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ईयू और भारत के बीच एफटीए से अमेरिका क्यों नाराज?

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: January 28, 2026 06:02 IST

India-EU FTA: उसुर्ला और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा इस साल गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि भी थे और भारत ने साफ संदेश दे दिया था कि यदि अमेरिका टैरिफ की धमकी देता फिर रहा है तो रास्ते दूसरे भी हैं.

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ठळक मुद्देयूरोपीय यूनियन के 27 देशों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.सबसे पहले यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष उसुर्ला वॉन डेर लेयेन ने दी थी. किसानों और छोटे उद्योगों के लिए यूरोपीय मार्केट तक पहुंच को आसान बनाएगा.

India-EU FTA: भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) वास्तव में बहुत बड़ी डील है और इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जा रहा है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है. खासकर अभी जो वैश्विक माहौल है, उसमें तो यह डील वाकई न केवल भारत के लिए लाजवाब है बल्कि यूरोपीय यूनियन के 27 देशों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.

इस तरह की डील की जानकारी सबसे पहले यूरोपीय यूनियन की अध्यक्ष उसुर्ला वॉन डेर लेयेन ने दी थी. उसुर्ला और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा इस साल गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि भी थे और भारत ने साफ संदेश दे दिया था कि यदि अमेरिका टैरिफ की धमकी देता फिर रहा है तो रास्ते दूसरे भी हैं.

समझौते के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह समझौता हमारे किसानों और छोटे उद्योगों के लिए यूरोपीय मार्केट तक पहुंच को आसान बनाएगा. यहां ध्यान रखिए कि अमेरिका चाहता है कि भारत के कृषि और डेयरी उद्योग में वह सेंध लगाए लेकिन भारत अडिग है कि ऐसा नहीं होगा. भारतीय किसानों के लिए यूरोप का रास्ता निश्चय ही प्रशंसनीय है.

मोदी ने इस समझौते को साझा समृद्धि का नया ब्लू प्रिंट कह कर भारतीय इरादे को स्पष्ट कर दिया है. तारीफ करनी होगी यूरोपीय यूनियन के नेताओं की जिन्होंंने अमेरिका के भारी दबाव को दरकिनार करते हुए इस एफटीए को अंतिम रूप दिया. स्वाभाविक तौर पर अमेरिका नाराज हुआ है और उसने कहा है कि यूरोपीय यूनियन अपने खिलाफ युद्ध को खुद ही हवा दे रहा है.

अमेरिका कहता है कि भारत सस्ती दर पर रूस से कच्चा तेल खरीदता है और उसे रिफाइन करके बेचता है. यूरोप चूंकि यह रिफाइंड तेल खरीदता है इसलिए एक तरह से वह रूस की मदद ही कर रहा है. रूस ने यूक्रेन पर हमला कर रखा है और यूरोपीय यूनियन यूक्रेन के साथ है. इधर यूरोप इस बात को अच्छी तरह समझ रहा है कि अमेरिका अब उस तरह का भरोसेमंद साथी नहीं रहा जैसा पहले था.

अब तो टैरिफ की धमकी भी देता है. इसलिए यूरोप के लिए भी विकल्प तलाश करना जरूरी था. इसीलिए यह एफटीए साकार हो पाया है. अमेरिका नाराज जरूर है लेकिन वह कुछ कर नहीं पाएगा. इस बीच खबर आ रही है कि कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी मार्च के पहले सप्ताह में भारत का दौरा कर सकते हैं और दोनों देशों के बीच यूरेनियम, ऊर्जा, खनिज और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में महत्वपूर्ण समझौते हो सकते हैं. स्वाभाविक है कि इससे भी अमेरिका नाराज होगा.

हाल के वर्षों में कनाडा के साथ भारत के संबंध खराब हुए थे लेकिन कार्नी के आने के बाद स्थितियां सुधरी हैं और यह समझौता हो जाता है तो यह अमेरिका के लिए और भी बड़ी चिंता का कारण हो सकता है. वैसे भी कार्नी से ट्रम्प बहुत नाराज हैं क्योंकि दावोस में कार्नी ने ट्रम्प की नीतियों के खिलाफ बोला था और नए वर्ल्ड ऑर्डर की बात की थी. उसके पहले कार्नी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी.

और एक ट्रेड डील की घोषणा की थी. इसके जवाब में ट्रम्प ने धमकी दी थी कि यदि चीन के साथ कनाडा ने किसी तरह की डील की तो कनाडा पर 100 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा. मगर कार्नी उनकी परवाह नहीं कर रहे हैं. स्थितियां बता रही हैं कि ट्रम्प का टैरिफ वाला हथियार अब भोथरा होने लगा है. दुनिया किसी एक के प्रभुत्व में रहने के लिए राजी नहीं है.

टॅग्स :डोनाल्ड ट्रंपUSAनरेंद्र मोदीपीयूष गोयल
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