Ghanshyam Das Birla Death Anniversary: Every Businessman should know 10 things of Birla | पुण्यतिथिः अकूत पैसा कमाने की चाहत रखने वाले हर शख्स को घनश्याम दास बिड़ला की जिंदगी की ये 10 बातें जाननी चाहिए

घनश्याम दास बिड़ला (जीडी बाबू) भारत में औद्यौगिक क्रांति के जनक के तौर पर जाने जाते हैं। लेकिन 30 साल की उम्र में अपना बिजनेस स्‍थापित कर देने वाले और भारत में खरबों का इंपायर खड़ा कर देने वाले जीडी बिड़ला ने खुद को कभी व्यापारी नहीं माना। राजस्थान के पिलानी में 10 अप्रैल 1894 को उनका जन्म हुआ। उन्होंने अपने युवावस्‍था में आजादी का आंदोलन देखा। सरदार पटेल और महात्मा गांधी से उनकी करीबियां रहीं। लेकिन उन्होंने सबसे अहम भूमिका आजाद भारत में निभाई। एक आम परिवार में जन्म लेने के बाद जब आज के ही दिन (11 जून 1983) को उनका निधन हुआ तब उनकी कंपनी  बीकेकेएम बिड़ला समूह की परिसंपत्तियां खरबों रुपये के पार थीं। आइए उनकी जिंदगी की कुछ खास बातों पर नजर डालते हैं-

1. देश में गुलामी थी, लेकिन घनश्याम दास बिड़ला को बिजनेस खड़ा करने से नहीं रोक पाई। उन्होंने अंग्रेजों के जमाने में ही अपना व्यापार जमाना शुरू कर दिया था।

2. वे आजादी के आंदोलन में शरीक हुए लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों की तरह नहीं। उन्होंने लगातार पैसे के महत्व को समझते हुए कई बार जरूरी जगहों पर स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की। वे गांधीजी के मित्र, सलाहकार, प्रशंसक और सहयोगी के तौर भी जाने जाते थे।

3. उन्होंने सामाजिक कुरीतियों का भी विरोध किया और सन 1932 में गांधीजी के नेतृत्व में हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने कभी खुद को केवल पैसे के लिए व्यापार में उतरा व्यापारी नहीं माना। वे समाज के लिए लगातार बेहतरी लेकर आते। लेकिन उनकी पहली प्राथमिकता सदैव बिजनेस ही रही। वे बिजनेस के जरिए अपने देश की सेवा करते रहे।

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4. जीडी बिड़ला ने कभी अलग से किसी दिन का इंतजार नहीं किया। उन्होंने अपने समय को पहचाना शुरुआत में उनके परिवार का ब्याज पर पैसे देने का काम था तो उन्होंने वहीं से शुरुआत कर ली।

5. जीडी बिड़ला ने जल्द समझ लिया कि ब्याज देने के व्यापार पर टिके रहना सही नहीं होगा। जैसा कि उनके खानदान के लोग करते आ रहे थे। वे अपने वक्त समझते गए और उन्होंने कपड़ा, फ्लामेंट यार्न, सीमेंट, केमिकल, बिजली, दूरसंचार, वित्तीय सेवा और एल्युमिनियम क्षेत्र में व्यापार किया।

6. उनका खानदान साहूकार था। तब साहूकारों को सबसे अमीर माना जाता था। बिड़ला चाहते थे बड़े ऐशो-आराम से अपनी जिंदगी गुजारते। लेकिन 25 की उम्र में वे बंगाल चले गए और वहां जूट की कंपनी लगाई। उन्हें जानकारी थी कि बंगाल में जूट बहुत होता है।

7. किस्मत हमेशा उन लोगों का साथ देती जो हिम्मत दिखाते हैं। अगर अपने परंपरा को निभाते हुए बिड़ला राजस्‍थान से बंगाल ना गए होते तो शायद प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब समूचे ब्रिटिश साम्राज्य को जूट से बनी चीजों की जरूरत पड़ी तो कोई उसकी आपूर्ति करता। लेकिन तब बिड़ला एक मान्य व्यापारी के तौर पर उभरे।

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8. सन 1919 में उन्होंने 50 लाख की पूंजी लगाकर ‘बिड़ला ब्रदर्स लिमिटेड’, 1926 में ब्रिटिश इंडिया के केंद्रीय विधानसभा सदस्य चुना जाना, 1932 में महात्मा गांधी के साथ मिलकर दिल्ली में हरिजन सेवक संघ की स्थापना और उसके बाद 1940 के दशक में उन्होंने ‘हिंदुस्तान मोटर्स’ की स्थापना की। लेकिन इनमें सबसे खास बात भारत आंदोलन के दौरान घनश्याम दास को एक ऐसा व्यावसायिक बैंक बनाने की सोची। जो कि पूरी तरह भारतीय पूंजी और प्रबंधन से बना हो। नतीजतन यूनाइटेड कमर्शियल बैंक, 1943 में कोलकाता स्‍थापित हो गया।

9. आजादी से पहले ही बिड़ला आने वाले समय में तकनीकी के होने वाले विकास को समझ गए थे। उन्होंने 1943 में ही पिलानी में ‘बिड़ला इंजीनियरिंग कॉलेज’ (सन 1964 में इसका नाम ‘बिड़ला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस हो गया) और भिवानी में ‘टेक्नोलॉजिकल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्सटाइल एंड साइंसेज’ की नींव रख दी थी। बाद के सालों में उन्होंने तकनीकी के क्षेत्र में ऐसे काम किए कि उन्हें इस क्षेत्र का जनक कहा गया।

10. बिड़ला ने कम उम्र में ही अपनी पत्नी महेश्वरी देवी (6 जनवरी 1926) को खो दिया था। लेकिन वे दोबारा शादी के लिए नहीं बढ़े।