मनोरंजन के बहाने आतंक का खतरनाक पाठ पढ़ा रहे वीडियो गेम

By प्रमोद भार्गव | Updated: February 17, 2026 05:15 IST2026-02-17T05:15:58+5:302026-02-17T05:15:58+5:30

प्रशिक्षित नाबालिगों को बाद में आतंकवादी संगठनों और नफरत फैलाने वाले समूहों में भर्ती करा दिया जाता है, जिससे ये आतंक और नफरत फैलाने के औजार बन जाएं.

Video games teaching dangerous lessons terror under guise of entertainment blog Pramod Bhargava | मनोरंजन के बहाने आतंक का खतरनाक पाठ पढ़ा रहे वीडियो गेम

सांकेतिक फोटो

Highlightsअब बच्चों को इन खेलों के जरिये आतंकवाद का पाठ पढ़ाए जाने का खतरनाक सिलसिला शुरू हो गया है.उत्तरी अमेरिका में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अब 42 प्रतिशत आरोपी नाबालिग हैं.यूरोप में 20 से 30 प्रतिशत आतंकवाद विरोधी गतिविधियों में हुई जांचों में 12-13 साल के बच्चे शामिल पाए गए हैं.

अमेरिकी दैनिक न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी खबर के अनुसार माइनक्राफ्ट और रोबलॉक्स जैसे लोकप्रिय वीडियो खेल किशोर और बालकों को आतंकी बनाने का मानवता विरोधी काम कर रहे हैं. अतएव आपके लाड़ले को यदि मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई है तो होशियार हो जाइए, क्योंकि अब बच्चों को इन खेलों के जरिये आतंकवाद का पाठ पढ़ाए जाने का खतरनाक सिलसिला शुरू हो गया है.

इन प्रशिक्षित नाबालिगों को बाद में आतंकवादी संगठनों और नफरत फैलाने वाले समूहों में भर्ती करा दिया जाता है, जिससे ये आतंक और नफरत फैलाने के औजार बन जाएं. इस सच्चाई को उजागर करने का काम यूनाइटेड नेशंस की काउंटर-टेररिज्म कमेटी ने किया है. इसके अनुसार यूरोप और उत्तरी अमेरिका में आतंकवाद से जुड़े मामलों में अब 42 प्रतिशत आरोपी नाबालिग हैं.

2021 की तुलना में यह आंकड़ा तीन गुना अधिक है. नीदरलैंड के हेग स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज्म के अनुसार यूरोप में 20 से 30 प्रतिशत आतंकवाद विरोधी गतिविधियों में हुई जांचों में 12-13 साल के बच्चे शामिल पाए गए हैं. अनेक ऑनलाइन प्लेटफार्म के जरिये कट्टरपंथी संगठन तेजी से बालकों को आतंकी बनाने का खेल खेल रहे हैं.

हालांकि भारत में आतंक फैलाने की दृष्टि से बच्चों और किशोरों को आतंकी बनाने का काम पाकिस्तानी सेना अर्से से कर रही है. मुंबई के 26/11 के आतंकी हमले में शामिल अजमल कसाब इसका जीता-जागता उदाहरण रहा है. पूरी दुनिया में इस समय डिजिटल खेलों का कारोबार बढ़ रहा है. इस कारण दुनिया इनके निर्माण और निर्यात में दिलचस्पी ले रही है.

नतीजतन इसका रूप दैत्याकार होता जा रहा है. ऑनलाइन खेल आंतरिक श्रेणी में आते हैं, जो भौतिक रूप से मोबाइल पर एक ही किशोर खेलता है, लेकिन इनके समूह बनाकर इन्हें बहुगुणित कर लिया जाता है. वैसे तो ये खेल सकारात्मक होते हैं, लेकिन ब्लू व्हेल, पब्जी, माइनक्राफ्ट और रोबलॉक्स जैसे खेल उत्सुकता और जुनून का ऐसा मायाजाल रचते हैं कि मासूम बालक के दिमाग की परत पर नकारात्मकता की पृष्ठभूमि रच देते हैं. मनोचिकित्सकों और स्नायु वैज्ञानिकों का कहना है कि ये खेल बच्चों के मस्तिष्क पर बहुआयामी प्रभाव डालते हैं.

ये प्रभाव अत्यंत सूक्ष्म किंतु तीव्र व तीक्ष्ण होते हैं, इसलिए ज्यादातर मामलों में अस्पष्ट होते हैं. दरअसल व्यक्ति की आंतरिक शक्ति से आत्मबल दृढ़ होता है और जीवन क्रियाशील रहता है. किंतु जब बच्चे निरंतर एक ही खेल खेलते हैं तो दोहराव की इस प्रक्रिया से मस्तिष्क कोशिकाएं परस्पर घर्षण के दौर से गुजरती हैं,

नतीजतन दिमागी द्वंद्व बढ़ता है और बालक मनोरोगों की गिरफ्त से लेकर नस्लीय भेदभाव की गिरफ्त में आता जाता है, जो उसे आतंक की राह में धकेलने का काम करते हैं.  ये खेल हिंसक और अश्लील होते हैं, इसलिए बच्चों के आचरण में आक्रामकता और गुस्सा दिखने लगता है. दरअसल इस तरह के खेल देखने से मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न करने वाले डोपामाइन जैसे हार्मोनों का स्राव होने लगता है.

इस द्वंद्व से भ्रम और संशय की मन:स्थिति निर्मित होने लगती है और बच्चों का आत्मविश्वास छीजने के साथ विवेक अस्थिर होने लगता है, जो आत्मघाती कदम उठाने को विवश कर देता है. हालांकि डोपामाइन ऐसे हार्मोन भी सृजित करता है, जो आनंद की अनुभूति के साथ सफलता की अभिप्रेरणा देते हैं, किंतु यह रचनात्मक साहित्य पढ़ने से संभव होता है, जो अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं और घरों से बाहर होता जा रहा है. यह एक चिंताजनक पहलू है.

Web Title: Video games teaching dangerous lessons terror under guise of entertainment blog Pramod Bhargava

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