इसाबेल अलेंदे की ‘लूना’ हन्ना खलील की नायिकाएं और अलिफ-लैला
By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: February 3, 2026 06:15 IST2026-02-03T06:15:15+5:302026-02-03T06:15:15+5:30
‘ईवा लूना’ या ‘टोड्स माउथ’ कहते हुए अलेंदे किरदारों को हालात के मुताबिक जटिल बनाती हैं, पर सरल भी.

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सुनील सोनी
1987 में जब इसाबेल अलेंदे ने ‘क्यूंतोस डि ईवा लूना’ लिखी, तो शायद उनके दिलोदिमाग में ‘अलिफ लैला’ ही रही होगी, जो अंग्रेजी में ‘वन थाउजेंड्स एंड वन नाइट्स’ या ‘द अरेबियन नाइट्स’ शीर्षक से दुनियाभर में पहुंचीं. ‘लूना की कहानियों’ में उनकी नायिका लूना दरअसल किस्सागो है, जो कई लैटिन अमेरिका के संदर्भ में स्त्री मुक्ति की कहानियां कहती है. गैब्रियल गार्सिया मार्केज का जादुई यथार्थवाद यहां दूसरे रूप में मौजूद है, क्योंकि इसाबेल की नायिका किरदार अधिक मुखर हैं और पूरी शिद्दत से पुरुष वर्चस्ववादी सत्ता से दो-दो हाथ करती हैं.
यही वजह है कि इसाबेल ने ‘लूना’ पर पूरा अलग उपन्यास ही लिखा. अलेंदे की ईवा कथाएं कहने में माहिर है और उसी के बूते पर वह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के समाज में महिलाओं की स्थिति को उनके हिसाब से तय करती है. यूं देखा जाए, वह ‘अलिफ लैला’ की आधुनिक शहजादी शहरजाद है, जो राजा शहरयार यानी ‘सत्ता’ को कहानियां सुनाकर बहला रही है.
इसे यूं देखना भी मुनासिब हो सकता है कि ईवा खुद अलेंदे भी हो सकती हैं, जो राष्ट्रपति चाचा के सैन्य तख्तापलट से चिली से स्वनिर्वासन और अमेरिका में बसने तक अपनी संघर्षगाथा को बयान करती हैं, पर उनकी आजादी सत्ता के बजाय समाज की दकियानूस सोच से आजादी है.
उनके पौराणिक नायक के मौजूदा दुनिया वाले जटिल उपन्यास ‘अल जोरो’ को हॉलीवुड ने ‘मास्क ऑफ जोरो’ जैसी बहुचर्चित फिल्में बनाकर ‘लुगदी हीरो’ की बदले की कहानी में जरूर बदल दिया, पर वह वैसा है नहीं. बिल्कुल उसी तरह, जैसे ‘ईवा लूना’ या ‘टोड्स माउथ’ कहते हुए अलेंदे किरदारों को हालात के मुताबिक जटिल बनाती हैं, पर सरल भी.
बिल्कुल वैसे ही जैसे शहरजाद हर कहानी को अधूरा छोड़ देती है, ताकि वे भावी दुल्हनें बच जाएं, जिनके सिर शहरयार सहवास के बाद की सुबह कलम करवा देता. ‘अलिफ लैला’ मूलत: फारसी ‘हजार अफसाना’ का विस्तारित अरबी संस्करण है, जिसमें खूब तमाशा और रंगीनियत है.
लेकिन, उसमें ‘अलादीन’ और ‘अलीबाबा’ जैसी कहानियों को 18वीं सदी में बाद में फ्रांसीसी प्राच्यविद् एंटोइन गैलैंड ने अनुवाद के दौरान जोड़ा है, जिसे उन्होंने सीरियाई लेखिका हन्ना दियाब से पेरिस यात्रा के दौरान सुना था. ‘हजार अफसाना’ की कोई पांडुलिपि नहीं है, पर माना जाता है कि उसे कई लेखकों ने लिखा होगा, जिन्होंने 7वीं-8वीं सदी में संग्रहीत होकर यह रूप लिया.
‘अलिफ लैला’ इसके सदीभर बाद का संग्रह है, जिसमें विस्तृत कथासंग्रह है, जो जादुई कारनामों से भरा हुआ है. सीरिया से मिली नौवीं सदी की अरबी हस्तलिखित पांडुलिपि को नाबिया एबॉट ने खोजा. पेरिस के राष्ट्रीय पुस्तकालय ‘बिब्लियोथेक नेशनेल डि फ्रांस’ में सीरियाई पांडुलिपि में लगभग 300 कहानियां मिल जाती हैं.
यही वह प्रेरणा है, जिसकी गूंज को इतालवी कवि बोकासियो के ‘डेकैमरॉन’ और अंग्रेज उपन्यासकार ज्यॉफ्री चौसर की ‘कैंटरबरी टेल्स’ में भी पहचाना जा सकता है. ‘हजार अफसाना’ की लोककथाओं में ‘बेताल पचीसी’, ‘कथा सरित्सागर’, ‘जातक कथा’ और ‘पंचतंत्र’ के अक्स भी दिखते हैं, पर यूरोप में कई भाषाओं में अनूदित होते हुए वे बिला गए हैं.
दुनिया जब कोविड से जूझकर निकली ही थी, तो फिलिस्तीनी मूल की ब्रिटिश कवयित्री-लेखक हन्ना खलील ने नए संदर्भों में ‘अलिफ लैला’ को स्त्री मुक्ति के संदर्भ में प्रस्तुत किया. हन्ना को उनकी रचनाओं में महसूस होनेवाली अरब पहचान, स्मृति और निर्वासन, स्त्रीगत अनुभव की वजह से जाना जाता है,
जिसे वे आधुनिक राजनीतिक संदर्भ में जालिम सत्ता के प्रतिरोध की रणनीति के तौर पर कहानी में इस्तेमाल करती हैं. अरबी में किस्सागो महिलाएं ‘हकावती’ कहलाती हैं, जो उनके नाटक का भी नाम है. इसे ‘तमाशा टेल्स’ ने पहली बार जनवरी, 2023 में लंदन के शेक्सपियर्स ग्लोब के साथ मिलकर भारतवंशी रंगमंच दिग्गज पूजा घई के निर्देशन में पेश किया और अब यह यूरोप में कई जगह मंचित किया जा चुका है.
‘अलिफ लैला’ की इन 5 बहादुर स्त्रियों में एक नर्तकी वदीहा, एक योद्धा जूया, एक लेखिका अकीला, एक युवा सेनापति फतह और एक विद्वान दार्शनिक नाहा हैं. इस नाटक में ये पांच महिलाएं अरब शासक शहरयार की भावी दुल्हनें हैं, जो अंतत: मौत के खौफ से सबको आजाद करती हैं. यह जानना अद्भुत है कि इजाबेल अलेंदे का ‘टोड्स माउथ’ असल में इंग्लैंड के शेफील्ड में वह प्राकृतिक रूप से बनी चट्टान है, जो मेंढक के खुले मुंह जैसी दिखती है और कहानी में बहुत कुछ कहती है.