सतीश परसाई
प्रत्येक वर्ष 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस मनाया जाता है. यह दिवस मानव के पोषण व स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण में दलहनों के महत्व को बताने के लिए किया जाता है. भारत की लगभग 39 प्रतिशत जनता शाकाहारी है और दलहन उनके लिए प्रोटीन का महत्वपूर्ण साधन है. चूंकि दलहन वातावरण से अपनी जड़ों में गांठ के रूप में नत्रजन का स्थिरीकरण करते हैं अतः वे हमारे पर्यावरण के लिए भी उपयोगी हैं. हमारा देश दलहन के उत्पादन में पिछड़ा हुआ है. यहां प्रति हेक्टेयर औसत उपज लगभग 740-888 किलोग्राम है जो विश्व की औसत उपज 969-990 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से कम है.
दलहन उत्पादन में पिछड़े होने का कारण सरकार की नीतियां हैं, जो अनाज उत्पादन को प्रोत्साहित कर रही हैं. इसके अतिरिक्त कीट व्याधियों का प्रकोप, मौसम में परिवर्तन, अनुसंधान में न्यूनता और गुणात्मक आदानों का अभाव रहा है. सरकार ने हरित क्रांति के पश्चात अधिक पानी वाली धान और गेहूं की फसल को विभिन्न तरीकों से प्रोत्साहित किया.
इन्हें एमएसपी पर खरीदने की व्यवस्था की. इस कारण दलहन अधिक आमदनी देने वाली फसल नहीं बन पाई. इसके अतिरिक्त दलहन भंडारण के लिए वेयरहाउस का अभाव, उचित भंडारण और उन्हें खरीदने की उचित व्यवस्था का अभाव है. इस कारण दलहन में कटाई उपरांत अधिक हानि हो रही है, किसानों को अपेक्षित कीमत नहीं मिलने पर भी इनका भंडारण न करते हुए उन्हें बेचने की व्यवस्था करना पड़ती है.
इन सब के अतिरिक्त कीट व्याधियां, मुख्यतः फली छेदक, फसल सूखने की समस्या और पीले विषाणु रोग की समस्या भी इसके लिए जिम्मेदार है. दलहन फसलें कीट प्रकोप के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, इस कारण उन्हें अधिक नुकसान होता है और उत्पादन भी कम मिलता है.
इन सबके साथ उनके प्रबंधन के प्रति किसानों का उचित ध्यान न देना और कीट रोग प्रतिरोध जातियों का अभाव होना भी कारणीभूत है. इन फसलों में विभिन्न फली छेदक कीटों का प्रकोप होता है जिनमें से किसान केवल चने की हरी इल्ली का ही बेहतर प्रबंधन कर लें तो वे अपने उत्पादन में एक बड़ी वृद्धि अर्जित कर सकते हैं.
आज इस कीट की रोकथाम संपूर्ण संसार के किसानों के लिए एक समस्या बन गई है. इसका नियंत्रण न केवल किसानों के लिए अपितु वैज्ञानिकों के लिए भी एक चुनौती बन गया है. इसका उचित ढंग से प्रबंधन अनिवार्य है तभी हम दलहन फसलों से अच्छा उत्पादन लेने की उम्मीद कर सकते हैं.