ईरानी निशाने पर इजराइल नहीं, खाड़ी के देश!
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: March 26, 2026 05:21 IST2026-03-26T05:21:04+5:302026-03-26T05:21:04+5:30
इजराइल को बराबरी के हमलों से नुकसान पहुंचाने के बजाय ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और बहरीन पर हजारों मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं.

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प्रभु चावला
इतिहास के सबसे बुद्धिमान स्वर हमेशा युद्ध के छिपे हुए जहर के बारे में चेतावनी देते रहे हैं. ‘युद्ध नरक है’, अमेरिकी जनरल विलियम शेरमन ने कभी कहा था, फिर भी नेतागण युद्ध की लपटों में महिमा तलाशते रहते हैं. आज पश्चिम एशिया के इस विनाशकारी संघर्ष में वे चेतावनियां सच प्रतीत होती हैं. वैसे तो यह युद्ध चौथे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है, पर तीसरे सप्ताह में ही यह सच्चाई सामने आ चुकी थी कि तेहरान ने जानबूझकर इजराइल के प्रति संयम और अपने अरब पड़ोसियों के प्रति आक्रामकता का रास्ता चुना है. यह सुनियोजित रणनीति तेहरान के वास्तविक उद्देश्य को उजागर करती है.
इजराइल को बराबरी के हमलों से नुकसान पहुंचाने के बजाय ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और बहरीन पर हजारों मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं. तेहरान की तरफ से मिसाइलों का केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही इजराइल को निशाना बनाकर छोड़ा गया है. यह स्पष्ट अंतर ईरान के वास्तविक रणनीतिक लक्ष्य पर गंभीर सवाल उठाता है. क्या वाकई ईरान के निशाने पर इजराइल है?
या उसका उद्देश्य उन सुन्नी अरब अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर करना है, जो अमेरिका के क्षेत्रीय प्रभुत्व को बनाए रखती हैं? दशकों की प्रतिस्पर्धा से गहराए शिया-सुन्नी के विभाजन से इस चयन को समझा जा सकता है. सवाल यह भी है कि भारी नुकसान झेलने के बावजूद अरब देश सीधे जवाबी कार्रवाई से बचते क्यों रहे हैं.
रमजान चूंकि समाप्त हो चुका है, ऐसे में, कुछ विश्लेषक यह अनुमान लगा रहे हैं कि अब अरब देशों की ओर से जवाबी हमला हो सकता है. इस युद्ध की शुरुआती कार्रवाई बेहद दमदार रही, जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और ईरान की राजनीतिक-सैन्य नेतृत्व संरचना को खत्म कर दिया.
तब खामेनेई के दूसरे बेटे मोज्तबा को सर्वोच्च नेता चुना गया. यह फैसला ईरान को उम्मीद से कहीं अधिक स्थिरता प्रदान कर गया. ईरान के ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4’ के तहत अब तक ढाई सौ से तीन सौ बैलिस्टिक मिसाइलें और कम से कम डेढ़ सौ ड्रोन इजराइल पर दागे गए हैं. इजराइल में नागरिक हताहतों की संख्या दो दर्जन के करीब है.
हमले तेल अवीव, हाइफा, बीत शेमेश, रामत गन, होलोन, डिमोना और आसपास के क्षेत्रों में दर्ज किए गए हैं. इजराइल को हुई भौतिक क्षति सीमित और प्रतीकात्मक रही है. उसके सैन्य ठिकानों पर बहुत कम प्रभाव पड़ा और एयरबेस पूरी तरह सक्रिय हैं, जबकि खाड़ी क्षेत्र में स्थिति बिल्कुल अलग है.
केवल संयुक्त अरब अमीरात पर ही मार्च के मध्य तक 314 बैलिस्टिक और 15 क्रूज मिसाइलें, 1,672 ड्रोन दागे गए. कुवैत ने 120 से अधिक मिसाइलें और 308 ड्रोन दर्ज किए. कतर ने 127 मिसाइलों और 63 ड्रोन का सामना किया, और दो एसयू-24 विमान दुर्घटनाएं भी हुईं. बहरीन पर 105 मिसाइलें और 176 ड्रोन दागे गए, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों ने भी दर्जनों हमले झेले.
