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बहुत देर कर दी...हुजूर आते-आते...!

By विजय दर्डा | Updated: February 9, 2026 05:22 IST

मुक्त व्यापार समझौते की घोषणा के साथ ही ट्रम्प प्रशासन ने भारत को 18 प्रतिशत टैरिफ के दायरे में ला दिया है. पहले 25 प्रतिशत टैरिफ था और रूस से तेल खरीदने के लिए 25 प्रतिशत का दंड.

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ठळक मुद्देभारत में अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर क्या रिश्तों में मिठास ला पाएंगे?सर्जियो गोर, ट्रम्प परिवार के भी करीबी हैं और ट्रम्प प्रशासन की एक ताकतवर शख्सियत माने जाते हैं.कुल 50 प्रतिशत टैरिफ भारत पर लगा हुआ था जो किसी भी देश पर लगने वाला सबसे ज्यादा टैरिफ था.

हर किसी की नजर इसी बात पर लगी थी कि अमेरिका और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौता कब होगा और उसका स्वरूप क्या होगा? ज्यादातर लोगों को लग रहा था कि भारत को झुकना होगा मगर जो लोग भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तासीर जानते हैं और उनकी कूटनीति को समझते हैं, वे आश्वस्त थे कि भारत लचीलापन भले ही दिखाए मगर झुकेगा नहीं! और वही हुआ. भारत ने ऐसा मास्टर स्ट्रोक खेला कि अमेरिका को वक्त रहते मुक्त व्यापार समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा. पिछले महीने इसी कॉलम में मैंने लिखा था कि भारत में अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर क्या रिश्तों में मिठास ला पाएंगे?

सर्जियो गोर, ट्रम्प परिवार के भी करीबी हैं और ट्रम्प प्रशासन की एक ताकतवर शख्सियत माने जाते हैं. अब यह कहने में हर्ज नहीं है कि रिश्तों में मिठास घोलने की शुरुआत उन्होंने कर दी है. मुक्त व्यापार समझौते की घोषणा के साथ ही ट्रम्प प्रशासन ने भारत को 18 प्रतिशत टैरिफ के दायरे में ला दिया है. पहले 25 प्रतिशत टैरिफ था और रूस से तेल खरीदने के लिए 25 प्रतिशत का दंड.

यानी कुल 50 प्रतिशत टैरिफ भारत पर लगा हुआ था जो किसी भी देश पर लगने वाला सबसे ज्यादा टैरिफ था. अब 18 प्रतिशत टैरिफ निश्चय ही पाकिस्तान (19 प्रतिशत), बांग्लादेश और वियतनाम (20 प्रतिशत) तथा चीन (34 प्रतिशत) से बेहतर है. इस समझौते का विस्तृत ब्यौरा अभी आना बाकी है लेकिन डील साइन होने से पहले ही डोनाल्ड ट्रम्प ने कुछ घोषणाएं कर दीं कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा, 500 अरब डॉलर का व्यापार अमेरिका से करेगा और अमेरिकी डेयरी तथा कृषि प्रोडक्ट कोे भारत में बाजार मिलेगा.

इसे लेकर आशंकाएं पैदा भी होने लगीं लेकिन सरकार ने साफ कर दिया है कि कृषि और डेयरी क्षेत्र के बारे में भारत का रवैया स्पष्ट है. दिलचस्प बात है कि मोदी जी ने इस समझौते के लिए ट्रम्प को अपना दोस्त बताते हुए खुशी तो जाहिर की लेकिन ट्रम्प ने जो घोषणा की, उस पर मौन साधे रखा. मोदी जी ने इस पूरे मामले में मौन को एक सशक्त हथियार की तरह इस्तेमाल किया है.

उन्होंने ट्रम्प के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोला. आपको याद होगा कि पिछले साल 13-14 फरवरी को मोदी जी अमेरिका गए थे और व्यापार समझौते पर चर्चा भी हुई थी लेकिन बात बनी नहीं. ट्रम्प ने 2 अप्रैल को भारत समेत दुनिया के लगभग 100 देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया. चेतावनी दी कि टैरिफ को 26 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है.

