हर कोई अपने लिए पर्याप्त संसाधन जुटाना चाहता है ताकि हर स्थिति का मुकाबला किया जा सके और इस बात की दौड़ लगी रहती है कि थोड़ा और हो जाता तो अच्छा होता. पर पर्याप्त की मरीचिका आगे-आगे भागती है और हम पीछा ही करते रहते हैं. आम आदमी की जिंदगी में अक्सर ऐसी परिस्थिति आती रहती है जब सामने कोई नए मॉडल की चीज दिखती है. इसे देख हमें भी लगता है कि वह सब मेरे पास भी हो. दरअसल नया फोन, नया सोफा, नया जूता या फिर कोई भी नई चीज लेने के बाद हफ्ता बीतते न बीतते वह चीज साधारण, बासी और पुरानी लगने लगती है.
ऐसा होने के बाद उसके लिए हमारी इच्छा की तीव्रता भी कम होने लगती है, वह ढलने लगती है. ‘थोड़ा और’ की प्रवृत्ति बताती है कि हमारा मस्तिष्क नए-नए संसाधनों को इकट्ठा करने में जुटा रहता है. आदिम मनुष्य के जीवन में भोजन इकट्ठा करने और दीर्घ जीवन के लिए यह युक्ति कारगर थी. आज की बात कुछ और है. हमारी दुनिया बहुत बदल चुकी है.
अब वैसी असुरक्षा और अनिश्चय की स्थिति नहीं रही. ‘थोड़ा और’ अर्जित करने के अवसर अब हम पुराने माॅडल को अपग्रेड करने और अन्य चीजों के विकल्पों में बदल चुके हैं. यह नियति का खेल है कि एक समय जिस बात ने जीवन को खुशहाल बनाया था वह अब बेकार की फिजूलखर्ची और भयानक असंतोष के दुष्चक्र को जन्म दे रही है.
यह तरीका उस दौर के लिए था जब परिवेश में असुरक्षा थी और उपलब्ध साधन सीमित थे. आज के अतिशय और अतिरेक के दौर के लिए वह मौजूं नहीं रहा. थोड़े विकल्प हमारी इच्छा-शक्ति को सुदृढ़ करते हैं और निर्णय की चुनौती को कम करते हैं. तब हम सिर्फ सार्थक लक्ष्य पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं.
जब नवीनतम को पीछे छोड़ते हैं विकल्पों की बाढ़ कम करते हैं तो हम जो अपने पास है उस पर ध्यान देते हैं और समझदारी के साथ खर्च करते हैं. खरीदने के पहले प्रतीक्षा करना ठीक है, न कि उतावली में खरीदना. किफायती दृष्टि होने पर गैरजरूरी चीजों की भीड़ तथा निर्णय लेने की थकान भी कम होती है.
हम अवसर पा सकेंगे ताकि यात्रा, सीखने, सामाजिक कार्य में जुट कर खुशी का अनुभव कर सकें. ‘अति’ को मना कर समय और ऊर्जा के लिए हम ‘हां’ करते हैं. वस्तुओं को छोड़ने से पश्चाताप की जगह अपनी पहचान बनाते हैं. अधिक का पीछा कभी भी सुखी नहीं बना सकता. किफायतीपन वस्तुत: एक व्यावहारिक विकल्प है.
स्वेच्छया शांति, अपनी खुशी से, न कि बाहरी दबाव या सामाजिक प्रत्याशाओं के कारण चुनने से खुशी बढ़ती है और तनाव कम होता है. जरूरी है कि हम सूचना के अतिभार से बचें. भय और दूसरों से प्रतिपुष्टि की जगह आनंद और आंतरिक संतुष्टि को महत्व देना चाहिए.
अपनी अनुभूतियों और वर्तमान क्रियाओं पर ध्यान देते हुए जो है उससे प्रसन्न होना चाहिए न कि जो नहीं है उसे लेकर चिंतित हों. इसके लिए सोशल मीडिया के उपयोग की सीमा बांध कर उन चीजों के लिए मना करना होगा जो आपके काम की न हों. उन चीजों में लगें जो आपको प्रसन्न करती हैं यानी पढ़ना, सृजन या कहीं मन लगाना.