर नाराज भी होता है, लेकिन इस बार सम्मेलन बिल्कुल अलग माहौल में होने जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प टैरिफ का चाबुक फटकार रहे हैं. लपेटे में भारत भी है. स्वाभाविक रूप से अमेरिका की नजर इस बात पर होगी कि नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और पुतिन मिलकर कौन सी व्यूह रचना करने वाले हैं. यदि चीन और भारत के बीच रिश्तों में जमी बर्फ पिघलती है तो अमेरिका की छाती पर सांप जरूर लोटेगा!

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का आधिकारिक यात्रा कार्यक्रम हालांकि अभी नहीं आया है लेकिन माना जा रहा है कि 31 अगस्त और 1 सितंबर को चीन के तियानजिन शहर में होने जा रहा है. यदि मोदी और पुतिन वहां पहुंचते हैं तो ये दोनों ही शी जिनपिंग के साथ मंच पर होंगे. ऐसे दृश्य पहले भी दिखे हैं.

लेकिन इस बार चूंकि ट्रम्प चीन के साथ भारत पर भी कोड़ा फटकार रहे हैं इसलिए माहौल बदला हुआ है. चीन और भारत को ऐसा लग रहा है कि आपसी मतभेदों को किनारे रख कर मौजूदा वक्त का सामना करने के लिए एक कामचलाऊ समझ तो विकसित हो ही जाए. यह कुछ ऐसा ही मामला है जैसे दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त!

अमेरिका को एकदम से दुश्मन तो नहीं कह सकते लेकिन ताजा व्यवहार ऐसा ही है. ट्रम्प काफी समय से इस बात की आलोचना करते रहे हैं कि भारत शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स का इतना सक्रिय भागीदार क्यों है? उनका मानना यही है कि अमेरिका से दोस्ती रखनी है तो इन संगठनों से दूर रहो!

मगर भारत इस तरह का जोखिम नहीं उठा सकता क्योंकि अमेरिका अब भरोसा खो चुका है. जो अपने सहयोगी यूरोपीय देशों पर टैरिफ का कोड़ा बरसा सकता है, वह किसी के खिलाफ कुछ भी कर सकता है. फिलहाल इस बात की संभावना भी कम ही लग रही है कि भारत अब अमेरिका के सामने झुकने के बारे में सोचेगा.

अमेरिका से निपटने के लिए भारत के पास फिलहाल जो विकल्प मौजूद हैं, उनमें यूरोपीय और अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के अलावा चीन से रिश्ते सुधारना भी शामिल है. इधर चीन को अमेरिका का सामना करना है तो उसे भारत की जरूरत होगी. यह फैक्टर ऐसा है जो भारत और चीन को पास ला सकता है.

हालांकि चीनी रिश्ते का इतिहास तो और भी धोखेबाजियों से भरा पड़ा है, लेकिन कई बार वक्त की जरूरत के अनुसार रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने और रिश्तों में मिठास घोलने की आवश्यकता होती है. इस वक्त चीन और भारत दोनों के लिए यह आवश्यक है. तीसरा किरदार रूस भी यही चाहेगा क्योंकि वो तो यूरोप से लेकर अमेरिका तक के निशाने पर है और यूक्रेन में जंग में बुरी तरह उलझा हुआ है.

भारत और चीन के बीच बेहतर रिश्ते उसके हक में हैं, इसलिए पुतिन लगातार यह कोशिश कर भी रहे हैं. अच्छी बात है कि भारत और रूस के रिश्ते लगातार बेहतर और सहयोगात्मक बने हुए हैं. चीन से रिश्ते सुधारने के लिए भारत लगातार कोशिश कर भी रहा है. नरेंद्र मोदी और जिनपिंग की पिछले साल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात हुई थी. रिश्तों में जमी बर्फ पिघलाने की बात हुई थी.

उसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री ने चीन की यात्राएं की थीं. इसके बाद चीन ने भारतीयों को कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए अनुमति देना स्वीकार किया. भारत ने भी चीनी पर्यटकों के लिए वीजा देने पर सहमति जताई. ध्यान देने वाली बात है कि 2018 के बाद नरेंद्र मोदी चीन नहीं गए हैं.

यदि अभी यात्रा होती है तो यह माना जा रहा है कि सम्मेलन के अलावा भी जिनपिंग से उनकी मुलाकात अलग से होगी. बातचीत क्या होनी है, इस पर चर्चा के लिए चीनी विदेश मंत्री वांग यी भारत आ सकते हैं. संभव है कि इसी सम्मेलन के दौरान मोदी और पुतिन के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी हो सकती है.

यदि वास्तव में ऐसा ही होता है तो ट्रम्प के लिए इसे हजम कर पाना बिल्कुल भी आसान नहीं होगा. दरअसल अमेरिका को इस बात की शंका रही है कि शंघाई सहयोग संगठन अमेरिका के प्रभुत्व के खिलाफ खड़ा हो रहा है. अब जरा समझिए कि यह संगठन है क्या? 2001 में चीन और  रूस ने कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान के साथ इस संगठन को जन्म दिया.

फिर भारत, पाकिस्तान, ईरान तथा बेलारूस जुड़े. अफगानिस्तान (अभी सक्रिय नहीं) व मंगोलिया पर्यवेक्षक  के रूप में शामिल हैं तो श्रीलंका, तुर्की, कंबोडिया, अजरबैजान, नेपाल, आर्मेनिया, मिस्र, कतर, सऊदी अरब, बहरीन, कुवैत, म्यांमार, मालदीव और यूएई डायलॉग पार्टनर हैं.

अमेरिका इस संगठन से घबराया हुआ इसलिए है क्योंकि यह संगठन जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा संगठन है. विश्व की 40 फीसदी आबादी इन्हीं देशों में रहती है. विश्व के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में इसका योगदान 20 फीसदी से ज्यादा है. दुनिया का 20 फीसदी तेल भंडार और 44 प्रतिशत प्राकृतिक गैस भंडार इन्हीं इलाकों में है.

तो, सोचिए कि यदि ऐसा संगठन मजबूत हो रहा है तो अमेरिका को यह बात कैसे पचेगी? मगर इस संगठन के साथ कुछ विसंगतियां भी हैं. संगठन आतंकवाद से लड़ने की बात करता है लेकिन इसके सदस्य देश पाकिस्तान ने हमारे भारत में आतंकवाद फैला रखा है और चीन उसकी तरफदारी भी करता है.

इस संगठन को यदि वास्तव में बहुध्रुवीय दुनिया में अपना अलग स्थान बनाना है तो इन विसंगतियों को दूर करना होगा. फिलहाल तो देखने वाली बात यह है कि 31 अगस्त और 1 सितंबर को होता क्या है? और अमेरिका की प्रतिक्रिया क्या होती है!  

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