करदाताओं पर क्यों डालें ‘मुफ्त’ का बोझ?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 6, 2026 05:43 IST2026-02-06T05:43:12+5:302026-02-06T05:43:12+5:30

मंत्रालय के विस्तृत दस्तावेज, रंगीन ग्राफ, जटिल वित्तीय शब्दावली और उससे पहले पेश किए जाने वाले मीठे ‘हलवे’ आम आदमी की समझ से परे हैं.

budget 2026 Why burden taxpayers with 'freebies' blog Abhilash Khandekar | करदाताओं पर क्यों डालें ‘मुफ्त’ का बोझ?

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Highlightsवित्त मंत्री द्वारा संसद में पेश किए जाने वाले बजट प्रस्तावों को ठीक से समझ नहीं पाते.उपकरों के बोझ के बावजूद हर महीने अपना गुजारा चला पाएंगे.मूलतः लोग यह जानना चाहते हैं कि उनका कर भार बढ़ा है या घटा है.

बजट आते-जाते रहते हैं. यह एक वार्षिक आर्थिक परंपरा है जिसका उद्देश्य विभिन्न कटौतियों और रियायतों, बड़ी परियोजनाओं की घोषणाओं और अर्थव्यवस्था की अच्छी स्थिति के वादों के माध्यम से सभी नागरिकों का कल्याण करना है. मै ‘सभी’ शब्द पर जोर देना चाहता हूं. बजट राष्ट्र की आर्थिक स्थिति का एक नैदानिक मूल्यांकन है. लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि 140 करोड़ से अधिक भारतीयों में से अधिकांश, जिनमें शिक्षित वर्ग शामिल है, वित्त मंत्री द्वारा संसद में पेश किए जाने वाले बजट प्रस्तावों को ठीक से समझ नहीं पाते.

मंत्रालय के विस्तृत दस्तावेज, रंगीन ग्राफ, जटिल वित्तीय शब्दावली और उससे पहले पेश किए जाने वाले मीठे ‘हलवे’ आम आदमी की समझ से परे हैं. एक बढ़ई, सीमांत किसान, मध्यमवर्गीय गृहिणी या सरकारी विद्यालय का शिक्षक यह जानना चाहता है कि क्या वे महंगाई, अप्रत्यक्ष करों और उपकरों के बोझ के बावजूद हर महीने अपना गुजारा चला पाएंगे.

जीएसटी व्यवस्था पूरी तरह लागू होने के बाद कोई भी व्यक्ति किसी न किसी कर से अछूता नहीं है. यहां तक कि गरीबों द्वारा खाए जाने वाले सस्ते बिस्कुट और ब्रेड पर भी पांच प्रतिशत कर लगता है. पानी और दूध पर भी कर लगता है. तो, बजट का उद्देश्य क्या है? मूलतः लोग यह जानना चाहते हैं कि उनका कर भार बढ़ा है या घटा है;

क्या बजट से रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं और क्या अर्थव्यवस्था स्थिर है तथा विशाल मध्यम वर्ग और कृषि समुदाय का भला हो रहा है? हालांकि सरकार का दावा है कि गरीबी काफी हद तक समाप्त हो गई है, अनेक लोग इससे असहमत हैं. इससे अमीरों को ही फायदा होता है, वरना वे और अमीर नहीं होते तथा गरीब और गरीब नहीं होते.

उत्पादक कंपनियां अनिवार्य रूप से करों का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं, और शायद ही अपने मुनाफे पर इसका असर पड़ने देती हैं. निर्मला सीतारमण ने लगातार नौवीं बार बजट पेश करके इतिहास तो रच दिया, लेकिन इस बार उन्हें पिछले साल की तरह सराहना नहीं मिली, जब आयकर सीमा में ढील दी गई थी.

हालांकि उन्होंने 7.2% की महत्वाकांक्षी विकास दर का वादा किया है, लेकिन बजट वाले दिन रविवार को अचानक शेयर बाजार में आई गिरावट और विशेषज्ञों व सोशल मीडिया पर अन्य लोगों की टिप्पणियों ने निराशा का संकेत दिया. आर्थिक सर्वेक्षण में अफसोस जताया गया है कि सत्ताधारी दलों की जादुई छड़ी मानी जाने वाली मुफ्त योजनाएं (रेवड़ियां) सभी नागरिकों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं को नुकसान पहुंचा रही हैं. दूसरे शब्दों में, सर्वेक्षण ने एक बार फिर इस बहस को जन्म दिया है कि क्या मुफ्तखोरी की योजनाएं भारत की अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचा रही हैं या नुकसान.

पश्चिम बंगाल और केरल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में आगामी चुनावों को देखते हुए इस पर गंभीरता से विचार-विमर्श करना आवश्यक है, क्योंकि ये योजनाएं केवल चुनाव पूर्व वादे के रूप में लिपटे राजनीतिक उपहार नहीं हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं. आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा इस दरियादिली पर चिंता व्यक्त करने के बाद, अब समय आ गया है कि इसे राजनीति से अलग किया जाए.

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, सामान्य तर्क यह है कि नकद लाभ सीधे-सीधे राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावित कर रहे हैं. मुफ्त सहायता वंचितों-गरीबों के लिए होती है, लेकिन यह उस सार्वजनिक कोष से आती है जिससे समग्र जनहित के लिए धन प्राप्त होता है.

करदाताओं और अन्य लोगों के लिए स्थायी संपत्ति सृजित करने के उद्देश्य से किए जाने वाले पूंजीगत व्यय पर राज्य के खजाने से किए जा रहे चुनावी वादों का नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. भारतीय संविधान सभी के लिए समानता और न्याय की भावना का समर्थन करता है. प्रधानमंत्री भाजपा के प्रशंसनीय नारे ‘सबका साथ सबका विकास’ का बार-बार इस्तेमाल कर रहे हैं.

फिर भी, कमजोर वर्गों की सुरक्षा के नाम पर (चुपके से वोट जीतने के लिए), नकद वितरण अपवाद के बजाय नियम बनता दिख रहा है. जो गलत है. आजादी के 75 साल बाद भी, सरकारें लाखों लोगों को अपनी मदद पर निर्भर रखना चाहती हैं, बजाय इसके कि एक ऐसी अर्थव्यवस्था बनाई जाए जिससे वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें और सम्मानजनक कमाई कर सकें.

आर्थिक सर्वेक्षण ने राज्यों द्वारा लगातार लिए जा रहे ऋणों के राजकोषीय अनुशासन को बनाए रखने में निहित गंभीर जोखिमों को रेखांकित कर दिया है, ऐसे में मुफ्त योजनाओं के वितरण की परिभाषा, समय, तरीके और ढंग को लेकर एक नई बहस शुरू होनी चाहिए, नियम बनने चाहिए. वोट बटोरने वाली ‘आर्थिक नीतियों’ का बोझ उन लोगों पर नहीं डाला जाना चाहिए जो कर चुकाते हैं, कड़ी मेहनत करते हैं और भारत के प्रति अपना देशप्रेम का कर्तव्य निभाते हैं.

Web Title: budget 2026 Why burden taxpayers with 'freebies' blog Abhilash Khandekar

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