संघर्ष के शुरुआती चरण में ईरान के लगभग 60 प्रतिशत हथियार इजराइल के बजाय अमेरिका के ठिकानों और खाड़ी के बुनियादी ढांचों को निशाना बना रहे थे. जाहिर है, इस युद्ध में अब तक मानवीय और आर्थिक विनाश अरब दुनिया में कहीं अधिक गहरा रहा है. ईरानी ड्रोन और मिसाइलों ने बार-बार दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को निशाना बनाया.
जो दुनिया का सबसे व्यस्त अंतरराष्ट्रीय केंद्र है. इससे ईंधन भंडार जल उठे, उड़ानें रद्द हुईं या उनके रूट बदले गए, और बड़े होटल और ऊर्जा प्रतिष्ठान हमले की सीधी चपेट में आए. कतर की रास लाफान एलएनजी सुविधा को भारी नुकसान हुआ, सऊदी अरब की यनबू रिफाइनरी और कुवैत के कई प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया.
नतीजतन वैश्विक तेल कीमतें 110 डॉलर से ऊपर पहुंच गईं. हालांकि ट्रम्प की ताजा टिप्पणी के बाद कच्चे तेल के दाम कुछ कम हुए हैं. युद्ध के कारण पर्यटन क्षेत्र को, जो अमीरात और अन्य खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं का आधार है, रोज 55 से 65 करोड़ डॉलर का नुकसान हो रहा है, और वार्षिक क्षेत्रीय नुकसान 40 से 56 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है.
अमेरिकी ठिकानों वाले देशों पर हमला कर तेहरान इन पर असहनीय दबाव डालना चाहता है, ताकि वे वॉशिंगटन पर युद्ध रोकने का दबाव डालें. यह रणनीति कोई संयोग नहीं, बल्कि एक स्पष्ट सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य इजराइल पर सीधी सैन्य श्रेष्ठता हासिल करने के बजाय अमेरिका के सुन्नी सहयोगियों को कमजोर कर युद्ध में अमेरिकी भागीदारी की लागत में वृद्धि करना है.
यह स्थिति एक और गंभीर प्रश्न उठाती है. क्या ईरान का लक्ष्य केवल आर्थिक दबाव के जरिये अपने शासन को बचाना है या इसमें सांप्रदायिक गणना भी शामिल है? ईरान क्षेत्र में प्रमुख शिया शक्ति है, जबकि खाड़ी देश मुख्यतः सुन्नी हैं. दशकों से ईरान इन देशों-खासतौर पर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात-को वैचारिक और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता रहा है.
अब्राहम समझौतों के बाद इजराइल से संबंध सामान्य करने वाले सुन्नी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को निशाना बनाकर ईरान अमेरिकी असर को कमजोर करने के साथ-साथ खुद को व्यापक मुस्लिम समुदाय का रक्षक भी दिखाने की कोशिश कर रहा है. इस बीच अरब देशों का संयम भी ध्यान खींचता है.
भारी नुकसान के बावजूद, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और अन्य देशों ने सीधे ईरान पर हमला नहीं किया है. इसके कारण हैं-अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भरता, सीमित सैन्य रणनीति, और व्यापक युद्ध का खतरा. हालांकि इस बारे में कुछ कहना अटकल ही होगा. खाड़ी देशों का नेतृत्व इस पर सहमत है कि सिर्फ अमेरिका और इजराइल ही तेहरान के खतरनाक इरादों पर अंकुश लगा सकते हैं.
वे देश अमेरिका-इजराइल के इस अभियान में सहयोगी की भूमिका में होंगे, हालांकि उनकी अर्थव्यवस्थाओं को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. संयुक्त अरब अमीरात ने हालांकि अब स्पष्ट चेतावनी दी है. सऊदी शहजादे मोहम्मद बिन सलमान के साथ मिलकर अमीरात के नेतृत्व ने कहा है कि लगातार हमले क्षेत्रीय युद्ध को जन्म दे सकते हैं.
यदि ईरान नहीं रुका, तो जवाबी कार्रवाई संभव है. यह रणनीति खतरनाक है. इससे संभावित अरब समर्थन खत्म हो सकता है और अंतरराष्ट्रीय अलगाव बढ़ सकता है. जैसे-जैसे खाड़ी देशों का आर्थिक नुकसान बढ़ रहा है, तेहरान केवल अपने विरोधियों को ही नहीं, वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा रहा है, जो अंततः उसी को सहारा देती है. युद्ध कभी भी पहचान बचाने का साधन नहीं होता. यह अंततः उसे निगल जाने वाला हथियार बन जाता है.