कई देशों ने अमेरिका के दबाव में समझौता कर लिया लेकिन भारत ने मौन बनाए रखा. ट्रम्प ने 31 जुलाई को टैरिफ बढ़ा कर 25 प्रतिशत कर दिया. 7 अगस्त को 25 प्रतिशत का जुर्माना भी लगा दिया. यानी टैरिफ हो गया 50 प्रतिशत लेकिन भारत ने ट्रम्प की कोई आलोचना नहीं की. मगर यह स्पष्ट कर दिया कि टैरिफ के दबाव में कोई समझौता नहीं होगा!

इस बीच टीम मोदी ने कुछ ऐसा किया जिसकी ट्रम्प ने कल्पना भी नहीं की थी. भारतीय उत्पाद के लिए बाजार खोजे जाने लगे. यूनाइटेड किंगडम, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भारत ने मुक्त व्यापार समझौता कर लिया. वहां तक तो बात ठीक थी लेकिन जब यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता हुआ तो अमेरिका को लगा कि अब मामला हाथ से छिटक रहा है.

27 देश यूरोपीय यूनियन के सदस्य हैं और इनमें से 25 देश यूरो करेंसी का उपयोग करते हैं. इस डील को मदर ऑफ ऑल डील्स कहा गया. इसने अमेरिका की नींद उड़ा दी क्योंकि इस डील पर पिछले 20 वर्षों से बातचीत चल रही थी. ट्रम्प ने जिस तरह से यूरोपीय यूनियन और भारत को डराने की कोशिश की थी, उसने दोनों को इतनी तेजी से करीब ला दिया कि डील पक्की हो गई.

इसके पहले विश्व मंच पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ मंच साझा करके मोदी जी ने यह संदेश दे दिया था कि भारत अपनी शर्तों पर आगे बढ़ेगा. वह किसी की गोद में बैठने वाला नहीं है. जब ट्रम्प ने एक बैठक के लिए मोदी जी को अमेरिका बुलाया तो वे नहीं गए क्योंकि उसी दौरान पाकिस्तान के सेना अध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर भी अमेरिका जाने वाले थे.

इन सारी घटनाओं ने अमेरिका को संदेश दे दिया था कि भारत को डराया-धमकाया नहीं जा सकता! अमेरिका को यह भी लगने लगा कि कहीं ऐसा न हो कि भारत का बाजार उसके हाथ से निकल जाए. ये बात सर्जियोे गोर ने भी जरूर बताई होगी. इधर तमाम तल्खी के बावजूद भारत ने बातचीत का दरवाजा खुला रखा. नरेंद्र मोदी ने वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल पर दारोमदार सौंपा.

पीयूष गोयल ने चाणक्य की तरह अरब देशों, यूरोपीय यूनियन और रूस के साथ व्यापार की ऐसी डील की, जिसे इतिहास याद रखेगा. पीयूष गोयल के भीतर बिजनेस तो इनबिल्ट है, यानी मोदी जी ने सही व्यक्ति को सही काम सौंपा. जाहिर है विदेश मंत्री एस. जयशंकर की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही. मगर एक महत्वपूर्ण सवाल है कि तल्खी के कारण दोनों देशों के बीच अविश्वास की जो लकीर खिंच गई है,

उसे पाटना कितना मुश्किल होगा? अमेरिकी मीडिया भी कह रहा है कि दशकों के प्रयासों के बाद दोनों देशों के रिश्ते मधुर हुए थे. इसे बहुत क्षति पहुंची है. भारत का विश्वास जीतने के लिए अमेरिका को बहुत मेहनत करनी होगी. और ये बात सही भी है. भारत तो हमेशा ही हर किसी के साथ अच्छे रिश्ते चाहता है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण रूस के साथ दशकों से हमारी दोस्ती है.

यदि ट्रम्प या कोई और चाहे कि हम रूस से दोस्ती तोड़ दें तो यह कैसे संभव है? रूस तो हमारे भाई जैसा है. भारत बहुध्रुवीय दुनिया चाहता है और यही सोच हमारी ताकत है. उम्मीद करें कि अविश्वास की लकीर जल्दी मिटेगी! फिलहाल तो ये गाना मुझे याद आ रहा है : बहुत देर कर दी...हुजूर आते आते...!

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