व्यावहारिक समाधान से निष्क्रिय सोने का हो सकता है सदुपयोग
By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: March 27, 2026 05:33 IST2026-03-27T05:33:39+5:302026-03-27T05:33:39+5:30
योजना के तहत स्टेट बैंक (एसबीआई) ने इस स्कीम के जरिए मार्च 2020 तक 13,212 किलोग्राम पारिवारिक और संस्थागत गोल्ड जुटाया भी था.

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देश के घरों और मंदिरों में रखे लगभग दस हजार अरब डाॅलर के सोने को वित्तीय प्रणाली में लाए जाने का प्रस्ताव तो अच्छा है लेकिन इसके रास्ते में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को भी दूर करना होगा, तभी इस प्रस्ताव पर अमल होने की संभावना परवान चढ़ पाएगी. संसद की वित्त पर स्थायी समिति के सदस्य और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी.पी. चौधरी तथा बाजार के अधिकारियों ने सोने के वित्तीयकरण का सुझाव देते हुए तर्क दिया है कि भौतिक रूप से सोना जमा रखने से आर्थिक वृद्धि में भूमिका सीमित रह जाती है, इसलिए सोने के अधिक वित्तीयकरण की आज पहले से कहीं अधिक जरूरत है.
लेकिन ईजीआर (इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीप्ट) ढांचे के तहत भौतिक सोना जमा करने पर लगने वाला तीन प्रतिशत जीएसटी इसके व्यापक उपयोग में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है, जो निवेशकों को डिजिटल सोना अपनाने से हतोत्साहित करता है. यह कर बोझ भौतिक और डिजिटल सोने के बीच की लागत का अंतर बढ़ाता है, जिससे यह प्रणाली एक ‘नॉन-स्टार्टर’ (बिना शुरुआत वाली) बनी हुई है.
इसलिए उद्योग जगत मांग कर रहा है कि इस 3 प्रतिशत टैक्स को घटाकर 1 प्रतिशत किया जाए, जिससे खपत और निवेश दोनों को बढ़ावा मिल सके. अपना सोना बैंक में जमा कराकर लोग उस पर वार्षिक ब्याज भी प्राप्त कर सकते हैं. इसके अलावा सोने को घर पर रखने की चिंता से मुक्ति मिलती है या बैंक लॉकर का वार्षिक किराया देने की जरूरत नहीं पड़ती है.
सरकार ने वर्ष 2015 में स्वर्ण मुद्रीकरण योजना शुरू की थी, जिसका मकसद घरों और संस्थानों (जैसे ट्रस्ट) में बेकार पड़े सोने को उत्पादक उपयोग में लाना और देश की सोने के आयात पर निर्भरता को कम करना था. योजना के अंतर्ग लोग अपना सोना (गहने, सिक्के या बार) बैंकों में जमा कर सकते थे, जिसे गलाकर शुद्ध सोने के रूप में रखा जाता था.
इस योजना के तहत स्टेट बैंक (एसबीआई) ने इस स्कीम के जरिए मार्च 2020 तक 13,212 किलोग्राम पारिवारिक और संस्थागत गोल्ड जुटाया भी था, लेकिन योजना को जितनी उम्मीद थी, उतना प्रतिसाद नहीं मिल सका. इसलिए सरकार ने 26 मार्च 2025 से गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (जीएमएस) के तहत मीडियम टर्म (5-7 वर्ष) और लॉन्ग टर्म (12-15 वर्ष) सरकारी जमा योजनाओं को बंद कर दिया है.
इसलिए जाहिर है कि घरों और मंदिरों में जमा सोने को बाहर निकलवाना इतना आसान नहीं है, लेकिन सरकार को अगर उसे उपयोगी बनाना है तो निश्चित रूप से पुरानी दिक्कतों से सबक लेते हुए उनका व्यावहारिक समाधान तलाशना होगा, ताकि लोगों का डर भी दूर हो सके और निष्क्रिय पड़े सोने को उत्पादक भी बनाया जा सके.